सामयिक वार्ता

17वीं लोक सभा के लिए मतदान समाप्त


भारतीय संसद के निचले सदन, लोक सभा के सातवें चरण का मतदान मतदाताओं की अच्छी-ख़ासी भागीदारी के साथ समाप्त हुआ। 2019 के लोक सभा चुनावों में लगभग 900 मिलियन मतदाता थे और लगभग 66 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। भारत ने एक बार फिर सहभागी और जोशीले लोकतंत्र में भरोसा…

ब्रेक्ज़िट समझौते का अंतिम प्रयास


ब्रिटेन की संसद ने सुश्री थेरेसा मे के ब्रेक्ज़िट समझौते को तीन बार अस्वीकार कर दिया है और इसी के साथ ब्रितानी नेता ब्रेक्ज़िट वापसी की अपनी अंतिम चुनौती का सामना कर रही हैं। अगर फिर से इसे अस्वीकार कर दिया जाता है तो इसके संकटपूर्ण परिणाम होंगे। समझौते के…

पोम्पियो-लावरोव बातचीत – शान्ति की तरफ एक और प्रयास


हाल ही में अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो ने रूस की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने अपने समकक्ष सर्गेई लावरोव और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत की। इससे साफ है कि डोनाल्ड ट्रम्प रूस के साथ तनाव घटाने के लिए फिर से प्रयास कर रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय रूस और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों से जारी लघु-शीतयुद्ध से अच्छी तरह वाकिफ़ है। अमरीका से ताल्लुक रखने वाले ज़्यादातर विदेशनीति विश्लेषक इसे लघु-शीतयुद्ध के तौर पर मान्यता नहीं देते, क्योंकि ऐसा करके वे रूस को समकक्ष ताकत का रुतबा नहीं देना चाहते। हालांकि वे जानते हैं कि पूर्व सोवियत संघ और बड़ी भौगोलिक ताकत होने के नाते वह अभी भी एक सक्षम देश है। सच तो यह है कि शीतयुद्ध के दिनों में भी अमरीका का शिक्षित समुदाय रूस को बराबरी की एटमी ताकत मानने को तैयार नहीं था। इसी मानसिकता की झलक तत्कालीन अमरीकी प्रशासन के रवैये से भी झलकती थी। इससे यह दर्शाने की कोशिश की जाती थी कि हालांकि विश्व दो धड़ों में बँटा है, लेकिन ताकत के मामले में अमरीका दो कदम आगे है। इसके पीछे अमरीका की आर्थिक तरक्की और तकनीकी प्रगति की महती भूमिका रही है। आज भी अमरीका इस तथ्य से आँख मिलाने को तैयार नहीं है कि रूस पिछली बदहाली से बाहर आ चुका है और अपनी परमाणु और मिसाइल क्षमता से अमरीका को चुनौती देने में सक्षम है। हालात जो भी हों, अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को आभास है कि अमरीका और रूस के बीच लघु शीतयुद्ध का सीधा मतलब है कि अभी भी दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे को टक्कर देने में सक्षम हैं। यही वजह है कि हाल के सालों में रूस ने ईरानी परमाणु समझौते, सीरियाई सरकार और वेनेजुएला में मादुरो को समर्थन देकर अमरीका को बार-बार चुनौती दी है। इससे पहले अमरीका अनेक मौकों पर रूस की गतिविधियों को नज़रंदाज़ करता रहा है। चाहे वह दक्षिण ओसेटिया या जॉर्जिया पर कार्रवाई का मामला हो या उक्रेन और क्रीमिया पर सख्ती का; अमरीका सिवाय कुछ प्रतिबन्धों के रूस से आमना-सामना करने से परहेज करता रहा है। इससे रूस को अपने फैसले और कार्रवाई को अंजाम देने का मौका मिलता रहा और अमरीका को हाथ बाँधने पडे़। अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा की तरह राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पहले-पहल रूस के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की कोशिशे कीं। लेकिन मजबूत नेता के तौर पर व्लादिमीर पुतिन की तारीफ करने के बावजूद अमरीका अपने लोकतान्त्रिक मूल्यों के चलते रूस के फैसलों पर आँखें मूँदे नहीं रह सकता। ट्रम्प के चुनाव अभियान के दौरान एक समय तो ऐसा भी आया जब उन पर रूस समर्थक