पाकिस्तान फिर नकारा गया

कश्मीर के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान अपनी तैयारी में लगा हुआ है। जम्मू और कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा हटाने के भारत के फैसले की ओर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचने की कोशिश पूरी ताकत से कर रहा है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका निर्णय एक आंतरिक मामला था। भारत अपना पक्ष रखने में सफल रहा है। विश्व की अधिकांश राजधानियों में भारतीय निर्णय को स्वीकार किया गया है।

पाकिस्तान फिर भी संतुष्ट नहीं है। अब यह अपने करीबी सहयोगियों में भी खुद को अलग-थलग पा रहा है। पिछले सप्ताह, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और उसके सेना प्रमुख ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमारात के विदेश मंत्रियों को आमंत्रित किया था। क्लासिक कूटनीतिक अर्थ में देखे तो दोनों विदेश मंत्रियों ने इस दौरान जो किया वो ये कि उन्होंने पाकिस्तान की बात पूरे धीरज के साथ सुनी। इसके बाद पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा “हमें उम्मीद है कि दोनों देश हमें निराश नहीं करेंगे। दोनों देशों के मंत्रियों ने हमारे रुख को सुना है ”।

इससे निंदनीय कथन नहीं हो सकता था। किसी को ज्यादा उम्मीद नहीं थी।  पाकिस्तानी विश्लेषकों को भी ये लगा कि यह राजनेताओं के लिए फोटों खिंचवाने के अवसर के अलावा और कुछ नहीं था। पाकिस्तान का दावा है कि वह अपनी राजनयिक लड़ाई में सऊदी अरब और यूएई को उलझाने में सफल रहा है। हालांकि,  दोनों महत्वपूर्ण अरब देश असंवेदनशील बने रहे।  इससे पता चलता है कि पाकिस्तान उन्हें अपने पक्ष में करने में नाकामयाब रहा। इस बैठक से पाकिस्तानी मीडिया में आक्रोश की लहर उठी है लेकिन मीडिया के समझदार लोग इस मुद्दे पर चुटकी लेने में सक्षम हैं।

पाकिस्तान को ‘गलत सलाह’ पर उठाये कदम के लिए दोषी ठहराया गया है। एक समयावधि पर इसे अमीर अरब देशों से बेलआऊट के रूप में खैरात मिलती है। पिछले साल, पाकिस्तान को रियाद और अबू धाबी दोनों देशों से लगभग छह अरब डॉलर प्राप्त हुए। किंगडम में रहने वाले पाकिस्तानियों को सउदी ‘मिस्कीन’  यानि जरूरतमंद कहते हैं। यह तथ्य छुटना नहीं चाहिए। जबकि दूसरी ओर खाड़ी के अधिकांश देशों में बड़ी संख्या में काम करने वाले प्रवासी भारतीय अपने कौशल, शिक्षा, दूरदर्शिता और तकनीकी ज्ञान के लिए जाने जाते हैं। जिन देशों में वे रहते हैं वहां वो उन देशों के आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाने जाते हैं ।

2016 में, सऊदी अरब के किंग सलमान ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार किंग अब्दुलअज़ीज़ सैश से सम्मानित किया था। सऊदी के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने 2021 तक भारत में 100 अरब डॉलर निवेश करने का संकल्प किया है। इस साल की शुरूआत में उन्होंने पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया था। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अरब देश लोगों को लाभान्वित करने वाले विकासशील संबंधों के लिए उत्सुक हैं और धर्म इसमें कोई कारक नहीं है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच (2017-18) में व्यापार संबंध केवल 7.5 अरब डॉलर का  है जबकि उसी वर्ष भारत-सऊदी व्यापार 27.5 अरब डॉलर था।

यूएई ने पाकिस्तान की ओर बहुत कम ध्यान दिया। यूएई के भारत में राजदूत अहमद अल बन्ना ने भारत की कार्रवाई को एक आंतरिक प्रशासनिक मामला तथा “आगे स्थिरता और शांति की दिशा में एक कदम” के रूप में परिभाषित किया था। हफ्तों बाद, यूएई ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ से सम्मानित किया था। पाकिस्तान हतोत्साहित हो गया था क्योंकि इसकी सीनेट (उच्च सदन) के अध्यक्ष सादिक संजरानी ने यूएई की अपनी यात्रा रद्द कर दी थी।

पाकिस्तानी टिप्पणीकारों ने तेल समृद्ध अरब देशों द्वारा भारत को समर्थन देने के कदम की आलोचना की है। पाकिस्तान की सड़कों पर लोग अपने नेताओं और सेना से पूछ रहे हैं कि वो चीन में उइगर मुसलमानों को जबरन फिर से शिक्षा शिविरों में भेजने के बारे में क्यों नहीं बोलते हैं?  लेकिन, वे यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा उनके देश के लिए एक जीवन-रेखा है। पाकिस्तान यमन में मौत और विनाश की बात भी नहीं करता। सैन्य और नागरिक सहायता के लिए लालच की वजह से ही पाकिस्तान को कई दशकों तक दूसरों के हितों साधने में साथ देना पड़ा।

विश्लेषकों का मानना है कि ऊर्जावान कूटनीति से पाकिस्तान को लाभांश प्राप्त नही होंगे। मुस्लिम देशों से भी समर्थन की अपेक्षा करना पाकिस्तान के लिये मूर्खतापूर्ण होगा। इस्लामिक देशों ने महसूस किया है कि पाकिस्तान केवल वही बीन बजाने में रुचि रखता है। अपने सत्तर वर्षों के इतिहास में इसने दलदल से बाहर आने के लिए कुछ भी नहीं किया है जबकि इसके पड़ोसी फले-फूले हैं। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो दूसरों की सहायता पर जिंदा है और आतंक का निर्यातक है। इससे इसकी वैश्विक छवि को धब्बा लगा है। पाकिस्तान इसे समझता और इसे ठीक करने की कार्रवाई करता है तो यही उपयुक्त समय है।

 

आलेख: कौशिक रॉय,  समाचार विश्लेषक (ऑल इंडिया रेडियो)

अनुवाद एवं स्वर वीरेन्द्र कौशिक