15.11.2019

आज के समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय टिप्पणियाँ की हैं, वहीं समाचार पत्रों की सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं |

उच्चतम न्यायालय के रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे पर पुनर्विचार याचिकाएं ख़ारिज़ करने की ख़बर सभी अख़बारों में है। नवभारत टाइम्स की सुर्खी है– रफ़ाल डील पर आरोप फेल। दैनिक जागरण के अनुसार–कोर्ट ने कहा “विमान ख़रीद में कोई गड़बड़ी नहीं”। अमर उजाला का शीर्षक है–मोदी सरकार को फिर क्लीन चिट। सबरीमला मंदिर में प्रवेश सहित कई धार्मिक मुद्दे बड़ी पीठ को सौंपने पर  नवभारत टाइम्स लिखता है–सबरीमला ही नहीं, मस्जिदों में बैन भी देखेगा सुप्रीम कोर्ट। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को जनसत्ता ने सचित्र देते हुए लिखा है–आतंकवाद से दुनिया को एक हज़ार अरब डॉलर का नुकसान। पंजाब केसरी ने महाराष्ट्र में “सरकार गठन की तैयारी” शीर्षक से लिखा है–कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना का न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय। नवभारत टाइम्स लिखता है–शिवसेना से नरम हिंदुत्व का वादा चाहती है कांग्रेस। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कल वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहद गम्भीर श्रेणी में बने रहने पर राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है–दिल्ली-एनसीआ में छाई स्मॉग की मोटी चादर।

हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा “पारदर्शिता का फ़ैसलाशीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से न्यायपालिका की कार्य-पण्राली ख़ासकर नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर बनी धुंध भी कुछ हद तक छंट सकती है। हालांकि कई किंतु-परंतु हैं। प्रधान न्यायाधीश की अगुआई में पांच जजों की संविधान पीठ के इस फ़ैसले में न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना ने अपनी अलग राय में चेताया है कि सूचना का अधिकार क़ानून अदालत की निगरानी का औज़ार कतई नहीं बनाया जाना चाहिए। फ़ैसले में भी कहा गया है कि सूचना आयुक्तों को आरटीआई की किसी अर्ज़ी पर फ़ैसला लेते वक़्त न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निजता के अधिकारों को ध्यान में रखना चाहिए। ज़ाहिर है, इससे सूचना की सीमाएं तय हो जाती हैं। लेकिन ऐसे दौर में जब संवैधानिक संस्थाओं को लेकर तरह-तरह की शंकाएं व्यक्त की जा रही हों, पारदर्शिता बेहद ज़रूरी है। पिछले दिनों कॉलेजियम के फ़ैसलों को लेकर ही कई तरह के विवाद या कहिए कि शंकाएं उभरीं। ताज़ा मामला मद्रास हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश वी.के. ताहिलरमानी के मेघालय हाइकोर्ट में तबादले का था, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था। इसलिए निर्णय-प्रक्रिया के, कुछ हद तक ही सही, सार्वजनिक होने से शंकाओं का कुछ समाधान हो सकेगा। बेशक, सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के नौ साल बाद आया है कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार के दायरे में होगा।

“अलविदा गणितज्ञ” शीर्षक से हिन्दी दैनिक हिंदुस्तान अपने संपादकीय में लिखता है कि  बरसों से हमने उनकी कोई सुध नहीं ली, अब हम हर साल 14 नवंबर को वशिष्ठ नारायण सिंह को याद करेंगे। वह कई दशकों से बीमार थे, स्मृति-लोप या सिज़ोफ़्रेनिया ने उनकी उस प्रतिभा को लगभग निरर्थक बना दिया था, जिसके झंडे उन्होंने कभी पूरी दुनिया में गाड़े थे और जिस वजह से हम आज उन्हें याद कर रहे हैं। वशिष्ठ नारायण सिंह का पूरा मामला बताता है कि एक समाज और एक देश के तौर पर अपनी प्रतिभाओं और महान सपूतों के साथ हम किस तरह का बर्ताव करते हैं, ख़ासकर जब वे निजी स्तर पर किसी संकट में होते हैं। बिहार के एक छोटे से पिछड़े और सुविधाहीन गांव से निकलकर कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी तक गणित की अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ने वाले इस गणितज्ञ की कहानी हमें एक अन्य महान भारतीय गणितज्ञ रामानुजन की याद दिला देती है। स्थानीय स्तर पर रामानुजन की प्रतिभा को कुछ लोग भले ही जानते-समझते थे, लेकिन सच यही था कि वह भारत में एक क्लर्क की साधारण सी ज़िंदगी जीने को मजबूर थे। जब वह कैंब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचे और गणित के उनके सूत्रों की चर्चा पूरी दुनिया में तक़रीबन हर जगह होने लगी, तब जाकर भारतीयों ने उन्हें एक आसाधारण प्रतिभा माना। यही वशिष्ठ नारायण सिंह के साथ हुआ, उनकी प्रतिभा को हमने ठीक तरह से तभी समझा, जब उन्होंने कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी से न सिर्फ़ पीएचडी की डिग्री हासिल की, बल्कि उन्हें वहां एसोशिएट प्रोफ़ेसर भी बना दिया गया। लेकिन एक समय के बाद बिहार की संस्कृति में पले-बढ़े उनके मन ने सोचा कि उन्हें अपने देश वापस आ जाना चाहिए और यहां आकर उन्होंने पहली नौकरी आईआईटी में हासिल की, मगर वहां की राजनीति उन्हें रास नहीं आई और वहां की नौकरी छोड़कर वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़डामेंटल रिसर्च से होते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्टैटिसटिक्स में जा पहुंचे। करियर की इस उठा-पटक के साथ ही उनकी निजी समस्याएं भी जुड़ गईं, जिससे उनके सिज़ोफ़्रेनिया के दौरे भी बढ़ गए, और दुनिया का एक उदीयमान गणितज्ञ गुमनाम और बदहाल ज़िंदगी जीने को मजबूर हो गया।

आलेख – हिन्दी एकांश, विदेश प्रसारण प्रभाग