होने के आरोप लगाए गए। लेकिन अब हालात एक नई करवट लेने लगे हैं। मुलर जाँच रिपोर्ट के सामने आने के बाद अमरीकी विदेश विभाग की प्राथमिकता रूस के साथ अविश्वास को दूर करना और संबंध सुधारना है। इस पृष्ठभूमि में पोम्पियो-लावरोव बातचीत रूस और अमरीका के बीच शान्ति स्थापना का नया प्रयास है। इस पहल की मार्फत अमरीका कई मकसद पूरे करना चाहता है। एक तरफ तो वह इससे रूस और चीन की नज़दीकी को थामना चाहता है तो दूसरी ओर चीन से व्यापारिक मतभेदों को सुलझाने में कड़ी शर्तों के इस्तेमाल की गुंजाइश खोज रहा है। अगर रूस ईरान के मामले में दखल कम कर दे तो अमरीका के लिए उसके खिलाफ प्रतिबन्ध चस्पाने का रास्ता साफ हो जाएगा। यही नहीं; रूस के साथ मिलकर वह सीरिया में भी अपनी योजना को कार्यान्वित कर सकता है।   लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं है। कुछ विश्लेषकों को आशंका है कि रूस के प्रति अमरीका की नरमी नई मुसीबतें पैदा कर सकती है। रूस पहले ही यूरोप के साथ ऊर्जा सहयोग का फायदा ले रहा है। नाटो के खिलाफ ट्रम्प की आक्रामक टिप्पणी के बाद अमरीका और ट्रान्स अटलांटिक सहयोगियों के बीच असहयोग बढ़ता जा रहा है। रूस इस स्थिति पर भी नज़र रखे हुए है। वह लम्बे समय से चीन के साथ कूटनीतिक और ऊर्जा सहयोगी के तौर पर जुड़ा हुआ है। अमरीका द्वारा भारत और तुर्की जैसे मुल्कों को रूस से हथियार खरीदने से रोकने के लिए जारी प्रतिबन्धों के चलते भी मॉस्को के साथ उसकी स्थिति असहज बनी हुई है। इसके बावजूद सच यही है कि अमरीका और रूस के बीच सम्बन्ध सुधार का अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और स्थिरता पर सकारात्मक असर होगा। ऐसा होना भारत के लिए भी अनेक मायनों में लाभकारी है। भारत काफी अरसे से रूस-अमेरिका तनाव के चलते आर्थिक नुकसान उठा रहा है। इन दोनों शक्तियों के बीच शीतयुद्ध के समय भी भारत ने किसी पक्ष के साथ जुड़ने के बजाय निरपेक्ष रहना स्वीकार किया था। आज भी वह इनमें से किसी पक्ष के साथ तनाव नहीं चाहता। अमरीका भारत को हथियार बेचना चाहता है लेकिन ऐसा करने के लिए वह उस पर रूस से शस्त्रास्त्र न खरीदने की शर्त लगा रहा है। इसके बावजूद भारत रूस से एस-400 मिसाइलें खरीद रहा है। इसका सीधा असर भारत अमेरिका सम्बन्धों पर होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि भारत वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच बेहतर सम्बन्धों का पक्षधर है। आलेख - प्रॉफे. चिन्तामणि महापात्र, प्रो. वी.सी. और अध्यक्ष, अमेरिकन स्टडीज़ सैण्टर, जे.एन.यू.। अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय। [audioplayer file ="http://airworldservice.org/hindi-commentary/Hindi--Sam-Varta-for-18-May-19.mp3"]  

आतंकी हमलों के साए में पाकिस्तान को आर्थिक मदद


महीनों तक चली लंबी बातचीत के बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आईएमएफ ने पाकिस्तान को एक और आर्थिक बेलआउट पैकेज दे दिया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार डॉ हफीज़ शेख़ ने बताया कि पाकिस्तान और यात्रा पर आए आईएमएफ के दल के बीच वार्ता के अंतिम चरण में बेलआउट को हरी…

विश्व व्यापार संगठन की नई दिल्ली में मंत्रीस्तरीय बैठक


विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अधिकतर निर्धन तथा विकासशील राष्ट्रों को योग्य बनाने वाले विशेष तथा अंतरीय प्रबंध (एस एंड डीटी) तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए एक कड़ी पिच नई दिल्ली की मंत्रिस्तरीय बैठक में निर्मित की गई है | डब्ल्यूटीओ के तत्वावधान में बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को सशक्त…

