क्या अरब की खाड़ी युद्ध की दिशा में आगे बढ़ रही है

अमरीका तथा उसके सहयोगियों और ईरान के बीच हाल ही में छिड़ी ज़ुबानी जंग ने अरब की खाड़ी में तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है। हालाँकि वाशिंगटन और तेहरान के बीच यह समस्या काफी जटिल और पुरानी है, लेकिन हालिया तनाव की शुरुआत संयुक्त समग्र कार्ययोजना अर्थात् जेसीपीओए से अमरीका के बाहर होने या फिर मई 2018 में ईरान के परमाणु समझौते के साथ हुई है। उस समय, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाया था कि वह परमाणु समझौते के बावजूद परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल्स पर काम कर रहा है, और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को नुकसान पहुँचा रहा है। इसके बाद से ही ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर फिर से एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध लागू कर दिए थे। इसका उद्देश्य तेहरान पर अधिकतम दबाव बनाने के लिए समझौते पर फिर से बातचीत करना था। हालाँकि ईरान ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। 8 मई 2019 को अमरीका के जेसीपीओए से बाहर होने की पहली वर्षगाँठ के मौके पर ईरान ने यूरोपीय देशों, रूस और चीन से आग्रह किया कि वे आगामी 60 के भीतर ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को खत्म करने में उसकी मदद करें। ऐसा ना होने पर ईरान परमाणु समझौते से बाहर होने पर मज़बूर हो जाएगा।

अब हालात ये हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पूरा ध्यान इस घटनाक्रम में शामिल सभी पक्षों के बीच जारी ज़ुबानी जंग पर केन्द्रित हो गया है। अमरीका ने घोषणा की है कि वह अरब की खाड़ी में तैनाती के लिए ‘USS Arlington’ युद्धपोत और ‘Patriot’ से लेकर सेंट्रल कमांड तक को भेज रहा है। तेहरान ने इसके जवाब में एक आधाकारिक बयान में कहा है कि युद्ध के हालात होने पर अरब की खाड़ी में तैनात अमरीकी युद्धपोत को निशाना बनाया जाएगा। इस बीच, संयुक्त अरब अमीरात में फुजैरा तट से दूर सउदी तेल टैंकर्स के खिलाफ तोड़फोड़ की घटना ने अरब खाड़ी के देशों की चिंता को बढ़ा दिया है। कुछ संभावित शरारती तत्व इन देशों के हितों को नुकसान पहुँचाने का काम कर रहे हैं। सउदी अरब में ड्रोन हमलों से दो तेल उत्पादन स्टेशनों को निशाना बनाने की खबरों ने खाड़ी राज्यों की चिंता को और अधिक बढ़ा दिया है।

ऐसे में, सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच चर्चा का केन्द्र ईरान बन गया है। दोनों देश ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की ज़रूरत पर बल दे रहे हैं ताकि इस क्षेत्र में सउदी अरब और यूएई के हितों पर हमला करने से इसे रोका जा सके। सउदी के विदेश राज्य मंत्री आदेल-अल-जुबेर ने कहा है कि वैसे तो सउदी अरब युद्ध के पक्ष में नहीं है, मगर ईरान की हर एक कार्रवाई का वह पुरजोर तरीके से जवाब देंगे। ईरान के हमलों को लेकर सउदी की चिंता का पता इस बात से ही लगता है कि सउदी के राजा सलमान ने 30 मई को मक्का में अरब और खाड़ी देशों की एक आकस्मिक बैठक बुलाई है, जिसको आगामी इस्लामिक शिखर सम्मेलन के साथ आयोजित किया जाएगा। इस दौरान क्षेत्र में मौजूद वर्तमान हालात और इससे निपटने के लिए किए जाने वाले सामूहिक प्रयासों पर चर्चा होगी।

रियाध और तेहरान के बीच बढ़ती ज़ुबानी जंग के मद्देनज़र दोनों के बीच संघर्ष या युद्ध से इनकार नहीं किया जा सकता। यह ना केवल इस क्षेत्र के लिए ख़तरनाक होगा, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका प्रभाव पड़ोगा। विशेषरूप से एशियाई अर्थव्यवस्था पर इसका काफी ज़्यादा असर पड़ेगा, क्योंकि एशियाई अर्थव्यवस्था इस क्षेत्र बड़ी मात्रा में तेल आयात करती है।

भारत ने सउदी अरब में तेल के टैंकरों पर हमले की घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा है कि वह आतंकवाद और हिंसात्मक घटनाओं से निपटने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। अरब की खाड़ी में मौजूद हालात पर नई दिल्ली का रुख एकदम स्पष्ट है। अरब की खाड़ी में आने वाले देशों से भारत आग्रह कर रहा है कि वे अपने आपसी मतभेदों को युद्ध के बजाय सौहार्दपूर्ण तरीके से निपटाएँ। भारत के इस क्षेत्र से कई हित जुड़े हैं और खाड़ी देशों के साथ भारत के घनिष्ठ एवं मज़बूत द्विपक्षीय संबंध हैं। इस क्षेत्र का महत्व भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के रूप में है। इसके अलावा भारत के 8.5 मिलियन से अधिक नागरिक खाड़ी सहयोग देशों में रहते भी हैं। यही वजह है कि इन देशों में किसी भी तरह के तनाव और संघर्ष का सीधा असर इन भारतीय नागरिकों पर भी पड़ेगा।

इसलिए यह ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस क्षेत्र में युद्ध को रोकने की दिशा में सकारात्मक पहल करे क्योंकि यदि अरब की खाड़ी में युद्ध होता है तो उससे व्यापक स्तर पर क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ सकता है।

आलेख – डॉ. मोहम्मद मुदस्सिर कमर, पश्चिमी एशिया विषय के रणनीतिक विश्लेषक

अनुवाद – डॉ. प्रवीन गौतम