14.08.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचारपत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। 

जम्‍मू कश्‍मीर में अनुच्‍छेद 370 के प्रावधानों को रद्द करने के बाद वहां लगी पाबंदियों को तत्‍काल हटाने से सुप्रीमकोर्ट के इंकार को आज के सभी समाचारपत्रों ने पहली बड़ी ख़बर बनाया है। राजस्‍थान पत्रिका की सुर्खी है- जम्‍मू में हालात संवेदनशील, सरकार को समय देना जरूरी।

राष्‍ट्रीय सहारा ने सेना प्रमुख विपिन रावत के इन शब्‍दों को दिया है- कश्‍मीर में नियंत्रण रेखा पर सेना दुश्‍मन की किसी भी चुनौती से निपटने को तैयार।

आम्रपाली के फ्लैटों की रजिस्‍ट्री तुरंत शुरू करने संबंधी नोएडा- ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को सुप्रीमकोर्ट की सख्‍त चेतावनी नवभारत टाइम्‍स में है। पत्र ने सुप्रीमकोर्ट के शब्‍दों को दिया है- आम्रपाली पर आदेश मानें अफसर, नहीं तो जेल।

 

दैनिक हिंदुस्तान ने अपने संपादकीय उल्टी पड़ती चालमें लिखा है कि भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा ख़तम करने से विश्व राजनय के कई समीकरण बदल गए हैं। इन्हीं में एक बड़ा बदलाव भारत-पाकिस्तान संबंध और कश्मीर की समस्या को देखने के दुनिया के नज़रिए में आया है। पिछले दिनों यह मसला उस समय विवाद में आ गया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि भारतीय प्रधानमंत्री ने उनसे कश्मीर मामले में मध्यस्थता का आग्रह किया था। भारत की तरफ से इसका जोरदार खंडन उसी समय हो गया था। भारत की यह पुरानी नीति रही है कि कश्मीर समस्या को भारत-पाकिस्तान की आपसी बातचीत से ही सुलझाया जाएगा और इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं होगी। इसे लेकर दोनों देशों के बीच शिमला समझौता भी हो चुका है और बाद में लाहौर घोषणा में भी इसे दोहराया गया। इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं थी कि भारत के प्रधानमंत्री या कोई भी अन्य प्रतिनिधि ऐसी बात कहेगा।

हालांकि बाद में पता लगा कि यह बात मुख्य रूप से पाकिस्तान को खुश करने के लिए कही गई थी। अमेरिका जल्द ही अपनी फौज को अफगानिस्तान से वापस बुलाना चाहता है और इसके लिए वह इन दिनों तालिबानी गुटों से बात भी कर रहा है, अमेरिका को पता है कि यह काम वह पाकिस्तान की मदद के बिना नहीं कर पाएगा। पर जब जोरदार खंडन हो गया, तो खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहा कि मध्यस्थता का मामला फिलहाल उनकी मेज पर नहीं है, और जब तक दोनों देश नहीं चाहेंगे, मध्यस्थता का कोई सवाल नहीं है। अब इसी बात को एक बार फिर भारत के राजदूत हर्षवर्द्धन श्रिंगला ने दोहराया है, तो इसके साथ ही यह बात भी जोड़ दी है कि खुद अमेरिका की दशकों पुरानी नीति यही रही है कि कश्मीर मसले पर मध्यस्थता नहीं होगी।

अमेरिका के एक समाचार चैनल से बातचीत में भारतीय राजदूत का यह बयान उस समय और महत्वपूर्ण हो गया, जब कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात करने वाला पाकिस्तान खुद इसकी सीमाओं को समझने लगा। संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के भारत के फैसले के बाद शुरू में पाकिस्तान यही कहता रहा कि वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाएगा और भारत को अलग-थलग करने की कोशिश करेगा, लेकिन अब उसके सुर भी बदलने लगे हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी का वह बयान काफी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि संयुक्त राष्ट्र से उन्हें बहुत ज़्यादा मदद नहीं मिलने वाली है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लामी देश भी इस मामले में भारत का विरोध करेंगे, इसकी बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है। चीन खुद अभी हांगकांग को लेकर परेशानी में है। ऐसे में, पाकिस्तान इस सदाबहार दोस्त से भी उम्मीदें खोता जा रहा है।

 