जावेद ज़रीफ़ की नई दिल्ली यात्रा


ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ की नई दिल्ली यात्रा ऐसे समय में हुई है जब अमरीका और ईरान के बीच विवाद चल रहा है। इससे ईरान की विदेश नीति में भारत के महत्वपूर्ण स्थान का पता चलता है। ईरान के विदेशमंत्री ने भारत की देशमंत्री से भेंट कर दोनों देशों के…

टर्की के साथ भारत के सम्बन्धों में आई प्रगाढ़ता


वरिष्ठ आधिकारिक स्तर पर लगातार दो बैठक करके अपनी साझेदारी को उन्नत करने के लिए हाल ही में भारत तथा टर्की ने नीरवता से सुदृढ़ प्रगति की है | उभरते सहयोगी भारत तथा परंपरागत सहयोगी पाकिस्तान के बीच टर्की अपने सम्बन्धों में सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान केन्द्रित कर रहा…

भारत-वियतनाम संबंधों में प्रगाढ़ता


भारत के उप-राष्ट्रपति एम.वैंकेया नायडू ने वियतनाम की चार दिन की आधिकारिक यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य वियतनाम के साथ भारत की व्यापक सामरिक साझेदारी को बढ़ावा देना था। ये सभी जानते हैं कि भारत और वियतनाम साझेदारी ने समय की हर परीक्षा पास की है। वियतनाम के उच्च…

अमरीका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव


ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने घोषणा की है कि उनके देश ने संयुक्त समग्र कार्ययोजना यानि जे.सी.पी.ओ.ए. के तहत अपने पुराने वायदों से पीछे हटने का फैसला किया है। यह घोषणा मध्य एशिया में अमरीका द्वारा डोनाल्ड ट्रम्प की कमान में सैन्य तैनाती की प्रतिक्रिया स्वरूप की गई है। ज्ञातव्य है कि ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद परमाणु समझौते को मानने से इन्कार कर दिया था। जे.सी.पी.ओ.ए. को अस्वीकार करने के बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ एक के बाद एक फैसले किए, जिससे वॉशिंगटन और तेहरान की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी ईरान नीति के तहत निहायत गै़र-समझौतावादी रुख अख्तियार किया है। इसके चलते जे.सी.पी.ओ.ए. के अनुपालन के कारण ईरान से हटाए गए प्रतिबन्धों को फिर से लागू कर दिया गया है। इसके बाद अमरीका ने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर या आई.आर.जी.सी. को आतंकी संगठन घोषित कर दिया। यह पहला मौका है जब अमरीका ने किसी विदेशी सरकार के पूरे संगठन को ही आतंकी घोषित किया है। इसके अगले चरण के तौर पर अमरीका ने पिछले महीने ईरान से तेल खरीदने वाले मुल्कों जिनमें भारत, चीन और दक्षिण कोरिया शामिल हैं, को अभी तक उपलब्ध राहतसीमा बढ़ाने से मना कर दिया। जबकि इससे पहले, बराक ओबामा के कार्यकाल में राहत जारी रखने की परम्परा रही है। ट्रम्प के इन फैसलों से ईरान और अमरीका के बीच विवाद बढ़ना स्वाभाविक है। हाल ही में जारी अमरीकी खूफिया विभाग की रिपोर्ट में ईरान द्वारा मध्यपूर्व में अमरीकी ठिकानों पर हमले की आशंका से तनाव चरम पर पहुँच गया है। इन रिपोर्टों के बाद ही अमरीका ने अपने नौसैनिक युद्धपोत अब्राहम लिंकन को मध्यपूर्वी क्षेत्र में तैनात करने का फैसला किया। अमरीका के इस कदम की प्रतिक्रिया में ईरान ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर हालिया परिदृश्य की समीक्षा की और जे.