भारत ने सब-सोनिक क्रूज मिसाइल का किया सफल परीक्षण


भारत ने इस सप्ताह ओडिशा के परीक्षण रेंज से देश में निर्मित लंबी दूरी की सब-सोनिक क्रूज मिसाइल निर्भयका सफलतापूर्वक परीक्षण किया। निर्भय मिसाइल जमीन पर हमला करने वाली मिसाइल है, जो अपने साथ परमाणु बम ले जाने में सक्षम है और 1000 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती…

विषय- सूडान संकट


 सूडान में पिछले एक सप्ताह में जितने बदलाव देखने को मिले उतने बदलाव राष्ट्रपति उमर अल बशीर के शासन में बीते 3दशकों में नहीं हुए। राष्ट्रपति उमर अल बशीर कई महीनों के विरोध प्रदर्शनों के बाद इस महीने की शुरुआत में अपदस्थ कर दिए गए। वर्ष 1989 में सत्ता पर कब्जा करने के…

पाकिस्तान में हजारा समुदाय की बदहाली


क्वेट्टा में हाल ही में हुए आतंकी हमले में 20 लोग मारे गए और 48 लोग घायल हुए थे। इस हमले ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की बदहाल स्थिति को उजागर किया है और इससे निशाना बनाकर किए जाने वाले हमले और हजारा समुदाय को व्यवस्थित ढंग से खत्म करने के…

बढ़ते तनाव के मध्य उत्तर कोरिया में फेरबदल


उत्तर कोरिया तथा अमरीका के बीच बढ़ते तनाव विशेषकर बिना किसी वक्तव्य के संक्षिप्त की गई हनोई वार्ता के बाद के परिदृश्य में प्योंगयांग में उत्तर कोरिया की 14वीं सुप्रीम पीपल्स असेंबली (एसपीए) का पहला सत्र देश के नेतृत्व के लिए एक बड़े फेरबदल का गवाह बना | उत्तर कोरिया…

आई॰एम॰एफ॰ ने भारत की आर्थिक विकास कथा की प्रशंसा की  


विगत पाँच वर्षों में भारत की औसत आर्थिक वृद्धि सात प्रतिशत से अधिक रही है |  इस कारण भारत विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन सका है | बहुत से देशों की आर्थिक मंदी, वैश्विक निवेशों पर मंडरा रहे नकारात्मक जोखिम के ख़तरों, ब्रेग्जिट पर…

पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों का वॉशिंगटन में विरोध-प्रदर्शन।


अमरीका में रहने वाले सैंकड़ों पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों ने हाल ही में वॉशिंगटन में ज़ोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी पाकिस्तान में रहने वाले धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यकों पर पिछले कई दशकों से जारी अत्याचारों की खिलाफत कर रहे थे। इन लोगों ने पाकिस्तान की सरकार द्वारा किए जा रहे शोषण का भी मुखर विरोध किया। इन प्रदर्शनकारियों में भारत से पाकिस्तान गए शरणार्थियों यानि मुहाजिरों, बलूचों, पश्तूनों और दूसरे धर्मों के अल्पसंख्यक शामिल थे।   मोहाजिर ग्रुप और मुत्तहिदा कौमी मूवमेण्ट, यू.एस.ए. के प्रदर्शनकारियों ने अमरीकी मीडिया से बातचीत में बताया कि पाकिस्तानी सेना अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की बहुत से घटनाओं में शामिल रही है। इसके चलते हर दिन अल्पसंख्यकों के मारे जाने या ग़ायब होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। उनके मुताबिक वे पाकिस्तानी प्रदर्शनकारियों के तौर पर व्हाइटहाउस और मुख्तलिफ मानवाधिकार संगठनों के सामने अपनी आवाज़ बुलन्द करना चाहते हैं। उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और दूसरे मजलूमों पर जुल्म के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय मदद की गुज़ारिश की।   प्रदर्शनकारियों के मुताबिक पाकिस्तान में अनेक समूह आत्मनिर्णय का अधिकार चाहते हैं, ताकि उन्हें सरकार और जेहादियों के जुल्मों से निजात हासिल मिल सके। उनका आरोप है कि पाकिस्तान एक ऐसा नर्क बन चुका है, जहाँ अल्पसंख्यकों के जातीय और धार्मिक अधिकारों का गला घोंटा जाता है। वहाँ के अल्पसंख्यक राज्यप्रायोजित आतंकवाद से आजिज आ चुके हैं। उनके मुताबिक वहाँ की ताकतवर सेना कभी भी जेहादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती, जबकि वे भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की वजह बने हुए हैं। उनका यह भी आरोप है कि पाकिस्तानी सेना ने जातीय और मजहबी अल्पसंख्यकों को आतंकित करने के लिए अनेक जेहादी समूह बनाए हैं। ये समूह पाकिस्तानी सेना की सबसे बड़ी ताकत हैं। सेना ही इन जेहादियों को ट्रेनिंग और हथियार मुहैया कराती है। इसलिए वे सेना के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। प्रदर्शनकारियों ने मीडिया को बताया कि पाकिस्तान और उसकी कुख्यात इन्टर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस का आतंकियों को संरक्षण देने, मुल्क को उनके लिए सुरक्षित पनाहगाह बनाने और हथियार देकर मुख्तलिफ इलाकों में बसाने का लम्बा इतिहास रहा है। इससे न केवल पाकिस्तान के भीतर बल्कि भारत, अफगानिस्तान और ईरान जैसे पड़ौसी मुल्कों में भी आतंक का माहौल बनाने में मदद मिलती है। पाकिस्तान में बसने वाले अल्पसंख्यकों को यकीन है कि वह कभी भी इन जेहादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा। दूसरी तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों को गुमराह भी करता रहेगा। पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा दी जाने वाली धनराशि का दुरुपयोग करता रहा है। वह इस रास्ते से मिले फण्ड्स को गलत उद्देश्यों के लिए खर्च करता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया को दहलाने वाले ओसामा और अज़हर मसूद जैसे आतंकी वहाँ बड़े आराम से रहते रहे हैं। पाकिस्तान का महज़ एक ही लक्ष्य और उद्देश्य है और वह है; आतंकवाद। प्रदर्शनकारियों की अगुवाई कर रहे अमरीका में एम.क्यू.एम. के एक बड़े नेता के मुताबिक आज आतंकवाद पाकिस्तान का कौमी मजहब बन चुका है। बलूच प्रदर्शनकारियों की संस्था बलूच नेशनल मूवमेण्ट, बी.एन.एम. के मुताबिक वे पाकिस्तान में हो रहे जुल्मों से तंग आकर वॉशिंगटन में ऐसा प्रदर्शन करने के लिए मजबूर हुए हैं। वे पाकिस्तानी सरकार द्वारा अत्याचारों की शिकायतों से पल्ला झाड़ने और आँख मूँदने से आजिज आकर ऐसा कर रहे हैं। एक बलूच प्रदर्शनकारी के मुताबिक बलूचिस्तान कभी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था। वे एक अलग मुल्क चाहते थे। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया हुआ है।  पाकिस्तान में फौज के दबदबे का ज़िक्र करते हुए बलोच प्रदर्शनकारियों ने कहा कि प्रधानमन्त्री इमरान ख़ान केवल अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की आँखों में धूल झोंकने के लिए मुल्क में अमन कायम करने की बात करते हैं। पाकिस्तान के जन्म से ही उसकी असली सत्ता सेना के हाथों में रही है। प्रदर्शनकारियों ने इमरान को सेना के हाथों की कठपुतली बताया, जिसकी अपनी कोई ताकत और ज़बान नहीं है। उनकी सारी गतिविधियाँ सेना द्वारा तय होती हैं और वे चाहकर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते। बलोच प्रदर्शनकारियों ने आगे कहा कि पाकिस्तान की सरकार ने अल्पसंख्यकों को मूलभूत मानवाधिकारों से भी महरूम रखा है। उन्हें अन्य नागरिकों की तरह संवैधानिक हक भी मयस्सर नहीं हैं। इस भेदभाव के चलते पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का जीवन नर्क से बदतर हो गया है। उनकी आवाज़ को डर और ताकत के ज़ोर पर दबा दिया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान की इस हकीकत पर गौर करना चाहिए। आलेख - अशोक बहूरिया, पाकिस्तानी मामलों के कूटनीतिक विश्लेषक। अनुवाद और वाचन  - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय [audioplayer file ="http://airworldservice.org/hindi-commentary/Hn--Sam-Varta-14-Apr-19.mp3"]

