26.11.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचारपत्रों ने अलगअलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। महाराष्ट्र की राजनीति में जारी राजनीतिक खींच-तान के बीच देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के राज्यपाल के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर उच्चतम न्यायालय का आज आने वाले फैसला, सभी अखबारों की पहली खबर है। राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है बहुमत परीक्षण पर सुप्रीम फैसला आज। देशबंधु के शब्द हैं – महाराष्ट्र का दंगल, किसका होगा मंगल।

वहीं, ‘महाराष्ट्र का रणशीर्षक से हिन्दुस्तान लिखता है- होटल में विपक्षी एकता की महाशपथ। एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस ने 162 विधायकों की परेड कराई, सभी ने कहा – पार्टी के खिलाफ नहीं जाएंगे। 

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की जानलेवा स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी भी अधिकतर अखबारों के पहले पन्ने पर है।

आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी उच्चतम न्यायालय का चुनाव आयोग को निर्देश अमर उजाला ने बॉक्स में दिया है। दिल्ली के दुकानदारों को भी मिल सकेगा मालिकाना हकनवभारत टाइम्स लिखता है- डीडीए ने दुकानों को फ्री होल्ड करने का लिया निर्णय।

जनसत्ता ने अपने संपादकीय में इलाज की क़ीमत शीर्षक से लिखता है कि किसी भी देश में विकास के असली पैमाने इससे आंके जाने चाहिए कि वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और शिक्षा की व्यवस्था कैसी है और वह कितने लोगों की पहुंच में है। लेकिन हमारे देश में चिकित्सा और पढ़ाई-लिखाई की समूची व्यवस्था जैसे-जैसे सरकारी तंत्र से फिसल कर निजी हाथों में जा रही है, वैसे-वैसे एक बड़ी आबादी उसके दायरे से बाहर होती जा रही है। विडंबना यह है कि किसी बीमारी के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में कई गुना ज्यादा रकम चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद लोगों के सामने विकल्प सिमटते जा रहे हैं। या तो वे इलाज के नाम पर कई गुना ज्यादा पैसे चुकाने पर मजबूर हैं या फिर बेहतर चिकित्सा से वंचित रह जाते हैं। हालांकि अनेक अध्ययनों में इलाज के महंगे होने के तथ्य सामने आते रहे हैं, लेकिन अब खुद राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह बताया गया है कि देश के निजी क्षेत्र के अस्पतालों में लोगों को इलाज कराने के लिए सरकारी अस्पतालों की तुलना में सात गुना ज्यादा अधिक धन खर्च करना पड़ता है। अगर खुद सरकार के किसी महकमे की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया जा रहा है तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि इलाज में खर्च का इतना बड़ा फर्क सरकार की नजर में है, लेकिन इसे संतुलित करना करना सरकार को जरूरी नहीं लगता। गौरतलब है कि गर्भवती महिला के प्रसव पर एक सरकारी अस्पताल में कुल खर्च जहां ढाई हजार रुपए से भी कम आता है, वहीं किसी निजी अस्पताल या क्लीनिक में इसी मद में करीब इक्कीस हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

नवभारत टाइम्स ‘चीन की गांठ हॉन्ग कॉन्ग’ शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि हॉन्ग कॉन्ग में छह महीने से जारी अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शनों के बीच वहां हुए स्थानीय चुनावों के नतीजे इन प्रदर्शनों के संदेश को और आगे ले जाने वाले साबित हुए हैं। रविवार को हुई 70 फीसदी से ज्यादा वोटिंग यह बताने के लिए काफी थी कि लोग इसे स्थानीय निकायों के एक सामान्य चुनाव के रूप में नहीं देख रहे थे। उन्होंने हालिया विरोध प्रदर्शनों और उनसे निपटने के शासन के तरीके को गंभीरता से लेते हुए इस पर अपनी सख्त टिप्पणी अपने वोटों के जरिए दी। नतीजा यह रहा कि कुल 18 में से 17 जिला परिषदों पर ऐसे उम्मीदवारों का कब्जा हो गया जो लोकतंत्र समर्थक माने जाते हैं और प्रदर्शनकारियों के पक्ष में हैं। ये जिला परिषदें आम तौर पर बसों के रूट तय करने जैसे लोकल मसले ही देखती हैं, लेकिन पार्षदों की एक जिम्मेदारी ऐसी है जो इन चुनावों की प्रकृति को नितांत स्थानीय नहीं रहने देती। यही निर्वाचित पार्षद अपने बीच से 117 सदस्य चुनकर 1200 सदस्यों की उस समिति में भेजते हैं जिसका काम हॉन्ग कॉन्ग के चीफ एग्जीक्युटिव का चुनाव करना है। बाद में चीन सरकार इस पद पर उसकी नियुक्ति पर मोहर लगाती है। चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि इस बार इस रास्ते से उस समिति में पहुंचने वाले सभी 117 सदस्य लोकतंत्र समर्थक ही होंगे।