आतंक के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव

यूरोपीय संघ या ईयू की विदेश नीति प्रमुख फेदेरिका मोग़ेरिनि ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी से वार्ता की और इस्लामाबाद के साथ नई सामरिक सक्रियता योजना आरम्भ करने पर सहमति जताई। ईयू द्वारा पुलवामा आतंकी हमले की कड़ी निंदा किए जाने के कई सप्ताह बाद ईयू के उच्च स्तरीय मंडल ने इस्लामाबाद की यात्रा की है। पाकिस्तान आधारित जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी। ईयू ने पाकिस्तान से कहा कि न सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध आतंकी गुटों बल्कि इस तरह के हमलों की ज़िम्मेदारी लेने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ भी लगातार और स्पष्ट कार्रवाई करके आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करता रहे।

जर्मनी, पोलैंड, यूके और फ्राँस जैसे कुछ यूरोपीय देशों ने भी पाकिस्तान से संचालित होने वाले आतंकी गुटों के प्रति चिंता व्यक्त की है। जर्मन विदेश मंत्री हेइको मास ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष से विशेष तौर से सीमा पार आतंकवाद समाप्त करने के लिए क़दम उठाने के लिए कहा।

बाद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रतिबंध समिति के तीन स्थाई सदस्यों अमरीका, फ्राँस और यूके ने जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अज़हर को स्वीकृत आतंकी और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी संगठन का सरगना घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया। चीन के अतिरिक्त रूस और जर्मनी सहित सभी 14 सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया।  

पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की गई कि ये भारत के ख़िलाफ़ हमले करने वाले आतंकी गुटों से निपटने में गंभीर नहीं है। चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अन्य सभी देशों के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाने का निर्णय लिया और पाकिस्तान का बचाव किया। हालांकि पाकिस्तान में बहुत से समीक्षक इसे असंगत मानते हैं कि ये अपनी कूटनीतिक ऊर्जा को एक ऐसे गुट के सरगना पर बेकार कर रहा है जिस पर ये ख़ुद ही प्रतिबंध लगा चुका है।  

पाकिस्तान की मीडिया ख़बरों के अनुसार ईयू विदेश नीति प्रमुख से मुलाक़ात के दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्री क़ुरैशी और उन के दल को सुश्री मोग़ेरिनि को ये जताने के लिए प्रयास करना पड़ा कि पाकिस्तान आतंकवाद और चरमपंथ का सामना करने के लिए लड़ रहा है और विश्व समुदाय के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं के लिए ज़िम्मेदार है।  

ईयू, अमरीका, ब्रिटेन और जर्मनी ने पाकिस्तान को आतंक के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार किया। आतंकी गतिविधियों की वजह से ही पुलवामा के बाद परमाणु शक्ति सम्पन्न दो देश बड़े युद्ध की कगार पर पहुँच गए थे। हालांकि अभी भी ये चिता बनी हुई है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों के ख़िलाफ़ दिखावे भर की कार्रवाई करने से आगे नहीं बढ़ेगा। इस्लामाबाद भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर में आतंकी हमले करवाने के लिए इन आतंकी गुटों का अपनी सेना के लगभग विस्तारित खंड के रूप में लंबे समय से इस्तेमाल करता आया है।  

इन दिनों पाकिस्तानी मीडिया में आलोचकों के दिमाग़ में जो एक बड़ा मुद्दा घूम रहा है वो है फाइनैंशल ऐक्शन टास्क फोर्स या वित्त कार्य बल द्वारा प्रतिबंधित करने की धमकी। पेरिस आधारित एक संस्था विश्व भर में आतंकी वित्त पोषण और हवाला को रोकने का प्रयास कर रही है और इस की समीक्षा करने वाली है कि पाकिस्तान ने वित्त कार्य बल की संदिग्धों की सूची से हटने के लिए वैश्विक मानकों का पालन करने के लिए पर्याप्त प्रगति की है या नहीं। गंभीर आर्थिक संकटों की टीस सहने वाले पाकिस्तान को डर है कि लंबे समय तक संदिग्ध सूचि में बने रहने या फिर बाद में प्रतिबंधित सूची में शामिल हो जाने से दीर्घावधि में पाकिस्तान को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।  

अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने पाकिस्तान का जाना-पहचाना सा ही रवैया रहता है। जितना दबाव बढ़ता है, ये इन गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए उतना ही मजबूर होता है। 9/11, मुंबई हमले और पठानकोट हमलों के बाद भी ऐसा ही देखा गया था।  

पर एक बार दबाव हट जाने के बाद ये फिर से आतंक को अपनी विदेश नीति के हिस्से के तौर पर इस्तेमाल करने की पुरानी नीति का पालन करने लगता है। पाकिस्तानी नेतृत्व भी हमेशा दिखावे के लिए सभी लंबित मुद्दों को शातिंपूर्ण तरीक़े से सुलझाने के लिए संवाद करने का स्वांग करते आए हैं। लेकिन असल में जब भी दोनों देशों के बीच वार्ता शुरू करने का कुछ प्रयास किया जाता है तब हर बार पाकिस्तान के असली शासक माहौल बिगाड़ने के लिए आतंकी गुटों को सक्रिय कर देते हैं। इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान समर्थित आतंक के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ काम करने की भारत की नीति बहुत व्यावहारिक लगती है।

केवल सतत अंतरराष्ट्रीय दबाव और पाकिस्तान में असल हालात का जायज़ा लेते रहने से ही इस्लामाबाद में सही दिशा में सही क़दम उठाए जाएँ और क्षेत्रीय तनाव कम होगा।

आलेख- डॉ. अशोक बेहुरिया, संयोजक, दक्षिण एशिया केन्द्र, आईडीएसए

अनुवाद- नीलम मलकानिया