02.12.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों में अलग अलग विषयों पर संपादकीय लिखे गए हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।
मोबाइल कॉलस की दरें महंगी होने को आज के अखबारों ने अहमियत दी है। जनसत्ता लिखता है- उपभोक्ताओं के लिए सस्ती कॉल और डेटा का दौर खत्म। कल से वोडाफोन, आइडिया और एयरटेल तथा छह दिसंबर से रिलायंस जियो की दरें बढ़ेंगी।
प्रदूषण की समस्या पर ढुलमुल रवैये पर दैनिक जागरण की सुर्खी है-प्रदूषण पर नहीं चेते राज्य, 23 राज्यों को दिया गया पैसा और प्लान, नहीं किया काम।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सारकेगुड़ा कांड की न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट पर राजस्थान पत्रिका लिखता है- फर्जी थी सारकेगुड़ा मुठभेड़। सात नाबालिग समेत 17 लोगों की हुई थी मौत। नहीं था कोई माआवोदी।
हैदराबाद में महिला डॉक्टर को सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा जलाने की घटना पर देश भर में रोष और ऐसे मामलों के प्रति राज्य सरकारों की उदासीनता पर राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है-कई राज्यों ने इस्तेमाल नहीं किया निर्भया फंड। आवंटित धनराशि में से ग्यारह राज्यों ने एक रूपया भी खर्च नहीं किया।
हिंदुस्तान की खास खबर है- रबर के अंगूठे से बैंक खातों में सेंध लगा रहे ठग।
दैनिक भास्कर की सुर्खी है- भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड-बीसीसीआई ने नियमों में किया बदलाव। सौरभ गांगुली 2024 तक रह सकते हैं अध्यक्ष।
सुस्ती का सामना, इस नाम से अपने संपादकीय में नवभारत टाइम्स ने लिखा है कि शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई-सितंबर, 2019 की तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि की दर 4.5 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह लगातार छठी तिमाही है, जब जीडीपी के बढ़ने की दर में गिरावट आई है। गौरतलब है कि जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है। भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर तय होती है। पिछले कुछ समय से इन तीनों ही क्षेत्रों में भारी सुस्ती दिख रही है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का तो बुरा हाल है जिसमें बढ़ोत्तरी की जगह आधे प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। कृषि क्षेत्र में वृद्धि की दर 4.9 से गिरकर 2.1 फीसदी और सर्विसेज की दर भी 7.3 फीसदी से गिरकर 6.8 ही रह गई है। मुश्किल यह है कि आम उपभोक्ताओं ने हाथ बांध रखे हैं। लोग सामान नहीं खरीद रहे हैं, वे अपने रोजमर्रा के खर्च में कटौती कर रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे मांग पैदा हो नहीं रही है। कारोबारी दुविधा में हैं। कंपनियों को अपना प्रॉडक्शन कम करना पड़ रहा है। उनमें से कई अपने कर्मचारियों की छंटनी करने को मजबूर हो रही हैं।
दरअसल बड़े पैमाने पर रोजगार न होने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्लोडाउन की खबरें आने, आवास प्रॉजेक्ट फंसने, पब्लिक सेक्टर की कई कंपनियों व बैंकों के संकट में पड़ने और कई वस्तुओं की बढ़ती महंगाई ने लोगों को आशंकाओं से भर दिया है। वे खरीदारी और निवेश से कतरा रहे हैं। हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगली तिमाही से हालात सुधर सकते हैं। सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पिछले दिनों जो उपाय किए हैं, उनका असर अगली तिमाही से दिखना शुरू हो जाएगा। गौरतलब है कि सरकार ने विदेशी निवेशकों से सरचार्ज हटाया और कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की। ऑटो सेक्टर की बेहतरी के लिए घोषणाएं की गईं, संकटग्रस्त रीयल एस्टेट और नॉन बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों के लिए भी कदम उठाए गए। इन सबसे बाजार में सुधार की आशा है।
