28.11.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों ने अलग अलग विषयों पर संपादकीय लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचार ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।

मुंबई में शिवाजी पार्क में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस गठबंधन-महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के नेता उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण अखबारों की बड़ी खबर है। राजस्थान पत्रिका की सुर्खी है-डिप्टी सीएम एनसीपी, स्पीकर का पद कांग्रेस के खाते में। बाधा दौड़ पार, अब मैराथन पर नजर।

भारत के कार्टोसेट-3 के प्रक्षेपण पर दैनिक भास्कर लिखता है-भारत के पास दुनिया की सबसे तेज निगाह। 509 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष से कार का नंबर तक पढ़ लेगा सैटेलाईट।

लोकसभा में विशेष सुरक्षा समूह-एसपीजी अधिनियम संशोधन विधेयक की मंजूरी पर जनसत्ता ने गृहमंत्री अमित शाह की टिप्पणी को सुर्खी दी है-कांग्रेस को सिर्फ एक परिवार की चिंता। शाह ने कहा गांधी परिवार की सुरक्षा बदली गई है, उन्हें जेड प्लस सीआरपीएफ कवर, अत्याधुनिक सुरक्षा संपर्क-एएसएल और एंबुलेंस के साथ दी गई है सुरक्षा।

‘जिसकी मंज़िल आसमान’ नाम से अपने संपादकीय लेख में दैनिक हिंदुस्तान का लिखना है कि उसकी ऐसी कामयाबियां अब रोजमर्रा की बात लगती हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, यानी इसरो के लिए पीएसएलवी रॉकेट छोड़ना और उसके जरिए अंतरिक्ष में एक बड़े व 13 नन्हे सैटेलाइट को स्थापित करना अब कोई बड़ी बात नहीं लगती। ऐसा संगठन, जो अपने यान को मंगल ग्रह तक भेज चुका हो और अपने यान को चांद तक पर उतारा हो, उसके लिए अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करना कोई बड़ी बात नहीं है। इसरो की ऐसी रोजमर्रा की कामयाबियां हमारे गौरव बोध को नया विस्तार भले ही न देती हों, लेकिन ये उसकी नींव जरूर मजबूत करती हैं। दुनिया के अंतरिक्ष बाजार में इसरो की विश्वसनीयता लगातार बढ़ी है। बुधवार को उसने जो 14 सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए, उनमें 13 तो अमेरिकी हैं। अमेरिका जैसे अंतरिक्ष कारोबार के अग्रणी और अति विकसित देश की कंपनियां अगर अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित कराने के लिए इसरो पर भरोसा कर रही हैं, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। इसरो की यह साख इसलिए बनी है, क्योंकि दुनिया भर की अंतरिक्ष कंपनियों में असफलता की सबसे कम दर इसरो की है। अंतरिक्ष बाजार में सफलता की दर से भी ज्यादा मायने असफलता की दर रखती है। जिसकी असफलता की दर जितनी कम होगी, वह उतनी ही भरोसे के लायक अंतरिक्ष एजेंसी है। कोई भी उपग्रह बरसों के शोध और मेहनत का नतीजा होता है, इसमें सिर्फ अत्याधुनिक तकनीक ही नहीं होती, भारी निवेश भी होता है। ऐसे उपग्रह के लिए भरोसा वहीं किया जा सकता है, जहां जोखिम सबसे कम हो। देश का निजी क्षेत्र भी चाहे तो इसरो की इस कामयाबी से बहुत कुछ सीख सकता है।
बुधवार को इसरो ने जिस भारतीय उपग्रह को लॉन्च किया, उसका जिक्र भी यहां जरूरी है। कार्टोसैट-3 नाम का यह उपग्रह संचार और निगरानी का काम करेगा। हर पल धरती की तस्वीरें भेजने वाला यह उपग्रह हमारी सामरिक और नागरिक, कई तरह की जरूरतों में काम आएगा। इसमें लगे कैमरों की नजर इतनी विकसित है कि वे धरती पर दस इंच से छोटी वस्तु या जगह की तस्वीर अच्छी तरह ले सकते हैं, और अंधेरे में भी निगरानी कर सकते हैं। जाहिर है, वे सीमा पर किसी भी घुसपैठ की सूचना वक्त रहते दे सकेंगे और देश के भीतर भी आतंकियों की सक्रियता को रिकॉर्ड कर सकेंगे। इनसे देश के वनों पर भी नजर रखी जा सकेगी और शहरीकरण को भी ठीक से समझा-देखा जा सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि देश को इसके बाद बहुत सी सूचनाओं के लिए विदेशी एजेंसियों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। प्राकृतिक आपदाओें के समय भी यह हमारी मदद करेगा और तब भी, जब कहीं प्रदूषण बढ़ रहा होगा।
इसरो ऐसे कामों को अंजाम देने वाला सफल संगठन भर नहीं है। वह बहुत अच्छा रोल मॉडल भी है, हसरतों के संग्रहालय में सबसे ऊपर सजाकर रखने लायक एक नाम, जिससे सब प्रेरणा लें और उसकी तरह बनने की कोशिश करें। देश के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र से सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उन्होंने कभी इसरो को अपना रोल मॉडल नहीं बनाया और न ही उससे प्रेरणा लेने की कोशिश की। अपनी कामयाबियों से इसरो ने जो आत्मविश्वास हासिल किया है, काश! देश के बाकी संगठन उसका एक छोटा सा हिस्सा भी हासिल कर पाते।

