आतंकवाद के विरुद्ध फ्रांस के कठोर क़दम

फ्रांस ने आगे बढ़कर जिस प्रकार पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया है उससे आतंकवाद के विरुद्ध भारत के सतत संघर्ष को और अधिक गति मिलने की संभावना है। फ्रांस को इस निर्णय की घोषणा तब करनी पड़ी जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इसी प्रकार के प्रयास विफल हो गए और आतंकवाद को सही नाम नहीं दिया जा सका। इस संबंध में सुरक्षा परिषद भारत के बहुचर्चित प्रस्ताव को पारित कराने में विफल इसलिए हुई क्योंकि एक बार फिर चीन ने इस कुख्यात आतंकी और उसके संगठन के विरुद्ध कार्रवाई के सामूहिक प्रयास को वीटो का प्रयोग कर निष्प्रभावी बना दिया।

यह घटनाक्रम पुलवामा के आतंकी हमले की ज़िम्मेदारी जैश ए मोहम्मद द्वारा लिए जाने के बाद विश्व भर में विरोध के बाद हुआजिसमें 40 से भी अधिक भारतीय सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई थी। इन कटु-परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने मसूद अजहर और उसके संगठनों से जुड़े सभी बैंक खातों को फ्रीज़ करने तथा किसी भी वित्तीय लेनदेन पर रोक लगाने के निर्णय की घोषणा की।

आतंकवाद को परास्त करने के लिए विशाल युद्ध में यह पहला कदम है। ऐसी संभावना कम ही है कि पाकिस्तान में सरकारआईएसआई और अन्य संस्थानों से मदद पाने मसूद को फ्रांस के इन प्रतिबंधों से धन की कोई कमी महसूस हो सकेगी। मगर इससे फ्रांस के निर्णय के रणनीतिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यह विश्व समुदाय के अग्रणी देशों में से एक तथा यूरोपीय संघ के एक महत्वपूर्ण देश द्वारा पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन द्वारा लगातार खड़ी की जा रही विरोध की दीवार को आगे बढ़कर तोड़ने एवं इस मुद्दे पर विश्व के मत को मजबूती प्रदान करने को प्रदर्शित करता है।

पिछली बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन द्वारा वीटो की शक्ति का उपयोग किए जाने पर वैश्विक आतंकवाद के विश्लेषकों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। बीते एक दशक में चीन ने पाकिस्तान के इस आतंकी संगठन को बचाने के लिए चौथी बार वीटो का प्रयोग किया है। इसके पहले चीन 2009, 2016 तथा 2017 में भी ऐसे प्रस्ताव गिरा चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति में भी उसने अभी अभी यही किया है।

चीन के कुकृत्य के विपरीतफ्रांस ने स्पष्ट रूप से घोषित किया कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में वह भारत के साथ सदा रहा है और रहेगा। फ्रांस के यह क़दम एक विशेष विश्वास दिलाने वाला था क्योंकि उसने कहा है कि वह यूरोपीय संघ के अन्य देशों के बीच भी अपने पक्ष प्रति समर्थन प्राप्त करने के प्रयास करेगा जिससे कि पाकिस्तान के इस आतंकी और उसके संगठन को कटघरे में खड़ा किया जा सके। फ्रांस के इस निर्णय का समर्थन बढ़ रहा है। फ्रांस के निर्णय के बाद जर्मनी ने भी इस विषय में ऐसा ही क़दम उठाने का संकेत दिया है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के एक महत्वपूर्ण सदस्य और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी सदस्य के रूप में फ्रांस ने निजी तौर पर उस समय यह कार्रवाई की है जब एक वैश्विक संस्था सामूहिक रूप में नहीं कर पाई। संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के होने तक विशेष रूप से वीटो शक्ति का कुछ ख़ास देशों द्वारा अनुचित प्रयोग किए जाने की स्थिति में अलग अलग देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र के बाहर आमसहमति बनाने पर अत्यधिक ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए।

हो सकता है कि कुछ संशोधनों पर पहले ही विचार चल रहा हो। चीन की जनता भी अपने नेतृत्व के अपरिपक्व दृष्टिकोण के प्रति अनभिज्ञ नहीं होगी। सुरक्षा परिषद में अपने निर्णय का बचाव करते हुए चीनी विदेश मंत्रालय का एक वक्तव्य इस मुद्दे पर काफ़ी सुरक्षात्मक दिखाई दिया। उसमें कहा गया कि चीन ने अपना मतदान इस प्रकार दिया जिससे कि समिति के पास इस विषय पर अध्ययन के लिए पर्याप्त समय रहे। इस प्रकारफ्रांस द्वारा उठाए गए क़दम वैश्विक आतंकवाद के काले बादलों में आशा की एक किरण प्रतीत हो रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में ये किरण और अधिक घनी होकर बिखरेंगी।

आलेख – एम के टिक्कू

अनुवादक – हर्ष वर्धन