ट्रम्प ने फिर झटका दिया  

अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड  ट्रम्प ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ हुई बैठक में दावा किया है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मुद्दे में एक मध्यस्थ के तौर पर हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया है | बहरहाल, यह मुद्दा अमरीका तथा पाकिस्तान के बीच हुई रणनीतिक चर्चा की आधी कहानी है, जबकि भारत को इसे उत्सुकता से देखने की आवश्यकता है |  अमरीका के विदेश विभाग ने स्पष्ट किया है कि अमरीका इस मुद्दे में कोई भूमिका नहीं निभा रहा है तथा कश्मीर भारत और पाकिस्तान का एक द्विपक्षीय मामला है | 

  अमरीकी राष्ट्रपति की टिप्पणी के प्रतिक्रियास्वरूप भारत के विदेश मंत्री डॉ॰ एस॰ जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस तरह की कोई इच्छा नहीं जताई है | 

        एक बड़ी जीत के बाद भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा पुनः कार्यालय सम्हालने के पश्चात गत महीने जापान के ओसाका में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन से अलग अमरीकी राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत की थी | दोनों नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा से अलग वाशिंगटन डीसी में भी बैठक कर सकते हैं | राष्ट्रपति ट्रम्प द्विपक्षीय संवाद के लिए निकट भविष्य में भारत की यात्रा कर सकते हैं | उच्चतम स्तर पर सम्बन्धों के इस संदर्भ में, राष्ट्रपति ट्रम्प का वक्तव्य ऐसे समय में आया है, जब दोनों पक्ष कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने लिए तैयार हैं | 

       एक तरफ़, जुलाई के पहले सप्ताह में अमरीका भारत को “नैटो की तरह एक सहयोगी” देश का दर्जा देने के लिए एक क़ानून पारित कर चुका है तो दूसरी तरफ़, दोनों पक्ष अफ़गानिस्तान के क्षेत्रीय मुद्दे पर परामर्श कर रहे हैं | इसके अलावा, उच्च लागत के रक्षा अनुबंध होने वाले हैं | यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि विभिन्न पार्टियों के राष्ट्रपतियों के अधीन उतरोत्तर अमरीकी प्रशासनों द्वारा समय की कसौटी पर परखे गए मोर्चे से अमरीकी सत्ता से एक जाते हुए राष्ट्रपति ने क्यों यह सुझाव दिया कि वे कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करना पसंद करेंगे, जो भारत तथा पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा है |   

      इससे यह संकेत मिलता है कि राजनय के परंपरागत रूप से अलंघनीय सिद्धान्त अब अमरीका में मान्य नहीं हैं | भारत ने 1972 से शिमला समझौते का सम्मान किया है | इस समझौते में कहा गया है कि पाकिस्तान के साथ किसी तरह के विवाद को दोनों पक्ष आपस में सुलझाएँगे और इसमें किसी तीसरी पार्टी की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है | 1971 के युद्ध के कुछ सप्ताह बाद पाकिस्तान पर यह सिद्धान्त लागू हुआ था | यह सिद्धान्त इस परिदृश्य में और भी बाध्यकारी हो जाता है कि इस युद्ध में भारत विजयी रहा था | जब से, पाकिस्तान ने तीसरी पार्टी की मध्यस्थता पर बल दिया है, तभी से भारत ने इसे एक सामान्य राजनयिक दस्तूर कहकर ख़ारिज़ किया है | बहरहाल, इस बार भी भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि द्विपक्षीय मुद्दे में किसी तीसरी पार्टी की कोई गुंजाइश नहीं है |

       पाकिस्तान तथा अमरीका के बीच का उच्च स्तरीय संवाद वास्तविक हित का है, जो दक्षिण एशिया तथा भारत को पुनः संतुलित करने के मामलों का प्रबंधन करने में इस्लामाबाद को एक नई भूमिका देने पर केन्द्रित है | ऐसा लगता है कि अमरीकी प्रशासन आगे निकल चुका है तथा पाकिस्तान को अफ़गानिस्तान के संवेदनशील मामलों को निपटाने की ज़िम्मेदारी दे चुका है | यह क़दम इस देश में लगभग दो दशक पुराने सैन्य अभियान से अमरीका को एक सम्मानजनक प्रस्थान देने से प्रेरित है | यह ऐसा दिखता है कि अमरीका पाकिस्तान को कुछ देकर कुछ लेने की नीति में छूट दे रहा है, वहीं वाशिंगटन अफ़गानिस्तान से सममानपूर्वक निकलने को इच्छुक है | 

           हालांकि, कश्मीर मुद्दे पर अमरीकी राष्ट्रपति के वक्तव्य ने ध्यान आकर्षित किया है, जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान तथा अमरीका दोनों कई महीनों से एक जटिल राजनयिक संवाद कर रहे हैं | पाकिस्तान वहाँ हाफ़िज़ सईद जैसे घरेलू आतंकवादियों पर टूट पड़ा है | इसके पीछे की मंशा यह है कि यह वही करेगा जो अमरीका चाहता है, शर्त यह है कि अमरीका अपनी दक्षिण एशिया नीति को पुनः संतुलित करे | जब प्रधानमंत्री इमरान ख़ान राष्ट्रपति ट्रम्प से स्पष्ट समर्थन प्राप्त कर अमरीका की यात्रा से लौटेंगे, तब एक नया खेल शुरू होने की आशा है | 

       अमरीकी राष्ट्रपति राजनय की एक अपरम्परागत शैली रखते हैं तथा अमरीकी हित के विभिन्न क्षेत्रों के साथ जुड़े कई क्षेत्रों में अपने हाथ आज़मा चुके हैं, लेकिन दक्षिण एशिया के “परमाणु फ्लैशपॉइंट” में एक मध्यस्थ की भूमिका पर उनका हालिया क़दम यह संकेत देता है कि अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की नई इबारत फिर से लिखी जा रही है | भारत-अमरीका के सम्बन्धों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए, अपनी संप्रभुता संबंधी चिंताओं को क्षति पहुंचाए बग़ैर भारत को सावधानीपूर्वक अपनी रणनीति बनानी होगी |  अमरीका को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि विदेश नीति परिपक्वता से विकसित होती है, न कि लापरवाह बयान से | विभिन्न सरकारों के अंतर्गत कश्मीर मुद्दे पर भारत की नीति स्थिर रही है तथा इस मुद्दे पर यह किसी तीसरी पार्टी के हस्तक्षेप या मध्यस्थता की अनुमति नहीं देता है |

आलेख – कल्लोल भट्टाचारजी, वरिष्ठ संवाददाता

अनुवादक/वाचक – मनोज कुमार चौधरी