27.11.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचारपत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। महाराष्‍ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम पर आज सभी अखबारों ने अलग-अलग तरह से सुर्खियां दी हैं। लम्‍बे विवाद के बाद महाराष्‍ट्र में नई सरकार का रास्‍ता साफ होने को अखबारों ने दलगत आंकड़ों के साथ दिया है। अयोध्‍या मामले पर सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने के एकमत से लिये गए फैसले को भी लगभग सभी अखबारों ने मुखपृष्‍ठ पर विस्‍तार से दिया है। 

कश्‍मीर घाटी में श्रीनगर-बनिहाल और बारामूला-बनिहाल के बीच सुरक्षा कारणों से निलम्बित रेल सेवाओं को कल से फिर शुरू किये जाने का समाचार कुछ अखबारों ने पहले पन्‍ने पर दिया है। 

जनसत्‍ता ने 26/11 हमलों के शहीदों की स्‍मृति में कल मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया पर आयोजित कार्यक्रम और उसमें भावुक पलों की खबर चित्र के साथ दी है। अखबार लिखता है- रक्षामंत्री ने कहा  कि भारत अब आतंकियों के लिए आसान लक्ष्‍य नहीं। पाकिस्‍तान के सुप्रीमकोर्ट द्वारा सेना प्रमुख जनरल बाजवा को तीन साल विस्‍तार देने की इमरान सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाने का समाचार दैनिक ट्रिब्‍यून में है।

राष्ट्रीय सहारा चाबुकों की आदी शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अन्य हिस्सों में बढ़े प्रदूषण के मामले पर केंद्र और राज्यों की सरकारों को जो फटकार लगाई है, वह आंखें खोलने वाली है। हो सकता है कि शीर्ष अदालत की इस भूमिका को भले कोई न्यायिक सक्रियता का नाम दे और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का अनावश्यक हस्तक्षेप माने। वस्तुत: यह न्यायिक हस्तक्षेप सरकारों के निकम्मेपन पर हुआ है। न्यायपालिका के समक्ष किसी भी मसले पर याचिकाएं आती हैं, तो न्यायालय अवश्य अपनी भूमिका का निर्वाह करेगा। इसलिए थोड़ी देर के लिए न्यायालय की इस भूमिका को न्यायिक सक्रियता मान भी लिया जाए तो इसे न्यायालय की सकारात्मक सक्रियता के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकारों के नकारापन के चलते देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को अपनी न्यायिक भूमिका के अलावा सर्वोच्च प्रशासनिक, विधायी और कार्यपालिका की भूमिका का निर्वहन करना पड़ रहा है। यही वजह है कि देश की उच्च अदालतें-विशेषकर सर्वोच्च अदालत-भारी बोझ से दब गई हैं। भारत जैसे कल्याणकारी राज्य व्यवस्था वाले देश में आम जनता को साफ पानी और साफ हवा मुहैया कराना सरकारों का काम है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि प्रदूषित हवा और प्रदूषित पेयजल पर भी राजनीति हो रही है। केंद्र और दिल्ली की सरकार एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि शीर्ष अदालत की ताजा सख्त टिप्पणी के बाद राजनीतिक दलों के नेता और नौकरशाह लोगों को वायु प्रदूषण और दूषित पेयजल से मुक्ति दिलाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई करेंगे।

 दैनिक जागरण अपने संपादकीय में सेहत से खिलवाड़ शीर्षक से लिखता है कि राजधानी के वीवीआईपी इलाक़े के तौर पर पहचाने जाने वाली नई दिल्ली नगर पालिका परिषद क्षेत्र में दो फ़र्ज़ी डॉक्टर गोल मार्केट के पास क्लीनिक चला रहे थे।इनमें से एक झोलाछाप तो 10वीं पास है जबकि दूसरा अपने पास आयुर्वेद की डिग्री बताता है। दोनों न केवल एलोपैथिक दवाएं लिख रहे थे बल्कि उनके क्लीनिकों के पास ऐसी दवाएं बड़ी मात्रा में मिली है। इन दोनों को नोटिस देकर 10 दिन में अपने प्रमाणपत्र दिल्ली मेडिकल काउंसिल में जमा कर अपनी योग्यता साबित करने के लिए कहा गया है। अगर दोनों अपने प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं कर पाए तो इनके ख़िलाफ़ पुलिस में एआईआर दर्ज कराई जाएगी। देश की राजधानी और एक महानगर में इस तरह का मामला आना वाकई गंभीर है। बताया जा रहा है कि दिल्ली में क़रीब 30 हज़ार फ़र्ज़ी डॉक्टर सक्रिय है। हालांकि इसके पीछे लोगों का जागरुक न होना भी एक बड़ा कारण है। बावजूद इसके दिल्ली एवं केन्द्र सरकार दोनों को चाहिए कि स्वास्थ्य सुविधाओं को जन जन तक और सुलभ एवं सुगम बनाया जाए। साथ ही ग़रीब तबके के लोगों को जागरुक करने की मुहिम भी चलाई जाए। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और जन जागरुकता अभियान ही झोलाछाप डॉक्टरों की दुकान पर ताला लगा सकता है।   

आलेखः- हिन्दी एकांश

विदेश प्रसारण प्रभाग, आकाशवाणी