सी.पी.ओ.ए. के अनुपालन की अपनी नीति से मुकरते हुए कुछ पुराने वायदों से पीछे हटने की घोषणा कर दी। सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी है। हालांकि उन्होंने शेष विश्व को यकीन दिलाया है कि हालिया फैसले का मतलब ईरान का जे.सी.पी.ओ.ए. से बाहर होना नहीं है, बल्कि यह मौजूदा हालातों में उठाया गया महज़ एक अस्थायी कदम है। इस फैसले का मतलब ईरान द्वारा यूरेनियम संसाधन जारी रखना और स्वयंस्वीकृत 60 दिनों की समयसीमा को लम्बित करना है। इस बीच, समझौते में शामिल अन्य पक्षों ने अमरीका द्वारा परमाणु समझौते से कदम खींचने और ईरान के खिलाफ प्रतिबन्ध जारी रखने के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। समझौते के अहम पक्ष के तौर पर यूरोपीय संघ ने अपनी तरफ से यथास्थिति बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश की; लेकिन दुर्भाग्य से उसका प्रयास सफल नहीं हो सका। अगर हालिया तनाव जारी रहता है और ईरान अपने फैसले पर कायम रहता है; तो अमरीका इस मामले को संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जा सकता है, जिससे दोनों मुल्कों के बीच तनाव के और बढ़ने की आशंका है। ऐसे वक्त पर यूरोपीय संघ समेत अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को दोनों पक्षों से बातचीत करनी चाहिए ताकि अमरीका और ईरान बातचीत पर राज़ी हों और समस्या का कोई शान्तिपूर्ण समाधान तलाशा जा सके। पिछले काफी वक्त से एक के बाद एक समस्या के चलते मध्यपूर्व लगातार तनाव की जद में रहा है। ऐसे में ईरान और अमरीका के दरम्यान नए विवाद से हालात और बदतर हो सकते हैं, जिनका असर दुनिया के दूसरे देशों पर भी होना स्वाभाविक है। भारत का सदा से कहना है कि वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर संयुक्तराष्ट्र के फैसले का सम्मान करेगा, किसी एक देश का नहीं। भारत दोनों पक्षों के बीच बातचीत और शान्तिपूर्ण समाधान के पक्ष में है। अमरीका द्वारा ईरान पर फिर से प्रतिबन्ध चस्पाने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर विपरीत असर हो रहा है। ईरान अरसे से भारत का प्रमुख तेल निर्यातक रहा है। भारत के ईरान और अमरीका दोनों से मैत्री सम्बन्ध रहे हैं। वह इनमें से किसी के साथ सम्बन्धों में खटास से बचना चाहता है, इसलिए बातचीत और शान्तिपूर्ण समाधान की बात कर रहा है। [audioplayer file="http://airworldservice.org/hindi-commentary/Hindi--Sam-Varta-12-May-19.mp3"]