बदलाव की परीक्षा नामक संपादकीय में नवभारत टाइम्स का कहना है कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा के प्रश्नपत्रों के प्रारूप में बुनियादी बदलाव लाने का फैसला किया है। इस परिवर्तन का उद्देश्य शिक्षा-परीक्षा को मशीनी धज से बाहर निकालकर उनमें तर्क क्षमता और कल्पनाशीलता के लिए गुंजाइश बढ़ाना है। एसोचैम द्वारा आयोजित शिक्षा शिखर सम्मेलन में सीबीएसई के सचिव अनुराग त्रिपाठी ने बताया कि बदलाव की इस प्रक्रिया के तहत अगले साल होने वाले बोर्ड एग्जाम में 10वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 20 फीसदी ऑब्जेक्टिव सवाल हल करने होंगे, जबकि 10 फीसदी सवाल रचनात्मक सोच-विचार पर आधारित होंगे। 2023 तक दोनों परीक्षाओं के प्रश्नपत्र पूरी तरह रचनात्मक, आलोचनात्मक और विश्लेषण क्षमता की परख करने वाले हो जाएंगे।

एक अरसे से कहा जा रहा है कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली जड़ होकर महज एक नंबर गेम में बदल गई है। जो जितना बेहतर तरीके से सवालों के जवाब रट लेता है वह उतने ज्यादा अंक पा लेता है। तमाम स्कूलों और कोचिंग संस्थानों का मकसद बच्चों को कुछ नया सिखाना नहीं बल्कि वह कुंजी पकड़ाना भर रह गया है, जिससे अंकों का खजाना खुलता है। यूं कहें कि वे बच्चों को रट्टू तोता बना रहे हैं। ऑब्जेक्टिव प्रश्नों की बहुतायत के चलते सारा जोर सूचना पर है और ज्ञान की उपेक्षा हो रही है। एनसीईआरटी ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि पैंसठ प्रतिशत बच्चों को छपा हुआ टेक्स्ट पढ़ना तो आता है लेकिन उसका अर्थ वे नहीं जानते। इस तरह बच्चों के भीतर न तो रचनात्मकता जगाई जा रही है, न ही उनमें जिज्ञासा या खोजबीन की ललक पैदा हो रही है। शोध और अन्वेषण में भारत के फिसड्डी रह जाने की मुख्य वजह यही है। झोली भर-भरकर नंबर पाने वाले बच्चे आगे चलकर क्या कर पाते हैं, यह वरिष्ठ भारतीय उद्यमियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शिकायतों से जाहिर होता है। वे साफ कहते हैं कि भारत में इंजीनियरों के पास सिर्फ डिग्री होती है, योग्यता नहीं। परीक्षा के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन और देशों में भी किया जाता है लेकिन उनका जोर विद्यार्थियों की प्रतिभा को उभारने पर होता है। अभी जबकि सीबीएसई ने परीक्षा पद्धति को सुधारने का फैसला किया है तो ऐसा करते हुए उसको सारे पहलुओं पर ध्यान देना होगा। न सिर्फ प्रश्न तय करने में बल्कि मूल्यांकन की प्रक्रिया में भी समर्थ लोगों को शामिल किया है।

भारतीय शिक्षा को मशीनी बनाने में शिक्षकों का भी बड़ा योगदान है। उन्हें न तो पर्याप्त प्रशिक्षण मिला होता है, न ही उनके भीतर कोई नई दृष्टि पैदा करने की कोशिश की जाती है। प्राय: वे उसी पद्धति को ढोते रहते हैं, जिससे खुद पढ़कर आए होते हैं। इसलिए परीक्षा में बदलाव से पहले क्लास में शिक्षण के तौर-तरीकों में कल्पनाशीलता और नवाचार को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए कुछ अलग इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाना पड़ सकता है।