23.09.2019

आज के हिन्दी अख़बारों ने विभिन्न विषयों पर संपादकीय टिप्पणियाँ की हैं। साथ ही अहम सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। 

अमरीका के ह्यूस्टन में हाउडी मोदी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की उपस्थिति अखबारों की अहम खबर है। जनसत्ता की सुर्खी है – आतंकियों का एक ही ठिकाना, चाहे 11 सितम्बर हो या 26 नवम्बर का आतंकी हमला। मंच पर ट्रम्प ने कहा-कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को समाप्‍त करने को प्रतिबद्ध।

उधरअमर उजाला लिखता है – उधार के विमान से अमरीका पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। फीके स्वागत के लिए सोशल मीडिया पर हुए ट्रोल। नहीं पहुंचा कोई अमरीकी अधिकारी, पाकिस्तानी अफसरों ने ही किया स्वागत।

“मोटापे का पर्यावरण शीर्षक है हिंदुस्तान के संपादकीय का। पत्र के अनुसार आधुनिक दौर को बड़े पैमाने पर भोजन बरबाद करने वाले समय के तौर पर भी देखा जाता है। यह भी पाया गया है कि जैसे-जैसे दुनिया के तमाम देश आधुनिक होते जा रहे हैं, वहां भोजन के कूड़ा होने की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। सबसे आधुनिक कहा जाने वाला अमेरिका इसमें सबसे आगे है। माना जाता है कि वहां की पूरी खाद्य आपूर्ति शृंखला का 30 से 40 फीसदी हिस्सा कूड़े में चला जाता है, यानी तकरीबन 160 अरब डॉलर की खाद्य वस्तुएं हर साल बरबाद हो जाती हैं। पूरी दुनिया के पैमाने पर देखें, तो हर साल करीब 1.3 करोड़ टन भोजन विभिन्न कारणों से कूड़े में पहुंच जाता है। यह सिर्फ भोजन की बरबादी नहीं है। औद्योगिक उत्पादन के बाद दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में से एक कृषि भी है। मांसाहारी खाद्य का उत्पादन तो कई मामलों में पर्यावरण को औद्योगिक उत्पादन से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। सरलीकरण से इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर बरबाद होने वाले खाद्य का उत्पादन बंद हो जाए और उस जमीन पर जंगल लगा दिए जाएं, तो पर्यावरण का कितना भला हो सकता है।

सच यह भी है कि 21वीं सदी तक पहुंचते-पहुंचते हमने एक ऐसी व्यवस्था की रचना कर दी है, जिसमें वास्तविक जरूरत जितने भोजन की है, उससे कहीं ज्यादा भोजन का उत्पादन हो रहा है। दुनिया में हालांकि बहुत सारे अभाव, गरीबी और भुखमरी अब भी बने हुए हैं, फिर भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, जो इतना समृद्ध तो हो ही चुका है कि अपनी शारीरिक जरूरतों से ज्यादा भोजन जुटा और खा सके। अधिक उत्पादन की वजह से एक ऐसी कारोबार व्यवस्था भी बन गई है, जो लोगों को लगातार ज्यादा खाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। इसकी वजह से आगे चिकित्सा और दवाओं वगैरह के कारोबार भी फलते-फूलते हैं। जिसे हम भोजन और उसके साथ ही पर्यावरण की बरबादी कहते हैं, उसमें बहुत सारे हित जुड़े हुए हैं। 

दैनिक जागरण ने संपादकीय लिखा है। शीर्षक है स्वागतयोग्य पहल। पत्र के अनुसार दिल्ली में वायु प्रदूषण से जंग में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सहयोग के लिए भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) का आगे आना स्वागतयोग्य है | इससे वायु प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई और बेहतर तरीके से लड़ी जा सकेगी | आईआईटी सीपीसीबी को हर पंद्रह दिन पर बताएगा कि अगले एक पखवाड़े में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए किन बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करना है | इसके आधार पर सीपीसीबी संबंधित अधिकारी एजेंसिओं को निर्देशित करेगा | उम्मीद है कि आईआईटी के सहयोग से राजधानी में वायु प्रदूषण का स्तर घटाने में मदद मिलेगी | यह कोशिश की जानी चाहिए कि यह प्रयास प्रभावी हों, लेकिन वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दीर्घकालीन योजना भी बनाई जाए | इसके लिए आईआईटी के विशेषज्ञों से सलाह लें, ताकि एक ऐसी योजना तैयार हो जो एकदो साल में राजधानी को वायु प्रदूषण से पूरी तरह निजात दिला सके |

यकीनन आईआईटी के सहयोग से यदि कोई दीर्घकालिक योजना तैयार होती है, तो उसके प्रभावी होने कि संभावना अधिक होगी | ऐसी योजना तैयार कर समयबद्ध तरीके से उस पर काम किया जाना चाहिए | आईआईटी दिल्ली ही नहीं, देश के अन्य राज्यों के प्रोद्योगिकी संस्थानों से भी इस बारे में नए विचार और नई तकनीक पर बात की जानी चाहिए, ताकि हालात जल्द से जल्द बेहतर हो सकें |