आई.बी.एस.ए. का कायाकल्प


भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका यानि आई.बी.एस.ए. के प्रतिनिधियों की एक बैठक हाल ही में केरल के कोच्चि में हुई। इस मौके पर नवें आई.बी.एस.ए. त्रिपक्षीय मंत्री आयोग की सितम्बर 2018 में संयुक्तराष्ट्र महासभा के दरम्यान हुई बैठक के फैसलों पर आगे विचार किया गया। आई.बी.एस.ए. भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका के तौर पर दुनिया के तीन बड़े़ लोकतान्त्रिक मुल्कों और मुख्तलिफ महाद्वीपों में मौजूद अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग का बेजोड़ मंच है। संयोग की बात है कि ये तीन देश अनेक दूसरे मामलों में भी एक-दूसरे के समकक्ष हैं। ये सभी विकासशील, बहुभाषी, बहुसाँस्कृतिक, बहुजातीय और बहुधर्मी देश हैं। इतनी समानताओं को देखते हुए ही जून 2003 में ब्राज़ीलिया में सम्पन्न विदेशमन्त्रियों की बैठक में आई.बी.एस.ए. की नींव रखी गई। इसी सिलसिले में हर साल 15 जून को आई.बी.एस.ए. दिवस भी मनाया जाता है।   आई.बी.एस.ए. समान विचारधारा वाला एक दक्षिण-दक्षिण समूह है, जिसका लक्ष्य अपने नागरिकों और विकासशील मुल्कों की भलाई के लिए संधारणीय विकास हासिल करना है। इसके लिए संगठन में लोकतान्त्रिक, मानवीय, न्यायसम्मत और बहुलतावादी सिद्धान्तों, मूल्यों और कार्यशैली को स्वीकार किया गया है। इसके तहत सरकारों के स्तर पर सहयोग, समान हित के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सहभागिता, आपसी हित के मामलों पर त्रिपक्षीय साझेदारी और विकासशील मुल्कों से जुडे़ विषयों में आपसी मदद की नीतियों का पालन किया जाता है। ज़रूरत पड़ने पर तीनों पक्ष मिलकर संयुक्त कोष के उपयोग के लिए  भी तैयार रहते हैं। इस प्रकार की परस्पर सहयोगी नीतियों के चलते ही आई.बी.एस.ए. सदस्य देशों के बीच सभी स्तरों पर सहयोग का अद्वीतीय मंच बनकर उभरा है। फिलहाल संगठन के सदस्यों के बीच अनेक ग़ैर-परम्परागत क्षेत्रों में भी सराहनीय सहयोग जारी है; जिनमें कौशल विकास और विशेषज्ञों का आदान-प्रदान शामिल है। अब तक आई.बी.एस.ए. के पाँच शिखर सम्मेलनों का आयोजन हो चुका है। पाँचवें शिखर सम्मेलन का आयोजन 2011 में प्रीटोरिया में हुआ था। आई.बी.एस.ए. के छठे शिखर सम्मेलन की मेज़बानी भारत को सौंपी गई है। फिलहाल, तीनों पक्षों के प्रमुख नेताओं की सहूलियत को देखते हुए शिखर सम्मेलन का कार्यक्रम तय करने का प्रयास किया जा रहा है। यह भी अद्भुत संयोग है कि संगठन के तीनों सदस्यों में चुनाव की प्रक्रिया जारी है और इसके समापन पर आगामी शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा सकेगा। इस बीच, आई.बी.एस.ए. के मंत्रीसमूह और कार्यसमूहों की बैठकें नियमित तौर पर जारी हैं और सभी पक्षों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त कार्यक्रमों और गतिविधियों का संचालन विधिवत् किया जा रहा है। 2004 में संगठन की एक अहम परियोजना पर काम आरम्भ हुआ जिसे आई.बी.एस.ए. निर्धनता और भूख निवारण निधि का नाम दिया गया। इस परियोजना के तहत प्रगतिशील देशों में विकास कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसके अंतर्गत अब तक 20 सहभागी देशों में स्वच्छ पेयजल, कृषि, पशुपालन, सौर ऊर्जा, अपशिष्ट-निपटान और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों में 31 कार्यक्रमों का आरम्भ किया जा चुका है। इनकी मार्फत संधारणीय विकास लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रयास किया जा रहा है। आई.बी.एस.ए. निधि को अनेक सम्मान मिल चुके हैं; जिनमें हैती और गिनिया-बासु में संचालित कार्यक्रमों के लिए 2006 का संयुक्तराष्ट्र दक्षिण-दक्षिण सहभागिता पुरस्कार, दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए 2010 का एम.जी.डी. पुरस्कार और तीनों देशों में विकास अनुभव साझा करने के लिए 2012 का दक्षिण-दक्षिण चैम्पियन्स पुरस्कार शामिल हैं। आई.बी.एस.ए. त्रिपक्षीय सहयोग का एक और उदाहरण साझा नौसैनिक अभ्यास है, जिसे आई.बी.एस.ए.-एम.ए.आर. यानि मैरीटाइम एक्सरसाइज़ का नाम दिया गया है। अब तक आई.बी.एस.ए.-एम.ए.आर. के छह चरण पूरे हो चुके हैं, जिनमें से अन्तिम अक्तूबर 2018 में दक्षिण अफ्रीका के तट पर हुआ था। कोच्चि में सम्पन्न बैठक के दौरान हालिया दौर में जारी गतिविधियों की प्रगति, आपसी सहयोग गहराने, पर्यटन विकास और दक्षिण-दक्षिण सहयोग विस्तार के उपायों पर चर्चा की गई। प्रतिनिधियों यानि शेरपाओं ने संयुक्त कार्यसमूहों की प्रगति की समीक्षा की। प्रतिनिधियों ने पिछले साल आई.बी.एस.ए. की 15वीं सालगिरह के आयोजनों पर सन्तोष ज़ाहिर किया। जनवरी 2019 में नई दिल्ली में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति द्वारा दिए गए पहले ‘गाँधी-मण्डेला स्मारक स्वाधीनता भाषण’ के आयोजन की तारीफ करते हुए सदस्यों ने इसे आगे भी जारी रखने की अनुशंसा की। इसके अलावा भी आपसी सहयोग विस्तार के नए क्षेत्रों की तलाश पर भी विचार-विमर्श किया गया। अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय [audiopalyer file ="http://airworldservice.org/hindi-commentary/Hindi--Sam-Varta-11-May-19.mp3"]