भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों द्वारा उच्च ऋण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए रेपो दर को फ्लोटिंग ऋण दरों से जोड़ा

भारतीय रिज़र्व बैंक के हालिया निर्णय से औपचारिक बैंकिंग चैनल से ऋण लेने वालों को अब बड़ी राहत मिली है। इसके अनुसार व्यक्तिगत, खुदरा, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) श्रेणियों से बाहरी मानदंड़ श्रेणियों तक के लिए फ्लोटिंग ऋण दर आपस में लिंक होगी और इसमें 1 अक्टूबर से, रेपो दर शामिल है। रेपो रेट वो दर होती है, जिस दर पर वाणिज्यिक बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक से पैसा लेते हैं। इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि जब भारतीय रिज़र्व बैंक उधार दर में कटौती करता है, जिसे रेपो रेट कहते है, तो उसी उसी अनुपात में सभी बैंक अपनी उधार दरों में कटौती करने को तैयार नहीं थे।

ये कदम व्यापार, उद्योग और उपभोक्ताओं के लिए बदली मौद्रिक नीति दरों को उन तक तेजी से पहुंचाना सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। सभी का मानना है कि जब भारतीय रिज़र्व बैंक नीतिगत दरों में कटौती करता है तो भी बैंक उन ब्याज दरों में कटौती के लिए उदासीन रहे हैं। इसी प्रकार, जब भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस वर्ष फरवरी और जून के बीच अपने आवधिक द्वि-मासिक नीति दर निर्णय में रेपो दर में 75 आधार अंकों (बीपीएस) कमी की थी तो उस समय बैंकों ने पैसे के नये ऋण के लिए औसत ऋण दर केवल 29 बीपीएस कम की थी।

लम्बे समय से और अर्थव्यवस्था की मंदी के कारण तथा निर्माण और सेवा क्षेत्रों में हितधारकों के कम ऋण लेने के मद्देनजर, आरबीआई कई तरीकों पर विचार कर रहा है जिन्हे लागू करने से बैंक जमाकर्ताओं और उधारकर्ताओं के लिए रेपो दर में कटौती करता है। एक बड़ी पहल जो बैंकों में हुई है वह है रेपो-लिंक्ड जमा और उधार दर। इस साल मई की शुरूआत में देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने घोषणा की कि वह अपने बचत बैंक खातों और साथ ही अल्पकालिक ऋणों की ब्याज दर को आरबीआई रेपो दरों से जोड़ रहा है। सिंडिकेट बैंक, यूनियन बैंक, इंडियन बैंक, बैंक ऑफ इंडिया और इलाहाबाद बैंक इन पांच अन्य बैंकों ने रेपो-लिंक्ड दरों के  अपने-अपने संस्करण लाने की योजना की घोषणा की है।

यह देखते हुए कि बैंक को आरबीआई की रेपो विंडो से केवल एक प्रतिशत धन मिलता है जो एक सूक्ष्म स्रोत है और जनता से जमाराशि से धन अधिक मात्रा में मिलता हैं। बैंको ने उधार दरों में कमी करने में असमर्थता व्यक्त की जब तक कि उनकी जमा दरें मध्यम नहीं हो जाती। इसलिए बचत खाते की ब्याज दरों को रेपो दर से जोड़ना आंशिक रूप से इस समस्या को हल करता है, इसमे उधार दरों को कम करा जा सकने के लिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रत्येक रेपो दर में कटौती के तुरंत बाद बैंकों की लागत में कमी आए ।

भारतीय रिजर्व बैंक ने नए घर और ऑटो ऋणों को जोड़ने के लिए जिन तीन बाहरी मानदण्डों के प्रस्ताव रखे है वो इसकी नीति रेपो दर,  वित्तीय बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट (FBIL), द्वारा प्रकाशित भारत सरकार के तीन महीने और छह महीने के ट्रेजरी बिल या अन्य बेंचमार्क एफबीआईएल द्वारा प्रकाशित कोई बाजार ब्याज दर हैं।  आरबीआई ने बैंकों को खुदरा फ़्लोटिंग होम और ऑटो लोन तथा एमएसएमई ऋणों के अलावा अन्य बाहरी उधारकर्ताओं को भी इस तरह के बाहरी मानदण्ड से जुड़े ऋण देने की अनुमति दी है। हालांकि, बैंकों को एक विशेष ऋण श्रेणी के एक समान बाहरी मानदण्ड का पालन करना होगा।

ये रहस्यमय तरीके हैं जिनमें आधार दर और मार्जिनल लागत आधारित ऋण तंत्र (MCLR) सिस्टम से बैंकों की जमा और ऋण दर की संशोधन में बढ़ोतरी होती है। ये तंत्र  बैंक के कार्ड रेट्स पर पहुंचने के लिए भीतरी फॉर्मूलों को उक्त प्रकार से स्थिर बना देते हैं। यह राज सबको पता है कि नीतिगत दर के अपर्याप्त संचरण ने आरबीआई  को काफी समय तक चिंतित रखा है। यह इस संदर्भ में है कि रेपो दर की तरह एक बाहरी मानदंड का होना खुदरा उधारकर्ताओं और जमाकर्ताओं के लिए प्रक्रिया को पारदर्शी बनाता है।

नई ऋण मूल्य निर्धारण पद्धति तेजी अपनाने से मौद्रिक प्रवाह में मदद मिलेगी लेकिन इस पूरे चक्र में बैंकों के लिए प्रसार और मार्जिन में अधिक अस्थिरता आएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब रेपो दर गिरती है तो जमा दरों में परिवर्तन और जब यह बढ़ती है तो ऋण दरों को बढ़ाने के लिए बैंक इच्छुक होते है। नवीनतम कदम, वाहन या घर खरीदने के लिए ऋण की फ्लोटिंग दर पर ब्याज लागत को कम करने के लिए उठाया गया है। नीति विश्लेषकों का कहना है कि इस यह भी हो सकता है कि वाणिज्यिक बैंक जमाकर्ताओं को किये जाने वालें भुगतान की ब्याज दर में कटौती करना शुरू करें या उनका मार्जिन कम होने का भी जोखिम है ।

आलेख: जी श्रीनिवासन, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार

अनुवाद एवं स्वर वीरेन्द्र कौशिक