टिकाऊ भविष्य के लिए, विश्व के सामने आया ब्लूप्रिंट

तेजी से प्रदूषित हो रही पृथ्वी, बढ़ते तापमान और पृथ्वी की कम हो रही गुणवत्ता को सुरक्षित करने के लिए दुनिया भर के देशों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की है। अधिक टिकाऊ भविष्य के लिए पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां से निपटने के और नए तरीके तलाशने पर विश्व समुदाय में सहमति बनी है, ताकि धरती को सुरक्षित बनाया जा सके। यह प्रतिबद्धता केन्या के नैरोबी में आयोजित पांच दिवसीय संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा में जुटे संयुक्त राष्ट्र संघ के 179 सदस्य देशों ने जताई है। सभा के चौथे सत्र की थीम रही पर्यावरण चुनौतियों से निपटने के नए तरीके और टिकाऊ उत्पादन एवं खपत। सभा में उपस्थित दुनिया भर के देशों के मंत्रियों ने बदलाव लाने के लिए पूरी दृढ़ता से ब्लूप्रिंट दुनिया के सामने रखा। सभी इस बात पर सहमत हुए कि खपत और उत्पादन को टिकाऊ बनाकर पर्यावरण की चुनौतियों से निपटा जा सकता है और बेतहाशा प्लास्टिक के प्रसार को रोका जा सकता है।

सभा में उपस्थित प्रतिनिधियों ने अपने राष्ट्रीय संसाधनों का प्रबंधन सुधारने पर सहमति व्यक्त की। कहा गया कि संसाधनों का पूर्ण चक्र में इस्तेमाल होगा और कम से कम कार्बन उत्सर्जन के तौर तरीकों पर काम होगा।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के चौथे सत्र में वैश्विक पर्यावरण चुनौतियों का हल ढूंढने के लिए एक मसौदा पत्र तैयार किया गया। इस पर सहमति बनी और उसके बाद मंत्री स्तरीय शिखर वार्ता हुई। बैठक में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के कार्यक्रम के अंतर्गत 202021 में किए जाने वाले कार्यों और बजट को मंजूरी मिली।

सभा में 26 प्रस्तावों और फैसलों को स्वीकार किया गया। इस दौरान मंत्री स्तरीय घोषणा पत्र भी स्वीकार किया गया, जिसमें 2030 तक एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के उत्पादों में व्यापक कमी की बात कही गई है। इसमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के वैश्विक पर्यावरणीय आंकड़ों की रणनीति को 2025 तक साथ देने की बात भी कही गई। घोषणा पत्र में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर नाइट्रोजन के इस्तेमाल की क्षमता कम है। इसके परिणाम के रूप में प्रदूषण तत्व नाइट्रोजन से प्रतिक्रिया चक्र के कारण मानव स्वास्थ्य के लिए चुनौती और खतरा बनता जा रहा है, इकोसिस्टम को प्रभावित कर रहा है, जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत में छिद्र होने के लिए भी इसे ही जिम्मेदार माना जा रहा है। उल्लेखनीय यह है कि एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और नाइट्रोजन के टिकाऊ प्रबंधन के विचार का नेतृत्व भारत ने किया।

इस बैठक में समुद्र और खतरे में पड़े इकोसिस्टम को बचाने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया गया। दुनिया भर के मंत्रियों ने समुद्र में बढ़ रहे प्लास्टिक कचरे और सूक्ष्म प्लास्टिक पर कई प्रस्ताव स्वीकार किए। संयुक्त राष्ट्र के साथ बहुपक्षीय मंच की स्थापना की प्रतिबद्धता जताई गई, जिसका काम होगा कचरे को समाप्त करने के लिए तत्काल कदम उठाना और माइक्रोप्लास्टिक्स को रोकना।

सम्मेलन में रिकॉर्ड 5000 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। 5 देशों की सरकार के प्रमुख, 157 पर्यावरण मंत्री और उप-मंत्री भी सम्मेलन में उपस्थित रहे। अन्य प्रतिनिधियों में वैज्ञानिक, शोधार्थी, व्यापार जगत के लोग और सामाजिक कार्यकर्ता भी सम्मेलन में उपस्थित हुए।

घोषणा पत्र में गरीबी उन्मूलन के लिए गैर टिकाऊ खपत और उत्पादन से टिकाऊ खपत और उत्पादन की तरफ रुख करना, प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित और प्रबंधित करना और टिकाऊ विकास के लिए अन्य उद्देश्यों का अनुपालन करना शामिल था।

सम्मेलन में खेती की टिकाऊ पद्धति को प्रोत्साहित कर खाद्य सिस्टम को दुरुस्त करने और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के जरिए गरीबी से निपटने पर भी सहमति व्यक्त की गई।

इस दौरान छठा ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक भी आरंभ किया गया। इसमें मानवता की भलाई और स्वास्थ्य को देशों के पर्यावरण से जोड़कर दिखाया गया। रिपोर्ट की थीम थी स्वस्थ धरती, स्वस्थ लोग यानि हेल्दी प्लेनेट, हेल्दी पीपल। इसे वैश्विक पर्यावरण के समग्र आंकलन के लिए सबसे सटीक माना गया। इसमें अनेक विषय और मुद्दे शामिल हैं और उपाय की क्षमता भी इसी में है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर दुनिया भर में जैसी व्यवस्था चल रही है ऐसी चलती रही तो परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं और पृथ्वी को बेहतर करने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने की जरूरत है।

रिपोर्ट का लक्ष्य है 2030 तक टिकाऊ विकास के लक्ष्य को हासिल करने में नीति निर्माताओं और समाज को मदद देना।

 रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर तत्काल कड़े कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक जल और वायु प्रदूषण के कारण लाखों की संख्या में लोग बेवजह और असमय मौत का शिकार हो सकते हैं। इसमें कहा गया है कि अगर पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए हम पूरी मजबूती के साथ बदलते नहीं हैं तो इस सदी के मध्य तक एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के शहरों में लाखों की संख्या में लोग मौत का शिकार बनेंगे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साफ पानी में भी प्रदूषण के कारण एंटीमाइक्रोबॉयल प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाएगी जो मौतों का बड़ा कारण बनेगा। दुनिया की शीर्ष पर्यावरण संस्था सितंबर में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्य सम्मेलन से पहले वैश्विक एजेंडा तय करेगी।

आलेख: केवी वेंकटसुब्रमनियन, वरिष्ठ पत्रकार