हैशटैग की भेड़चाल नामक संपादकीय शीर्षक से दैनिक हिंदुस्तान का कहना है कि तकनीक शब्दों, प्रतीकों और संकेतों के अर्थ बदल देती है। यूरोपीय भाषाओं का एक सांकेतिक अक्षर है हैशटैग। परंपरागत रूप से इसे संख्याओं से जोड़कर पेश किया जाता था, इसलिए इसे नंबर साइन भी कहा जाता था। लेकिन सूचना तकनीक ने जैसे ही इसे सर्च इंजन की सहूलियत वाली एक निशानी के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया, इसकी तो किस्मत ही बदल गई। सोशल मीडिया पर आने के बाद इसका उपयोग बेतहाशा बढ़ गया। ट्िवटर और फेसबुक पर ये हैशटैग किसी भी विषय की मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, यानी यदि आप हैशटैग उद्धव ठाकरे पर पोस्ट करते हैं, तो आपकी पोस्ट इस हैशटैग की बाकी सारी पोस्ट के साथ दिख जाएगी। वैसे आप चाहें, तो हैशटैग देवेंद्र फडणवीस के नाम पर भी पोस्ट कर सकते हैं, या फिर हैशटैग अजित पवार पर भी। जितनी तरह की राजनीतिक धाराएं संभव हैं, सबका हैशटैग बन जाता है। अनगिनत लोगों की कोशिश रहती है कि वे अपनी पोस्ट हैशटैग के साथ ही पेश करें, इससे वे उस विषय की मुख्यधारा में शामिल हो जाते हैं। उनकी बातों को पढे़ व देखे जाने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। सभी यही करते हैं, पर क्या सब हैशटैग को गंभीरता से भी लेते हैं? पिछले दिनों कोलंबिया जर्नलिज्म रिव्यू  ने इसे परखने की कोशिश की, तो काफी दिलचस्प नतीजे मिले।
पत्रिका ने इसके लिए दुनिया भर में खासे प्रचारित हैशटैग मीटू का इस्तेमाल किया। यह बहुचर्चित हैशटैग उच्च-पदस्थ पुरुषों द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न से संबंधित था। महिला उत्पीड़न से जुड़ी एक ही खबर पहले हैशटैग के साथ और बाद में बिना हैशटैग के पोस्ट की गई। यह पाया गया कि बिना हैशटैग वाली पोस्ट से तो खबर खूब पढ़ी गई, पर दूसरी खबर नजरंदाज हो गई। वैसे इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हैशटैग में पोस्ट की इतनी बाढ़ आ जाती है कि किसी मूल खबर को पढ़ने की लोगों की उत्सुकता कम हो जाती है। अगली बार जो खबर चुनी गई, वह एक सर्वेक्षण की थी, जिसमें पाया गया कि 81 प्रतिशत महिलाओं और 43 प्रतिशत पुरुषों को लैंगिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा। नतीजे इस बार भी यही थे, मगर इस बार इन पोस्ट पर की गई टिप्पणियों को भी दर्ज किया गया। पाया गया कि हैशटैग पर की गई टिप्पणियां या तो आक्रामक थीं या फिर बहुत नकारात्मक। जैसे एक टिप्पणी थी कि आपकी बात सही हो सकती है, पर यह सब अब बहुत हो गया। इसके विपरीत बिना हैशटैग वाली पोस्ट में टिप्पणियां अपेक्षाकृत संयत थीं।
वैसे सोशल मीडिया पर हैशटैग एक बड़ी भूमिका निभाता है। वह हर एक को किसी भी विमर्श की मुख्यधारा से जुड़ने के मौका देता है, साथ ही यह संभावना भी बनती है कि उसकी पोस्ट पूरी तरह नजरंदाज न हो जाए। हैशटैग ने कई मुद्दों और आंदोलनों को न सिर्फ मजबूत किया, बल्कि नया विस्तार भी दिया है। मगर इसी के साथ का एक दूसरा सच यह भी है कि हैशटैग सोशल मीडिया पर एक भेड़चाल को भी जन्म देता है। किसी भी भेड़चाल की एक खासियत यह होती है कि यह लोगों को गंभीरता से सोचने-समझने और गहरे अध्ययन से रोकती है। जैसे किसी भेड़चाल से लोग एक समय बाद ऊब जाते हैं, वही हैशटैग से भी होता है। यह साबित करता है कि सोशल मीडिया विमर्श को विस्तार देने का माध्यम भले ही हो, यह गंभीर मनन का विकल्प नहीं है।