29.11.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित हिंदी समाचार पत्रों में विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।

महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्‍व में शिवसेना, एन.सी.पी. और कांग्रेस गठबंधन सरकार के सत्‍ता संभालने का समाचार आज के सभी अखबारों की पहली बड़ी खबर है। हिन्‍दुस्‍तान की सुर्खी है – महाराष्‍ट्र में अघाड़ी राज का आगाज़।

राष्‍ट्रीय सहारा के शब्‍द हैं – महाराष्‍ट्र की राजनीति में नया युग। दैनिक भास्‍कर लिखता है – ‘सेकुलर’ उद्धव का राजतिलक। तीनों दलों के दो-दो मंत्री।

लोकसभा में साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर के नाथूराम गोडसे पर विवादास्‍पद बयान के बाद भाजपा द्वारा साध्‍वी पर सख्‍ती अधिकांश समाचार पत्रों ने मुख पृष्‍ठ पर दिया है।

22 हजार आठ सौ करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी का समाचार जनसत्‍ता ने पहले पन्‍ने पर दिया है। रक्षा खरीद समिति बैठक में लिया गया निर्णय।

पश्चिम बंगाल और उत्‍तराखंड में विधानसभा उपचुनाव में सत्‍ताधारी दलों का दबदबा कायम दैनिक जागरण की खबर है। पत्र लिखता है ”बंगाल में तृणमूल और उत्‍तराखंड में भा ज पा जीती।”

अमर उजाला ने कारोबार पन्‍ने पर खबर दी है – विदेशों में बसे भारतीयों ने घर भेजे पांच दशमलव पांच लाख करोड़ रुपये। पत्र लिखता है – 2018 में विदेशी मुद्रा भेजने के मामले में भारतीय सबसे आगे, चीन दूसरे पायदान पर।

दिल्‍ली की अ‍नधिकृत कालोनियों के निवासियों को मिलेगा मालिकाना हक, लोकसभा में विधेयक को मिली मंजूरी। इस खबर को हरि भूमि ने प्रमुखता दी है।

गाँधी के खिलाफ नाम से अपने संपादकीय में दैनिक हिंदुस्तान का लिखना है कि महात्मा गांधी का नाम देश की भावनाओं और इसके इतिहास-बोध के साथ कई तरह से गुंथा हुआ है। आज जो भारत हमारे पास है, उसकी कोई भी अवधारणा गांधी को बीच में स्थापित किए बिना मुमकिन नहीं दिखती। यही वजह है कि जब गांधी की इस स्थिति पर कोई हमला होता है या फिर उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को किसी भी तरह से स्थापित करने की कोशिश होती है, तो देश की राजनीति में भूचाल-सा आ जाता है। हमारी राजनीति में भले ही हजारों मतभेद हों, पर गांधी के सम्मान को लेकर शायद ही कोई मतभेद रहा।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक फर्क जरूर आया है। सोशल मीडिया ने हाशिए के इन चरमपंथी संगठनों को यह अवसर दे दिया है कि वे मुख्यधारा के शांत प्रवाह में अपनी नाटकीय उपस्थिति दर्ज करा सकें। एक ऐसे समय में, जब लोगों का ज्ञान, इतिहास बोध या तमाम धारणाएं वाट्सएप व फेसबुक से निर्धारित हो रही हों, तो चरमपंथ को महज हाशिए की चीज मानकर नजरंदाज कर देना खतरनाक साबित हो सकता है। यह खतरा भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। बात अगर सोशल मीडिया तक हो तब भी गनीमत है, पर ऐसे ही स्वर देश की संसद में भी सुनाई देने लगें, तो यह चिंता कई गुना बढ़ जाती है।
भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने जब किसी संदर्भ में गोडसे को देशभक्त कहा, तो इस पर जो चौतरफा और तीखी प्रतिक्रिया हुई, उसे समझा जा सकता है। अच्छी बात यह है कि भाजपा ने अपनी तरफ से सक्रियता दिखाई और पार्टी के बड़े नेताओं ने न सिर्फ इसकी निंदा की, बल्कि प्रज्ञा ठाकुर को भाजपा संसदीय दल की बैठक में भाग लेने से भी रोक दिया गया। लोकसभा में की गई टिप्पणी के बाद प्रज्ञा ठाकुर को इस संसदीय समिति से भी हटा दिया गया है। इस मामले में विपक्ष और सत्ताधारी दल, दोनों की अपनी-अपनी तरह से सक्रियता उम्मीद बंधाती है।
महाराष्ट्र की कमान नामक संपादकीय शीर्षक में जनसत्ता का कहना है कि उद्धव ठाकरे की अगुआई में महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार के कामकाज संभालने के साथ ही प्रदेश में राजनीतिक उठापटक आखिर समाप्त हो गई। भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ा था। दोनों के सदस्यों को मिला कर उनके पास स्पष्ट बहुमत था, पर सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर शिवसेना गठबंधन से अलग हो गई। फिर उसका उन दलों के साथ समीकरण बना, जिनका विरोध करते हुए वह चुनाव मैदान में उतरी थी। उसने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया और कुछ छोटे दलों तथा निर्दलीय विधायकों के साथ मिल कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। मगर एनसीपी के अजित पवार ने पाला बदला और भाजपा के खेमे में जा पहुंचे। इस तरह राज्यपाल ने आनन-फानन देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उपमुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। मगर दो दिन बाद ही जरूरी संख्याबल न होने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
शिवसेना की जिद थी कि मुख्यमंत्री का पद उसी के पास हो, सो उद्धव ठाकरे को इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। एनसीपी और कांग्रेस को भी महत्त्वपूर्ण पद मिले। मंत्री पद का बंटवारा भी इन पार्टियों के बीच सदन में भागीदारी के हिसाब से मिलना तय है। जब तीनों दल साथ आए, तो उनमें शुरू से ही इस बात को लेकर आशंका बनी हुई थी कि यह गठबंधन कितने दिन चल पाएगा, वे मिल कर स्थायी सरकार दे भी पाएंगे या नहीं। क्योंकि अगर उनकी सरकार बीच में गिर जाती है, तो महाराष्ट्र में इन तीनों दलों की स्थिति बहुत खराब हो जाएगी। इसलिए इनके बीच लंबे समय तक मंथन चलता रहा। आखिरकार इन्होंने महाराष्ट्र अघाड़ी गठबंधन बनाया और न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार किया। इसमें किसान, रोजगार, धर्मनिरपेक्षता और विकास के मुद्दे पर काम करने की सहमति बनी है। शिवसेना के प्रवक्ता ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम की जानकारी देते हुए दावा किया कि यह सरकार सभी जाति और प्रांत के लोगों को साथ लेकर काम करेगी। इससे निस्संदेह महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार के स्थायित्व की उम्मीद बनती है।