जलियाँवाला बाग नरसंहार की सौवीं वर्षगाँठ।


इस साल 13 अप्रैल को जलियाँवालाबाग नरसंहार के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस घटना को भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक वाकये के तौर पर जाना जाता है। इस दिन अमृतसर के सार्वजनिकपार्क ‘जलियाँवालाबाग’ में शान्तिपूर्ण सभा कर रहे तकरीबन 1हज़ार निरपराध स्त्री, पुरुषों और बच्चों को बेहरमी से गोलियाँ चलाकर मार डाला गया था। इस हत्याकांड को ब्रिटिश पुलिसअधिकारी कर्नल डायर ने अंजाम दिया था। आज पूरी दुनिया अमानवीयता की हदें पार कर देने वाले दुखद हत्याकाण्ड के शहीदों को याद कर रही है। इस नरसंहार से ब्रिटिश भारत में मानवाधिकारों की स्थिति का पता लगता है। इसघटना की बर्बरता ने ब्रिटिश राजनीति को भी सहमा दिया था। 1920 में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इस हत्याकांड पर बहस हुई। जिसमें भाग लेते हुए सर विस्टन चर्चिल ‘जिन्हें भारतीय स्वाधीनतासंग्राम के प्रबल शत्रु के तौर पर देखा जाता है’ ने भी इसे राक्षसी घटना कहा, जिसका पूरी दुनिया के इतिहास में कोई सानी नहीं है। भारत के राष्ट्रकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, जिन्हें 1913 में साहित्य का नॉबेल पुरस्कार जीतने पर ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि से नवाजा था; ने इस घटना के बाद यह पदवी लौटा दीथी। 31 मई 1919 को लिखे पत्र में अपने फैसले से अवगत कराते हुए टैगोर ने इस घटना को ‘आतंक की गूँज’ और भारतीयों को भयभीत करने वाला अमानवीय कृत्य बताया। उनके मुताबिकयह घटना सम्पूर्ण मानवता को शर्मसार करने वाली है। 1945 में संयुक्तराष्ट्र संघ की स्थापना के बाद भारत को अपने नागरिकों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों से दुनिया को रूबरू कराने का मौका मिला। भारत ने आने वाले वक्त में इस किस्म केनरसंहार को रोकने के लिए हुई बातचीत में हिस्सा लिया; जिसके फलस्वरूप 1948 में मानववध रोकने वाले ‘जेनोसाइड कन्वेन्शन’ पर दस्तखत हुए। पहले विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की जीत के पीछे भारतीय राजनेताओं द्वारा समर्थन की महती भूमिका थी। महात्मा गांधी, जो अगस्त 1914 में लन्दन में थे; ने भारतीय विदेशसचिव को लिखे पत्र में कहा कि अगरभारत इस महान साम्राज्य का सहभागी होने के विशेषाधिकार को साझा करता है; तो वह उसके प्रति अपनी जि़म्मेदारियों को निभाने के लिए भी तैयार है। अपनी इस जि़म्मेदारी के तौर पर भारत ने 1.3 मिलियन से ज़्यादा सैनिकों और 146 मिलियन पाउंड ‘जो आज के 10 बिलियन के बराबर हैं, का योगदान अपने करों की मार्फत दिया था। इस युद्ध केदौरान तकरीबन 70 हज़ार भारतीय सैनिकों की शहादत हुई; जिनकी याद में इण्डिया गेट पर युद्ध स्मारक बनाया गया है। लेकिन विजय के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत को स्वायत्तशासी राज्य का दर्जादेने की माँग ठुकरा दी; जिसका जि़क्र महात्मा गाँधी ने अपने पत्र में किया था। इस अहसान के बदले अमृतसर में पाशविक हत्याकाण्ड को अंजाम देकर सरकार ने भारतीयों के अरमानों का भी खून कर दिया। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भारत में ब्रिटेनविरोधी राजनीतिकभावना को मज़बूत करने का काम किया। इसके विरोध में लाखों लोग ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वाधीनता के संग्राम में शामिल हुए। 1920 में सरकार के खिलाफ शुरु हुआ असहयोग आन्दोलन, 15अगस्त 1947 में भारत की आज़ादी पर आकर खत्म हुआ। यह नरसंहार आज भी आज़ाद भारत और यूनाइटेड किंगडम के रिश्तों के बीच नासूर बना हुआ है। इस हत्याकाण्ड को भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के इतिहास का सबसे बदनुमा वाकया कहा जाताहै। इस नरसंहार के शताब्दिवर्ष पर चर्चा के लिए तैयार की गई ब्रिटिश संसद की रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है। 1919 के बाद से अब तक की सरकारें जलियाँवाला बाग की घटना पर माफी के सवाल कोटालती रही हैं। जबकि ऐसा करने वाले ब्रिटिश सांसदों की संख्या काफी बड़ी है। 10 अप्रैल 2019 को प्रधानमन्त्री थेरेसा ने ब्रिटिश संसद में प्रश्नकाल के दौरान अपने जवाब में इस हत्याकाण्ड पर बयान पेश किया। उनके मुताबिक इस घटना के दौरान जो भी हुआ; उसके लिए हमक्षमाप्रार्थी हैं। हालांकि उन्होंने इस हत्याकाण्ड में ब्रिटिश सरकार की भूमिका पर आधिकारिक माफीनामे के सवाल को टाल दिया। ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद हो सकने वाले राजनीतिकऔर आर्थिक नुकसान को पाटने के लिए भारत जैसी उभरती ताकत से सम्बन्ध गहराना चाहता है। लेकिन जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड पर औपचारिक माफीनामे से परहेज करके वह इस उद्देश्य कोपाने से एक कदम चूक गया है। आलेख - राजदूत अशोक मुखर्जी, संयुक्तराष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि। अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय [audioplayer file ="http://airworldservice.org/hindi-commentary/Hn--Sam-Varta-13-Apr-19.mp3"]  

