11.09.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचारपत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।  संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद में कश्‍मीर पर पाकिस्‍तान को भारत की खरी-खरी आज अधिकांश अख़बारों की बड़ी सुर्खी है। हिन्‍दुस्‍तान ने लिखा है- यू एन में भारत ने पाकिस्‍तान की दलीलों को जमकर धोया। अख़बारों ने जिनेवा बैठक में विश्‍व के सामने पाकिस्‍तान के विदेश मंत्री के कबूलनामे को सुर्खी दी है- जम्‍मू कश्‍मीर को भारतीय राज्‍य के तौर पर स्‍वीकार किया पाकिस्तान ने। भारत और नेपाल के बीच तेल पाइपलाइन के उद्घाटन और इसके फायदों का ज़िक्र सभी अख़बारों ने किया है। इकनॉमिक टाइम्‍स ने विस्‍तार से समझाया है- कश्‍मीर में सेब और मेवों के व्‍यापार को केन्‍द्र से मिलेगी बड़ी मदद। मौजूदा सीज़न में दो हज़ार करोड़ रूपये का सीधा व्‍यापार होगा। बी सी सी आई और आकाशवाणी के बीच हुए समझौते पर दैनिक भास्‍कर ने लिखा है- रेडियो पर सुनेंगे ट्वेंटी-ट्वेंटी वन-डे रणजी और ईरानी ट्रॉफी की लाइव कमैंट्री।

हिंदुस्तान अपने संपादकीय लेख ‘पाकिस्तान के अल्पसंख्यक’ में कहता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जिस समय जेनेवा में हो रही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में भारत पर निशाना साधने की तैयारी कर रहे थे, ठीक तभी उन्हीं की पार्टी के एक पूर्व विधायक ने नई दिल्ली में इमरान खान पर ही निशाना साध दिया। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीट से विधायक रह चुके बलदेव कुमार अब सपरिवार दिल्ली पहुंच चुके हैं और उन्होंने भारत सरकार से शरण मांगी है। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की वे सारी कहानियां एक बार फिर बताई हैं, जो अब दुनिया के लिए नई नहीं रह गईं। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से यह भी मांग की है कि उन्हें पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों को भारत में शरण देने के विशेष प्रावधान करने चाहिए और इसे प्राथमिकता देनी चाहिए। बलदेव कुमार का कहना है कि सिर्फ अल्पसंख्यक ही नहीं, पाकिस्तान में इस समय तो कई मुस्लिम तबकों का भी उत्पीड़न हो रहा है। इनमें खास तौर से उन्होंने उन उर्दूभाषी मुहाजिरों का नाम लिया, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में बसने के इरादे से वहां गए थे। इसके साथ ही उन्होंने बलूचिस्तान के लोगों का नाम भी लिया, जिनका उत्पीड़न भी जगज़ाहिर है।

कुछ लोग पाकिस्तान के इन हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए मुहम्मद अली जिन्ना को याद करते हैं, जो ऐसा मुल्क बनाना चाहते थे, जहां सभी धर्मों के लोग अमन-चैन से रह सकें। लेकिन सच यही है कि जिस मज़हबी उन्माद पर सवार होकर जिन्ना ने पाकिस्तान को हासिल करने का सफर तय किया था, उसका हश्र इसके अलावा कुछ और हो  नहीं सकता था। उसकी राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक किसी भी व्यवस्था में कुछ ठीक नहीं चल रहा। इस मामले में पाकिस्तान दुनिया के लिए एक सबक भी है कि मज़हबी उन्माद की राजनीति अंतत: किसी मुल्क को कहां ले जाती है।

‘ठोस उपाय ज़रूरी’ शीर्षक से दैनिक जागरण अपने संपादकीय में लिखता है कि

एक बार इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक के निस्तारण की दिल्ली में ठोस व्यवस्था न होना चिंताजनक है | जहाँ एक और प्रधानमंत्री की अपील के बाद राजधानी में इस तरह की प्लास्टिक का प्रयोग बंद किये जाने की आवश्यकता है, वहीँ इस बात के भी ठोस उपाय किये जाने चाहिए कि इस तरह की प्लास्टिक का उचित ढंग से निस्तारण किया जाए, ताकि ये पर्यावरण को नुकसान न पहुंचा सके | निराशाजनक यह भी है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की अधिसूचना को भी दिल्ली में लागू नहीं किया जा रहा है | अधिसूचना के तहत यह निर्देशित किया गया है कि शहर की प्रत्येक पांच लाख आबादी पर 50 किलोमीटर सड़क ऐसा प्लास्टिक कचरा मिलकर बनाई जाए जो रिसाइकिल नहीं किया जा सकता | इससे प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है, लेकिन इस पर दिल्ली में सड़क बनाने वाली सरकारी एजेंसियां अब तक अमल नहीं कर सकी हैं |

प्लास्टिक के ख़िलाफ़ प्रभावी अभियान की शुरुआत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ही होनी चाहिए और इसे इस तरह आगे ले जाया जाना चाहिए कि देश के अन्य राज्य यहाँ से प्रेरणा लेकर इसे अपनाएं | दिल्ली सरकार और नगर निगमों के स्तर पर ऐसे उपाय खोजे जाने चाहिए, जिनसे प्लास्टिक कचरे का सड़क बनाने के साथ ही अन्य कार्यों में भी इस्तेमाल हो, ताकि ये कचरा परेशानी का सबब बनने के बजाय उपयोगी साबित हो सके |