बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव-चीन का फैलता जाल

दूसरी बेल्ट एंड फोरम इनिशिएटिव की बैठक पिछले हफ़्ते बीजिंग में सम्पन्न हुई। इसमें 36 देशों के प्रमुखों ने भाग लिया। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश सहित लगभग 90 संगठनों के 5000 से अधिक प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया, जिसमें, मीडिया,अकादमिक, कॉर्पोरेट सहित अन्य क्षेत्रों के लोग शामिल थे। इस बैठक में इन्डोनेशिया को छोड़कर सभी दक्षिण-पूर्व देश शामिल हुए। इसी तरह तुर्कमेनिस्तान को छोड़कर सभी मध्य एशियाई देश, 8 दक्षिण एशियाई देशों में 2 देश, पूर्व एशिया से मंगोलिया, पश्चिम एशिया से यूएई,रूस और अज़रबैजान समेत 12 यूरोपीय देश, 5 अफ्रीकी देश और एक लैटिन अमरीकी देश चिली इस बैठक में उपस्थित रहे।

ब्रिक्स के 5 में से 3 देशों के अलावा अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ़्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, टर्की सहित कई अन्य बड़े देशों ने बीआरआई की दूसरी बैठक से दूर रहकर अपना स्पष्ट संदेश दे दिया है। इस बैठक के एक दिन पहले चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव: प्रगति, योगदान एवं संभावनाओं पर एक आंकलन पत्र जारी किया था।

मार्च 2015 में चीन ने एक श्वेत पत्र जारी किया था, जिसमें इस योजना के संयोजन के प्रमुख विषयों जैसे संपर्क, व्यापार प्रमोशन, वित्तीय एकीकरण और लोगों से लोगों के संपर्क को शामिल किया गया था। बी आर आई के दूसरे सम्मेलन और इसके अलावा इससे जुड़ी बैठकों में साझा भविष्य, वैश्वीकरण के नए नियम, बहुलतावाद और चीन की विस्तारवादी नीतियों पर मुख्यतः चर्चा हुई।

राष्ट्रपति षी ज़िनपिंग ने बैठक में अपने संबोधन में उच्च गुणवत्ता, टिकाऊ विकास, जोखिम से मुकाबला, सस्ती कीमतों, बुनियादी ढांचे का समग्रता में विकास जैसे विषयों पर बल दिया। बी आर आई परियोजनाओं को लेकर काफी समय से हो रही आलोचना है के कारण चीन के लिए इन पर फोकस करना ज़रूरी हो गया था। केन्या और श्रीलंका जैसे देशों में ऋण जाल की रणनीति को लेकर बीआरआई की आलोचना हो रही। ऋण जाल रणनीति के तहत केन्या में भ्रष्टाचार के कारण राजनीति में भूचाल आ गया था। बी आर आई की इस दूसरी बैठक में सीईओ सम्मेलन में 64 बिलियन डॉलर मूल्य के समझौते की खबर सामने आई, लेकिन इसका ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया।

बीआरआई को सबसे ज्यादा समर्थन छोटे देशों से मिल रहा है, जिन्हें अपनी संपर्क परियोजनाओं के लिए वित्तीय मदद की दरकार है। इसके अलावा रूस भी बी आर आई का पुरजोर समर्थन करता दिख रहा है। राष्ट्रपति पुतिन ने 2014 में बने यूरेशियाई आर्थिक संघ को बी आर आई में विलय का सुझाव भी दिया है। यह आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रपति पुतिन ने अपने भाषण में आतंकवाद के विस्तार और बढ़ते गैरकानूनी शरणार्थियों की समस्या को आर्थिक विकास से जोड़कर परिभाषित किया। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना से रूस भी जुड़ सकता है।

दूसरी ओर मलेशिया ने चीन पर भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करने का आरोप लगाते हुए अपने देश में कई बीआरआई परियोजनाओं को रद्द कर दिया। यही नहीं पाकिस्तान ने भी 14 बिलियन डॉलर की डायमार भासा डैम परियोजना को भी रद्द कर दिया। पाकिस्तान की सीनेट ने कहां है कि ग्वादर बंदरगाह से 93% लाभ चीन को होगा। तुर्की भी बी आर आई परियोजनाओं में ऋण को लेकर चिंता जताई है इसके अलावा तुर्की चीन के जिनजियांग प्रांत में अपने ऊईगर नागरिकों को लेकर चीन के रवैए पर उसकी आलोचना की है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि अब तक बी आर आई की दो बैठकों में जो निष्कर्ष निकले हैं उनका क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था की वर्तमान दशा पर क्या असर पड़ता है। साथ ही अलग-अलग देशों पर इसका किस तरह से प्रभाव देखने को मिलता है। अगर आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो बी आर आई परियोजनाओं से जुड़े निवेश अब तक 100 बिलियन डॉलर तक ही सीमित है, जबकि 2013 में शुरुआती घोषणा में 1 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की थी। दूसरी बीआरआई बैठक में चीन के नेताओं ने सुझाव दिया कि धन उपलब्ध कराने के लिए संयुक्त प्रयास (जाइंट फंडिंग) की संभावनाओं का पता लगाया जाए।

यह महत्वपूर्ण है कि अब तक बीआरआई की दो बैठकें हो चुकी हैं उसके बावजूद इसे संस्थागत रूप नहीं दिया जा सका है और अभी भी चीन ही इसका नेतृत्व कर रहा है। इसके अलावा बीआरआई में सदस्यों की कमी है, क्योंकि 2017 में पहली बैठक में शामिल हुए कई देशों ने 2019की दूसरी बैठक से अपने को दूर रखा। इसके अलावा बीआरआई के अंतर्गत परियोजनाओं की कोई परिभाषा नहीं है और इससे पहले 1990के पश्चिमी विकास अभियान की कुछ परियोजनाओं को भी बी आर आई के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में शामिल किया गया है।

तीन दिवसीय सम्मेलन के बाद एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया जिसमें कहा गया कि हम सभी देशों की संप्रभुता और उसके राष्ट्रीय एकीकरण का सम्मान करते हैं और यह प्रतिबद्धता जताई गई कि सभी देशों को अपने नियमों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अपनी विकास योजनाओं को परिभाषित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी और उसका अधिकार है। लेकिन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना, जो अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान के कब्जे वाले भारत के कश्मीर क्षेत्र से होकर गुज़रती है, इस तथ्य को देखते हुए कहा जा सकता है कि संयुक्त बयान में गंभीरता की कमी है। भारत ने चीन के सामने कुछ सीपीईसी परियोजनाओं को लेकर लगातार अपना विरोध जताया है।

आलेख- प्रो॰ श्रीकांत कोंडापल्ली, अध्यक्ष, सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़, जेएनयू