21.10.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। पाकिस्‍तान में आतंकी शिविरों पर भारतीय सेना की बड़ी कार्रवाई अख़बारों की अहम ख़बर है। हिन्‍दुस्‍तान लिखता है-पीओके में चार आतंकी कैम्‍प तबाह, बालाकोट हमले के बाद बड़ी कार्रवाई, रक्षामंत्री ने सेना प्रमुख से की बात। नवभारत टाइम्‍स की सुर्खी है- चार साल में सेना की तीसरी स्‍ट्राइक से बौखलाया पाकिस्‍तान, भारतीय राजनयिक को किया तलब।

राजस्‍थान पत्रिका की ख़बर है-रेलवे बोर्ड में कम होंगे 25 प्रतिशत अफसर। उन्‍हें क्षेत्रीय कार्यालय में भेजा जाएगा। 

दैनिक जागरण की ख़बर है-चीन छोड़ रही कंपनियों के लिए ब्‍लू प्रिंट तैयार करेगा भारत। पूरी गति से चल रही है भारत-अमरीका व्‍यापार वार्ता, जल्‍द ही समझौते की संभावना।

अमर उजाला की सुर्खी है कि अगर नॉन ग्रीन पटाखे जलाए तो होगी जेल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्‍ली और एनसीआर में बेचना और जलाना दोनों ही अपराध।

 गलतफहमी न फैले शीर्षक से राष्ट्रीय सहारा का लिखना है कि बांग्लादेश की सीमा की पहरेदारी करने वाली बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) की कायराना हरकत से हर भारतवासी स्तब्ध और आक्रोशित है। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की टीम पर जिस तरह पीछे से वार किया गया, वह न तो सेना की मर्यादा और न दोनों देशों के बरसों पुराने ऐतिहासिक संबंधों के लिहाज़ से उचित हैं। एक जवान का शहीद होना और एक का घायल होना निश्चित तौर पर देशों के रिश्तों में खटास पैदा कर सकता है। भारतीय मछुआरों को नियम विरुद्ध उनके जलक्षेत्र में गिरफ्त में लेना, फिर उनकी बोट, मछली पकड़ने के उपकरण और मछलियों को ज़ब्त करना किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में पद्मा नदी में मछली पकड़ने गए तीन मछुआरों को बीजीबी जवानों ने इस आरोप में पकड़ लिया कि उन्होंने जलक्षेत्र का नियम तोड़ा है और बांग्लादेश की सीमा में अनधिकृत रूप से प्रवेश कर गए हैं। मसला सुलझाने के लिए जब बीएसएफ की टीम घटनास्थल पर पहुंची तो बीजीबी जवानों से विवाद बढ़ गया। सरकार को उन हज़ारों परिवारों के बारे में भी सोचना होगा जिनकी जीविका मछली पालन के भरोसे है। इसके साथ ही यह नियम भी बने कि अगर दोनों देशों की बॉर्डर फोर्स फ्लैग मीटिंग के लिए मिले तो बिना हथियारों के बैठक हो। इससे वार्ता के समय तनाव या विवाद हिंसा के स्तर तक नहीं पहुंचेगा। भारत के संबंध बांग्लादेश से बेहतर रहे हैं।   इसलिए जल्द-से-जल्द विवादों का निपटारा शीर्ष स्तर पर हो जाना चाहिए। बांग्लादेश को साफ संकेत दिया जाना चाहिए कि, यह पहली अंतिम घटना है।

हिंदुस्तान “ प्रदूषित ज़मीन पर” शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखता है कि हम अपने देश में प्लास्टिक इस्तेमाल कम करने के लिए बड़ा अभियान चला रहे हैं। दुनिया भर में तकरीबन हर जगह इस तरह के अभियान चल रहे हैं। फिलहाल पहली कोशिश एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक से मुक्ति पाने की है, क्योंकि वह दुनिया के प्लास्टिक प्रदूषण में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। इसी के साथ खड़ी हुई एक अन्य चुनौती है माइक्रो-प्लास्टिक, यानी प्लास्टिक के वे बारीक कण, जो नंगी आंखों से नहीं दिखाई देते। ये हर जगह हैं। उस हवा में भी, जिसमें हम सांस लेते हैं; उस पानी में हैं, जिसे हम इस्तेमाल करते हैं; उस भोजन में भी, जिसे हम खाते हैं। ये कण नदी में हैं, तालाब में हैं और समुद्र में भी। इसके साथ ही ये हमारी ज़मीन और मिट्टी में भी मिल चुके हैं, जहां उनकी मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। आजकल रासायनिक उर्वरक की जगह कूड़े से बनी कंपोस्ट के इस्तेमाल पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया जाने लगा है। पर्यावरण को बचाने के लिहाज़ से यह एक अच्छा तरीका है, लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे कूड़े में प्लास्टिक होता है, जो कंपोस्ट के ज़रिए हमारे खेतों में पहुंच जाता है। दुनिया की आबादी इस समय 750 करोड़ से भी कहीं ज़्यादा है। हमें जितने लोगों का पेट भरना है, उतनी ज़रूरत मानव इतिहास में कभी नहीं रही। ऐसे में, खाद्य उत्पादन में ज़रा भी कमी पूरी दुनिया के राजनीतिक संतुलन को बदल सकती है। माना जाता है कि किसी भी देश के आर्थिक रूप से ताकतवर बनने का रास्ता खाद्यान्न आत्मनिर्भरता से ही शुरू होता है। यह भले ही अपने आप में पर्याप्त न हो, पर एक ज़रूरी शर्त तो है ही। यानी यह माइक्रो-प्लास्टिक कई देशों की ताकत मिट्टी में मिला सकता है।