दक्षिण चीन सागर की तनावपूर्ण स्थिति

दक्षिण चीन सागर के जलों में उबलते तनाव की ख़बरें एक बार फिर से आ रही हैं | दक्षिण चीन सागर के विवाद का मुद्दा बैंकॉक  की  9वीं पूर्व एशियाई विदेश मंत्रियों की शिखर सम्मेलन बैठक के विचार-विमर्श में प्रमुखता से उठने की बहुत संभावना है | इस सम्मेलन में भारत के विदेश मंत्री डॉ॰ एस॰ जयशंकर भागीदारी कर रहे हैं | 

      हाल ही में, जुलाई 2019 के पहले सप्ताह में दो चीनी तटरक्षक नौकाओं के अनुरक्षण के साथ चीनी सर्वे जहाज़ हाइयांग ईझी-8 ने वियतनाम के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईज़ेड) के 200 समुद्री मील में एक समुद्री भूकंपीय सर्वेक्षण किया, जिस कारण समूचे क्षेत्र विशेष रूप से हनोई में चिंताएँ बढ़ गई हैं | चीन, ताइवान तथा मुख्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, ब्रुनेई, मलेशिया, फ़िलीपीन्स तथा वियतनाम दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावेदारी करते रहे हैं | यह फैली हुई समुद्री सीमा विवादों में है, जिसके केंद्र में चीन है | 

      दक्षिण चीन सागर में चीनी व्यवहार पर एक सजग विश्लेषण यह दर्शाता है कि चीन द्वारा अपनी दावेदारी छोड़ने तथा इससे जुड़ी अन्य पार्टियों को छूट देने की संभावना कम ही दिखती है | जबकि, राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्तों के नेतृत्व में फ़िलीपीन्स ने अपनी दावेदारी को कम महत्व देने का विकल्प चुना है | जहां तक समुद्री सीमा का सवाल है तो दक्षिण चीन सागर विवाद पर वियतनाम की स्थिति अभी भी मज़बूत है | इस प्रकार, दक्षिण चीन सागर के महत्व को ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता है | यह प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न है | यहाँ के समुद्र तल में कम से कम 11 बिलियन बैरेल तेल तथा 190 ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस मौजूद हैं | यह संचार का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है | चीन के 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात इसी मार्ग से गुज़रते हैं | 

     लंबे समय तक संयम बरतनेवाला वियतनाम एक बार फिर इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के अपने रवैये पर लौट आया है | इस बार, इस मुद्दे पर इसने अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की है | चतुर्भुजीय सुरक्षा संवाद के अंतर्गत वियतनाम को इसके प्रयासों के लिए अधिक समर्थन मिलता हुआ भी प्रतीत होता है | इस विवाद में भारत न तो एक पार्टी है और न ही किसी एक देश के पक्ष में है | लेकिन, नई दिल्ली का इस सागर से बड़ा हित जुड़ा है | भारत की तेल तथा प्रकृतिक गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) की वाणिज्यिक हिस्सेदारी के कारण इसके लिए दक्षिण चीन सागर महत्वपूर्ण है | भारत की आधिकारिक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार नौपरिवहन, इस जल के ऊपर से गुज़रने वाली उड़ानों की स्वतन्त्रता की रक्षा करना तथा अंतर्राष्ट्रीय जलों में न्यायसंगत निर्बाध व्यापार वाली रही है | इस जल पर विशेष रूप से 1982 के समुद्री क़ानून से संबन्धित संयुक्त राष्ट्र समझौता (यूएनसीएलओएस) लागू होता है | 

      वियतनाम ने दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में भारत की बढ़ती उपस्थिती का सदा से ही स्वागत किया है | भारत तथा वियतनाम सौहार्दपूर्ण संबंध साझा करते हैं | भारत वियतनाम का एक विश्वसनीय तथा सहज साझेदार है | वियतनाम के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी रखने वाले तीन देशों में भारत भी शामिल है | दोनों देशों में उच्च-स्तरीय राजनीतिक विश्वास है | दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों में भारत को एक ज़िम्मेदार शक्ति माना जाता है | भारत पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान क्षेत्रीय मंच आदि जैसे आसियान के नेतृत्व वाले तंत्रों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है | भारत के रुतबे तथा वियतनाम तथा चीन दोनों के साथ भारत के मज़बूत सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए, यह स्वाभाविक है कि वियतनाम संपर्क के अधिक महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक की रक्षा करने की आशा भारत से करता है |  

      चीन, फ़िलीपीन्स तथा वियतनाम के साथ भी बहुपक्षीय स्तर की बातचीत पर बल देने की अपनी पूर्व की स्थिति में बदलाव करते हुए, ये अब द्विपक्षीय वार्ता के लिए ज़िम्मेदार हैं | चीन इस प्रकार की वार्ता को वरीयता देता है | जबकि, भारत तथा वियतनाम रणनीतिक साझेदार हैं, ऐसे में भारत ने चीन के साथ अपने सम्बन्धों की सकारात्मक गति को क़ायम रखा है | भारत ने हमेशा से ही आसियान की केन्द्रीयता के महत्व को सर्वोपरि रखा है तथा यह दक्षिण चीन सागर से संबंधी “आचार संहिता” (सीओसी) पर तत्काल हस्ताक्षर करने पर बल दे रहा है, जबकि यह सभी देशों को यथा पूर्व स्थिति बनाए रखने पर ज़ोर दे रहा है | हालांकि, सीओसी क़ानूनी तौर पर एक बाध्यकारी दस्तावेज़ नहीं है, यह चीन तथा अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई दावेदारों के बीच एक विश्वासवर्धक उपाय के रूप में काम करेगा | यह यूएनसीएलओएस के नियमों के अनुसार सभी संबन्धित पार्टियों के हित में भी है | 

आलेख – सना हाशमी, पूर्व एशियाई तथा यूरेशियाई मामलों की विश्लेषक

अनुवादक/वाचक – मनोज कुमार चौधरी