भारत में लोकतंत्र का पर्व शुरू


  दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक कार्यक्रम की भारत में शुरुआत हो गई है। आम चुनावों का आगाज़ कल हुआ, जो करोड़ों की आबादी वाले इस देश का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा चुनाव है। पहले चरण में 18 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में 91 लोकसभा संसदीय क्षेत्रों के लिए वोट डाले गए। इस दौरान छिटपुट…

चीन की सड़क परियोजनाओं पर भारत अपने रुख पर कायम


भारत ने इस महीने के आखिर में चीन में होने जा रहे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानि बीआरआई में शामिल होने के लिए चीन के न्योते को अस्वीकार कर दिया है। यह दूसरा मौका है जब भारत ने बीआरआई में भाग लेने के लिए निमंत्रण को ठुकराया है। इससे पहले…

भारत ने श्रीलंका के साथ रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया


भारत के रक्षा सचिव, संजय मित्रा ने श्रीलंका की दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा की | इस यात्रा के दौरान उन्होंने श्रीलंका के रष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना, श्रीलंका के रक्षा सचिव, हेमासिरी फर्नांडो तथा चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़, एडमिरल रवीन्द्र विजेगुनारत्ने से मुलाक़ात की | इस यात्रा के दौरान, मानव तस्करी तथा ड्रग स्मगलिंग…