मंगोलिया के राष्ट्रपति के भारत दौरे से सम्बन्धों में आई मजबूती

मंगोलिया के राष्ट्रपति खाल्‍तमागिन बाटुलगा इस समय भारत की राजकीय यात्रा पर है। वह भारतीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के निमंत्रण पर भारत आए हैं। यह बीते लगभग एक दशक बाद किसी मंगोलियाई राष्ट्रपति का भारत दौरा है। मंगोलिया के राष्ट्रपति के साथ एक शिष्टमंडल भी भारत आया है जिसमें सरकारी अधिकारियों के अलावा अग्रणी व्यवसायी शामिल हैं।

आगंतुक राष्ट्रपति बटुलगा ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ मुलाकात में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। मंगोलियाई राष्ट्रपति के स्वागत में भारतीय राष्ट्रपति ने रात्रिभोज का आयोजन भी किया। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने भी मंगोलियाई राष्ट्रपति से मुलाकात की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति बाटुलगा के साथ शिष्टमंडल स्तर की बातचीत में दोनों शीर्ष नेताओं के बीच द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर के मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। क्षमता निर्माण, सुरक्षा, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और सांस्कृतिक विनिमय भी बातचीत के केन्‍द्र में थे। यह एक पखवाड़े के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मंगोलिया के राष्ट्रपति के बीच दूसरी बार बातचीत हो रही है। इससे पहले सितंबर के पहले सप्ताह में रूस के सुदूर पूर्वी शहर व्लादिवोस्तोक में पूर्वी आर्थिक मंच यानि ईस्टर इकोनामिक फोरम की पांचवी बैठक के अवसर पर अलग से दोनों नेताओं ने मुलाकात की थी।

भारत दुनिया के पूर्वी क्षेत्रों में बसे देशों के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करने के प्रयास लंबे समय से कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे पहले 2015 में मंगोलिया की महत्वपूर्ण यात्रा की थी। उसी दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जो स्वतंत्रता, समृद्ध लोकतंत्र और बुद्ध से जुड़ी दोनों देशों में एक समान धरोहर पर आधारित है। मंगोलिया के राष्ट्रपति की पाँच दिवसीय भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच संबंधों को और प्रगाढ़ करने की दिशा में मदद मिलेगी और रणनीतिक साझेदारी को भी आगे ले जाने का रास्ता साफ होगा।

भारत और मंगोलिया के बीच राजनयिक रिश्ते 1955 में स्थापित हुए। मंगोलिया चारों तरफ से घिरा हुआ देश है जिसके दो पड़ोसी हैं एक ओर चीन तो दूसरी तरफ रूस। मंगोलिया अब तीसरे पड़ोसी की तलाश में है और यह उसका नीतिगत पड़ोसी होगा ना कि भौगोलिक। मंगोलिया में एक धारणा है कि मंगोलिया और भारत के आध्यात्मिक संबंध काफी करीबी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इतिहास और और बौद्ध धर्म दोनों देशों के बीच की कड़ी है। मंगोलिया में भारत के पूर्व राजदूत बाकुला रिनपोचे को देश में अभी भी लोग आत्मीयता से याद करते हैं। 1990 से 2000 के बीच उन्होंने दोनों देशों के बीच बौद्ध संपर्क को मजबूत करने के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कई बौद्ध मठों की पुनर्स्थापना में मदद की।

मंगोलिया प्राकृतिक संसाधन संपन्‍न देश है। यह एक बड़ा देश है लेकिन देश की अधिकांश जनसंख्‍या राजधानी उलानबतोर में निवास करती है। व्‍यापक संभावनाओं के बावजूद दोनों देशों के बीच व्‍यापार अब तक कम रहा है। वर्ष 2018-19 में भारत-मंगोलिया के बीच व्‍यापार 23.83 मिलियन डॉलर का रहा। हालांकि हाल के दिनों में व्‍यापार में वृद्धि देखी गई है। व्‍यापार में संतुलन को भारत के पक्ष में देखा जा सकता है।

अब चूंकि दुनिया की धुरी पूरब बनने जा रहा है, भारत भी पूरब में अपनी पहुंच बढ़ाने के प्रयास कर रहा है। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी पर काम किया है। अब इसका ज़ोर एक्‍ट फार ईस्‍ट पॉलिसी पर होगा। इस महीने की शुरूआत में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान इसकी घोषणा की गई थी। पूर्वी विश्‍व से जुड़ने के भारत के प्रयासों में मंगोलिया एक पुल की भांति अहम भूमिका निभा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के 2015 में मंगोलिया दौरे में मंगोलिया में लाइन ऑफ क्रेडिट के अंतर्गत भारत ने मंगोलिया में 1 बिलियन डॉलर की तेल शोधन परियोजना शुरू की है। भारत ने प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की सितम्‍बर 2019 में रूस यात्रा के दौरान रूस को 1 बिलियन अमरीकी डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट दी है।

बड़े अंतर्राष्‍ट्रीय मामलों पर मंगोलिया के विचार भारत से मेल खाते हैं। मंगोलिया शंघाई सहयोग संघ का पर्यवेक्षक देश है और भारत इस संघ का 2017 में पूर्ण सदस्‍य बना था।

भारत-मंगोलिया सुरक्षा और रक्षा क्षेत्रों में पारस्‍परिक सहयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। दोनों देशों के बीच नोमाडिक एलीफैंट नाम का वार्षिक अभ्‍यास चल रहा है। हाल के वर्षों में भारत और मंगोलिया के बीच सांस्‍कृतिक सहयोग का आदान प्रदान बढ़ा है। यह उम्‍मीद की जा सकती है कि राष्‍ट्रपति बाटुलगा की राजकीय यात्रा से भारत और मंगोलिया के बीच रणनीतिक रिश्‍तों में और प्रगाढ़त आएगी।

 

आलेख- डॉ अतहर जाफ़र, सीआईएस के रणनीतिक विश्लेषक