भारत ने अपना कदम तब उठाया है, जब पाकिस्तान आतंकवाद के मामले में काफी गहरे तक फंसा हुआ है। एक तरफ, उसकी आर्थिक हालत काफी खस्ता है, तो दूसरी तरफ, आतंकवाद की फाइनेंसिंग के मामले में वह ग्रे सूची से बाहर आने के लिए छटपटा रहा है। इस धारणा को पूरी दुनिया अपनाती जा रही है कि कश्मीर का आतंकवाद उसी की देन है। इसीलिए भारत ने जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया है, तो पाकिस्तान खुद को ही अलग-थलग पा रहा है।

जनसत्ता अपने संपादकीय लेख रणनीतिक कदममें कहता है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद दुनिया के अधिकांश देशों ने भारत के इस निर्णय को उसका आंतरिक मामला बताते हुए इस मुद्दे से उचित दूरी बना ली है। पाकिस्तान के दो सबसे प्रमुख सहयोगी और हमदर्द चीन और अमेरिका ने हाल में जिस तरह का रुख दिखाया है, उससे साफ है कि कश्मीर मुद्दे पर अब पाकिस्तान को कोई अहमियत नहीं मिल रही। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर इन दिनों चीन की सरकारी यात्रा पर हैं और उन्होंने चीनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत में यह साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा कर उसे संशोधित रूप में लागू करना और राज्य को विभाजित कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला पूरी तरह से भारत का अंदरूनी मसला है।

अनुच्छेद 370 को हटाने के तुरंत बाद चीन ने लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने को लेकर अपनी असहमति जताई थी। लद्दाख का हिस्सा अक्साईचिन तक है और यह इलाका भारत और चीन दोनों के लिए ही सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसलिए चीन ने अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया में कहा था कि जम्मू-कश्मीर के मामले में भारत एकतरफा कार्रवाई से बचे। लेकिन उसने अपनी प्रतिक्रिया में ऐसा कुछ नहीं कहा था जो पाकिस्तान के प्रति उसके समर्थन को ज़ाहिर करता हो।

वास्तव में, चीन नहीं चाहता कि भारत लद्दाख के क्षेत्र में विकास गतिविधियों को शुरू करे। इसलिए भारत ने अपनी स्थिति और रुख को स्पष्ट करते हुए बता दिया है कि अनुच्छेद 370 को हटाने से पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ सीमाओं में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं हुआ है और भारत ने यह कदम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के बेहतर विकास के लिए उठाया है। विदेश मंत्री बनने के बाद एस जयशंकर की यह पहली चीन यात्रा है। हाल के घटनाक्रमों के मद्देनजर उनकी इस यात्रा का महत्त्व इसलिए भी बढ़ गया है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने चीन यात्रा की थी और भारत के इस कदम के ख़िलाफ़ बयान जारी करने को कहा था। लेकिन चीन ने संयम बरतते हुए बयान दिया, जिसमें बुनियादी चिंता लद्दाख को लेकर ही थी।

दरअसल, चीन भी हकीकत को समझता है। उसने पिछले एक साल में देखा है कि जैश सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदी के मुद्दे पर उसे मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए चीन अब पाकिस्तान को लेकर ऐसी कोई हमदर्दी दिखाने से बचना चाहेगा जिसमें भारत के ख़िलाफ़ कोई संदेश जाता हो। चीन इस बात को भी अच्छी तरह समझ रहा है कि सीमा विवाद के बावजूद भारत उसके लिए बड़ा बाज़ार है। ऐसे में चीन कश्मीर मुद्दे पर खुल कर पाकिस्तान के साथ नहीं आने वाला।

इसके अलावा, अब अमेरिका ने भी अनुच्छेद 370 हटाने के बाद इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करते हुए कहा है कि वह कश्मीर पर पुरानी नीति पर कायम है। अमेरिका ने अब तक कोई ऐसा बयान नहीं दिया जो मौजूदा हालात के मद्देनज़र भारत के ख़िलाफ़ जाता हो। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान को लगा था कि दुनिया के ज़्यादातर देश उसके साथ आ जाएंगे, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी है।

इस हकीकत की पुष्टि पाकिस्तान के विदेश मंत्री के उस बयान से होती है जिसमें उन्होंने अपने देश के नागरिकों से यहां तक कह डाला कि वे मुगालते में न रहें, क्योंकि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा वापस लिए जाने के भारत के फैसले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) और मुसलिम जगत का समर्थन हासिल करना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री का यह बयान उनकी हताशा बताने के लिए काफी है।