अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव फिर हुआ स्थगित

अफगानिस्तान के चुनाव आयोग के प्रमुख हावा आलम नूरिस्तानी ने कहा है कि देश के राष्ट्रपति चुनाव पूर्व निर्धारित समय से 2 महीनों के लिए आगे बढ़ा दिए गए हैं। अब 28 सितंबर को चुनाव होंगे। चुनाव को स्थगित किए जाने से, संबंधित एजेंसियों को चुनाव कराने की तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल जाएगा और अक्टूबर में हुए संसदीय चुनाव के दौरान सामने आई समस्याओं से भी निपटने के तरीके तलाश लिए जाएंगे। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव अप्रैल में निर्धारित थे। उसके बाद नई तारीखों की घोषणा की गई और 20 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव के साथ ही देश के जिला परिषदों के और गजनी प्रांत के संसदीय चुनावों की भी तारीख निर्धारित की गई थी। अफगानिस्तान के चुनाव आयोग ने अब यह भी कहा है कि वह तभी चुनाव आयोजित करने में सक्षम हो पाएगा जब सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अपेक्षित धनराशि मुहैया कराई जाएगी। गौरतलब है कि 2018 में हुए संसदीय चुनाव में भी इसी तरह महीनों की देरी हुई थी। इसके बावजूद चुनावी इंतजाम नाकाफी थे। अनेक स्थानों पर निर्वाचन अधिकारी नहीं उपलब्ध हो पाए थे और तमाम निर्वाचन सामग्री भी मुहैया नहीं कराई जा सकती थी। अब कहा जा रहा है कि चुनावों की तारीख बढ़ाकर सितंबर इसलिए की गई ताकि चुनाव नियमों के अनुसार कराये जा सकें, मतदाताओं का पंजीकरण हो सके और चुनाव में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

अफगानिस्तान में सुरक्षा हालात अभी भी बेहतर नहीं हुए हैं। हाल के वर्षों में तालिबान और मजबूत हो कर उभरा है और सरकार तथा सत्ता व्यवस्था के विरुद्ध उसने अनगिनत गतिविधियां संचालित की हैं। इस समय तालिबन का अफगानिस्तान के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में नियंत्रण बढ़ा है जबकि शहरी इलाकों पर गनी सरकार का नियंत्रण बरकरार है। अमरीका द्वारा हाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार काबुल सरकार का नियंत्रण अफगानिस्तान के महज 56% भूभाग पर है। लगातार टकराव के चलते बड़ी संख्या में नागरिक मारे जा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कुछ स्थानों पर विद्रोही गुटों ने समानांतर रूप से छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना कर ली है। 17 वर्षों से चले आ रहे युद्ध के हालात को समाप्त करने के लिए तमाम राजनयिक और कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद अफगानिस्तान में सुरक्षा स्थितियां हाल के महीनों में तेजी से बिगड़ी हैं। इसमें सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अफगानिस्तान की धरती को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों के फलने-फूलने के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका बढ़ गई है। दुनिया के अन्य कट्टरपंथी धड़े भी अफ़गानिस्तान जैसे देशों की तलाश में है ताकि अपने आप को मजबूत कर सकें। पश्चिम एशिया से इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन के अफगानिस्तान में प्रवेश से देश के सुरक्षा हालात और खराब हुए हैं।

तालिबान के साथ अमेरिका की बातचीत चल रही है ऐसे में अफगान अधिकारियों ने अपना क्षोभ जाहिर किया है, क्योंकि उन्हें लगता है कि देश की सरकार को कम महत्व दिया जा रहा है। तालिबान, अफगान सरकार को कठपुतली शासन की संज्ञा देता है। वार्ता में शामिल विशेष अमेरिकी दूत ज़ालमई खलीलज़ाद अमरीका की तरफ से बातचीत का नेतृत्व कर रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में दोहा में संपन्न हुई वार्ता के बाद उन्होंने कहा कि कुछ प्रगति ज़रूर हुई है, लेकिन बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल सका है, जिससे अमरीकी सेनाओं की वापसी के बारे में कुछ फैसला हो सके।

अफगानिस्तान की सुरक्षा को एक अन्य पहलू भी प्रभावित कर रहा है, जो है सीरिया से शिया विद्रोहियों की वापसी। ईरान ने हजारों शिया अफगानियों को प्रशिक्षित कर सीरिया के विद्रोही संघर्ष में फ़ातेमियों लड़ाका के रूप में भेजा था, जो अब बड़ी संख्या में अफगानिस्तान वापस आ रहे हैं और अपने जीवन यापन के लिए और अपनों के साथ एकीकृत होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि फ़ातेमियों लड़ाकों कों इस बात का डर है कि अफगान सुरक्षा बल उन्हें तितर-बितर करने की कार्रवाई कर सकते हैं। अब अफगानिस्तान को इस बात का की चिंता सता रही है कि यह सिया लड़ाके ईरान और सऊदी अरब के बीच एक नए युद्ध का कारण बन सकते हैं, क्योंकि एक तरफ ईरान खुद को शिया समुदाय का संरक्षक मानता है तो दूसरी ओर सऊदी अरब दुनिया भर में सुन्नी समुदाय का सबसे बड़ा समर्थक और संरक्षक है।

अफगानिस्तान में 90 के दशक में छिड़े नागरिक युद्ध के बीच कुछ विदेशी ताकतों को अफगानिस्तान में दोनों गुटों में दरार पैदा करने में की रणनीति में सफलता मिली, क्योंकि वह छद्म युद्ध का रास्ता तलाश रही थीं। अफगानिस्तान में अब एक नई चिंता यह भी है कि शिया अल्पसंख्यकों पर इस्लामिक स्टेट समर्थक सुन्नी कट्टरपंथियों द्वारा हमले बढ़ गए हैं, जिससे इस बात की संभावना अधिक हो गई है कि ईरान देश में अपनी मध्यस्थता की भूमिका बढ़ा सकता है। इन सब के बीच अफगानिस्तान में आए फ़ातेमियों लड़कों के फिर से एकीकरण से शांति की राह तलाशने में मदद मिल सकती है। लगातार हमलों का शिकार हो रहे अफगानिस्तान के शिया बहुल हजारा में इस्लामिक स्टेट की अफगान शाखा ने हाल ही में आतंकी हमले किए थे।

आलेख- डॉ स्मिता, अफगान-पाक मामलों की रणनीतिक विश्लेषक