03.12.2019

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ समाचारों ने भी सुर्खियों में स्थान पाया है। हैदराबाद में महिला पशु चिकित्‍सक के साथ दुष्‍कर्म और उसकी हत्‍या की घटना पर देशभर में आक्रोश की गूंज संसद में भी सुनाई पड़ी। दोनों सदनों में घटना की कड़ी निंदा और दोषियों को सख्‍त सज़ा की मांग आज के सभी अखबारों की पहली बड़ी खबर है। हिन्‍दुस्‍तान की सुर्खी है- दुष्‍कर्म पर संसद से सड़क तक उबाल। राजनाथ बोले, कठोर कानून बनाएंगे। नवभारत टाइम्‍स के शब्‍द हैं – अब निर्भया नहीं, बनेगा सख्‍त कानून।

क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने वाले 2018 के उच्‍चतम न्‍यायालय के आदेश पर केन्‍द्र सरकार के न्‍यायालय से पुनर्विचार के अनुरोध को भी अधिकांश समाचार पत्रों ने पहले पन्‍ने पर दिया है। बकौल राष्‍ट्रीय सहारा केन्‍द्र का सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध – क्रीमी लेयर आरक्षण मामले में हो संविधान पीठ का गठन।

अयोध्‍या मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अमर उजाला की सुर्खी है – जमीयत उलमा-ए-हिंद ने दायर की पहली पुनर्विचार याचिका। याचिका में सवाल उठाया गया कि मस्जिद गिराना गैर कानूनी तो फैसला हिंदुओं के हक में कैसे।

देश में मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में नवम्‍बर माह में सुधार आने की खबर बिजनेस भास्‍कर में है। पत्र के अनुसार अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार के संकेत। पीएमआई इंडेक्‍स नवंबर में बढ़कर 51 दशमलव दो प्रतिशत हुआ।

दैनिक जागरण ‘विकास विरोधी राजनीति’ शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बुलेट ट्रेन परियोजना की समीक्षा के आदेश देकर इस अंदेशे को बढ़ाने का ही काम किया है कि राज्य की नई सरकार इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर अड़ंगा लगा सकती है। इसके पहले उद्धव ठाकरे मुंबई में बनने वाले आरे मेट्रो कार शेड निर्माण को रोकने के आदेश दे चुके है। उन्होंने यह आदेश इस आधार पर दिया कि इस मेट्रो कार शेड निर्माण के लिए कई पेड़ काटे गए। हालांकि जरूरत भर के पेड़ काटे जा चुके है, फिर भी ठाकरे सरकार मेट्रो कार शेड का निर्माण ठप करना पसंद कर रही है। इसका नतीजा यह होगा कि नई जगह मेट्रो कार शेड बनने में देर तो होगी ही, उसकी लागत भी बढ़ जाएगी। वक्त और पैसे की बर्बादी करने वाला यह काम तब हो रहा है जब राज्य सरकार के खजाने में पर्याप्त धन न होने का रोना भी रोया जा रहा है। हैरत नहीं कि यही रोना रोकर उद्धव ठाकरे पिछली सरकार और साथ ही केंद्र सरकार की कुछ और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर कैंची चलाते दिखे।

एक अन्य विषय को अपने संपादकीय का विषय बनाते हुए दैनिक जागरण लिखता है कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) यूँ तो पूरे देश के लिए अहम मसला है, लेकिन बंगाल में यह राजनीतिक दलों के टकराव का केंद्र बिंदु बना हुआ है। ख़ासकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है। हालिया संपन्न विधानसभा उपचुनाव में तृणमूल को तीनों सीटों पर जीत मिल गई, जिसे एनआरसी के विरोध का नतीजा माना जा रहा है। मुख्यमंत्री और तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी की इस मुद्दे पर पहली कोशिश केंद्र सरकार पर हमला बोल अल्पसंख्यकों के वोट को खींचना था, जो उपचुनाव में स्पष्ट दिखा भी। यही नहीं, भाजपा प्रदेश नेतृत्व भी मान रहा है कि एनआरसी की वजह से ही हार मिली है। वैसे भी वर्ष 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में ममता को अल्पसंख्यक बहुल इलाकों की करीब 125 सीटों में से क्रमश: 90 और 105 पर जीत मिली थी, लेकिन गुजरे लोकसभा चुनाव में कहानी बदल गई। यही वजह है कि संसद में कभी घुसपैठियों के मु्द्दे पर हंगामा खड़ा करने वाली ममता अब विपरीत ध्रुव पर खड़ी हैं। ज़ाहिर तौर पर यह मुद्दा बंगाल में और गरमाने जा रहा है, क्योंकि भाजपा और तृणमूल इसे लेकर एक-दूसरे को घेरने में लगे हुए हैं तो बाक़ी राजनीतिक दल भी बनने-बिगड़ने वाले समीकरण में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं।