ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने के लिए बनी नियमावली

पोलैंड के कातोवित्स में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन सम्पन्न हो गया है। जिसमें दो सप्ताह के गहन विचार मंथन और राजनीतिक विरोधों-प्रतिरोधों के बीच आखिरकार पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के लिए नियमावली पर सहमति बन गई है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस समझौते का लक्ष्य बढ़ते वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे ही नियंत्रित करना था।

पोलैंड में यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि दुनियाभर के देश ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल यानि आईपीसीसी के मुताबिक वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित करना संभव है। हालांकि इसके लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव भी आएगा।इसमें जैव ईंधन के इस्तेमाल को पूरी तरह से बंद करना होगा।

भारत ने 2015 पेरिस जलवायु समझौते को क्रियान्वित करने के लिए बनी नियमावली में निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए। पोलैंड के कातोवित्स सम्मेलन के पूर्ण सत्र में भारतीय वार्ताकार भारत के विधि, न्याय एवं सूचना तकनीकि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वैश्विक स्टॉक-टेक के मामले में समानता के तरीकों पर कड़ा रुख अपनाया।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रमुख तेल निर्यातक देशों रूस, सऊदी अरब, कुवैत और अमरीका के कड़े विरोधों के चलते आईपीसीसीके सुझावों को कातोवित्स नियमावली में शामिल नहीं किया जा सका। इसलिए कहा जा सकता है कि 200 देशों द्वारा स्वीकार की गई सहमति आईपीसीसी की रिपोर्ट पर आधारित है ना कि उसका निष्कर्ष।

कार्बन क्रेडिट के मामले को किस तरह से क्रियान्वित किया जाएगा, यह भी असहमति का एक बड़ा मुद्दा है,जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपायों के लिए पैसा जुटाने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है। कार्बन उत्सर्जन के व्यापार के बाज़ार तंत्र का नियंत्रण अगली सीओपी-25 बैठक के लिए टाल दिया गया, जो सितंबर 2019 में प्रस्तावित है। ऐसा माना जा रहा है कि नया बाज़ार तंत्र विभिन्न देशों द्वारा उपायों को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कातोवित्स सम्मेलन में एक और चिंताजनक तथ्य उभर कर सामने आया, जिसमें ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऊर्जा खपत और गैस उत्सर्जन के मामले पर किए गए अध्ययन में जो निष्कर्ष निकलकर सामने आए उनके मुताबिक वर्ष 2017 के मुक़ाबले इस बार हमने 2 प्रतिशत अधिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन किया है। इसमें सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी का रुझान चीन और अमरीका में देखा गया क्योंकि दोनों देशों में कोयले की खपत बढ़ी है। इसके अलावा अन्य देश भी अपने वादे के मुताबिक उत्सर्जन कम करने में नाकाम हो गए हैं। ऐसे रुझानों को रोकना होगा ताकि पेरिस समझौते को प्रभावी रूप से क्रियान्वित किया जा सके।

रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक जलवायु की वर्तमान प्रतिबद्धताओं के चलते 2030 तक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन घटाकर 53 से 56 गीगा टन तक लाया जा सकता है। लेकिन तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर ना बढ़ने देने के लिए उत्सर्जन को और कम करके 24 गीगा टन तक लाये जाने की ज़रूरत होगी।

लगभग 200 देशों को पेरिस समझौते की प्रक्रियाओं, दिशानिर्देशों, नियमों के क्रियान्वयन पर सहमति बनाने में 3 साल लग गए। अब माना जा रहा है कि 2020 के बाद जलवायु परिवर्तन पर सभी देश एक्शन में आ जाएंगे। कातोवित्स में सभी देशों द्वारा स्वीकार किए गए समझौते में 2015 के पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की एक नियमावली है जिसके तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी करना है। इससे 2020 के बाद जलवायु प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन का भी रास्ता साफ हुआ है, जिसे सभी देशों ने पेरिस समझौते के दौरान जताया था।

कातोवित्स सम्मेलन में इस पर भी सहमति बनी कि सभी देश ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और उसे कम करने के प्रयास की रिपोर्ट तैयार करेंगे, इसे एक उपलब्धि से कम नहीं माना जा रहा है। इसके अलावा अल्प विकसित देशों को आश्वस्त किया गया कि उन्हें ग्लोबल वार्मिंग के कारण आ रहे बदलावों को अपनाने और उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक सहायता मिलेगी, ताकि वो ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के बढ़ते जल स्तर और अन्य बदलावों का मुक़ाबला कर सकें।

भारत ने पोलैंड में सम्पन्न हुई बातचीत को सकारात्मक बताया। लेकिन कई अन्य पर्यावरण संगठनों ने सम्मेलन में निकले निष्कर्षों को कमजोर और अपूर्ण करार दिया है।

आलेख – बिमान बसु, वरिष्ठ वैज्ञानिक टिप्पणीकार

अनुवाद / स्वर – देवेन्द्र त्रिपाठी