04.12.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही अन्य अहम समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। एस पी जी कानून में संशोधन संबंधी विधेयक संसद से पारित होने की खबर सभी समाचार पत्रों में है। अमर उजाला की सुर्खी है- अब सिर्फ प्रधानमंत्री को मिलेगा एस पी जी का सुरक्षा कवच। देशबंधु की सुर्खी है- लोकसभा के बाद राज्‍यसभा से भी पास हुआ एस पी जी संशोधन विधेयक।  राजस्‍थान पत्रिका ने लिखा है- आयकर विभाग ने कांग्रेस को भेजा नोटिस, मांगा 170 करोड़ रूपये का हिसाब। तीन हजार तीन सौ करोड़ के हवाला रैकेट की जांच का हिस्‍सा होने पर गर्मा सकती है सियासत। नौसेना प्रमुख ने की पुष्टि – नौसेना ने खदेड़ा था चीनी जहाज – दैनिक जागरण में है। पत्र लिखता है- सितम्‍बर में की थी अंडमान के समुद्र में घुसपैठ। राजस्‍थान पत्रिका ने आज नौसेना दिवस पर नौसेना के शौर्य को सलाम करते हुए लिखा है- 1971 की लड़ाई में नौसेना के जवानों ने पाकिस्‍तान को चटाई थी धूल। जनसत्‍ता की सुर्खी है – भारतीय इंजीनियर ने खोजा लैंडर विक्रम का मलबा, चेन्‍नई के सुब्रमण्‍यम को श्रेय दिया नासा ने। पंजाब केसरी का शीर्षक है- जो नासा नहीं कर पाया वह एक भारतीय ने कर दिखाया।

नवभारत टाइम्स का सम्पादकीय है सिर पर खड़ा संकट। पत्र लिखता है कि दुनिया भर के पर्यावरणविदों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ आम आदमी की भी नजर मैड्रिड में हो रहे वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप 25) पर टिकी है। इसे पेरिस संधि पर अमल का सम्मेलन बताया जा रहा है। बैठक का मुख्य मुद्दा यही है कि किस तरह धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने दिया जाए। इसके अलावा विकासशील और विकसित देशों के बीच सामंजस्य बनाने के रास्तों पर भी चर्चा होगी। देखना है, सम्मेलन अपने इस मकसद में किस हद तक कामयाब हो पाता है। बीते सोमवार को शुरू हुआ यह सम्मेलन दो हफ्ते चलेगा। कुछ समय पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट’ में कहा गया था कि राजनेताओं के रवैये के कारण पेरिस संधि का लक्ष्य निर्धारित समय पर तो क्या, देर से भी पूरा होना कठिन है। यही कारण है कि हालात सुधरने के बजाय दिनोंदिन और बिगड़ते ही जा रहे हैं। कॉप 25 का यह सम्मेलन इस दृष्टि से बेहद अहम है। सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की समस्या नहीं है, वैश्विक स्तर पर हम अभी ही जलवायु संकट का सामना कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर चिंता प्रकट की कि वैश्विक तापमान कम करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हो पा रहे। पेरिस समझौते के संकल्प पूरे कर लिए जाएं तो भी इस सदी में तापमान वृद्धि 3.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचेगी, बशर्ते बहुत असाधारण कार्रवाई ना की जाए। लेकिन गुतारेस ने आशा जताई कि अगर हम वैज्ञानिकों के सुझाए रास्ते पर चलें तो तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री तक सीमित रखना अभी भी संभव है। गुतारेस अपनी जगह सही हैं लेकिन दिक्कत यह है कि विभिन्न देश अपनी समस्याओं को पूरी धरती के संदर्भ में नहीं देख पा रहे। अपने तात्कालिक हितों को परे रखकर दीर्घकालीन भविष्य के लिए सबके साथ मिलकर चलने का विवेक उनमें पैदा नहीं हो पा रहा। अगर कॉप 25 उनमें एक हद तक भी यह भाव भरने में सफल रहा तो यह उसकी सार्थकता होगी।

हिन्दुस्तान  “विक्रम लैंडर को खोजना ”  शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखता है कि लगन का क्या अर्थ होता है और उसके नतीजे कैसे होते हैं, इसे जानना हो, तो हमें चेन्नई के षणमुगा सुब्रमण्यम की सफलता से समझना होगा। अपने घर के एक कोने में नासा के ल्यूनर रिकॉनसेंस आर्बिटर के लगातार अपडेट होने वाले डाटा को खंगालते हुए वह चांद के उस कोने को ढूंढ़ने में कामयाब रहे, जहां चंद्रयान-2 से छोडे़ गए विक्रम लैंडर का मलबा गिरा पड़ा है। तमाम बाधाओं के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानी इसरो का चंद्रयान-2 अभियान इस साल 22 जुलाई को शुरू हुआ था। अंतरिक्ष के लंबे और वक्रीय रास्ते को पार करने के बाद इसे आखिर में 6 सिंतबर को चांद पर विक्रम लैंडर को उतारना था। पूरा अभियान सफलता से चला, लेकिन आखिरी वक्त में उस समय मामूली सी चूक हो गई, जब विक्रम लैंडर को चांद की सतह को छूना था। जिस दिन यह घटना हुई, उसके बाद से सुब्रमण्यम चांद की विस्तृत उपग्रह तस्वीरों में उस जगह को ढूंढ़ने में जुट गए, जहां विक्रम लैंडर का मलबा गिरा है। ल्यूनर रिकॉनसेंस आर्बिटर की डाटा साइट पर चांद की सतह का विस्तृत ब्योरा लगभग उसी तरह से है, जैसे गूगल मैप में हमारी धरती की तस्वीर है। कोई भी वहां जाकर चांद की सतह को खंगाल सकता है। सुब्रमण्यम जुटे रहे और अंत में उस जगह को ढूंढ़ने में कामयाब रहे, जहां वह मलबा गिरा था। सुब्रमण्यम ने अपनी पड़ताल के नतीजे अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को भेजे, अपनी जांच के बाद मंगलवार को नासा ने भी यही कहा कि सुब्रमण्यम ने जो बिंदु खोजे हैं, वे विक्रम लैंडर के ही टुकड़े हैं। ये टुकडे़ उस जगह से 750 मीटर दूर मिले हैं, जहां दरअसल विक्रम लैंडर को उतरना था। दिलचस्प बात यह है कि सुब्रमण्यम कोई अंतरिक्ष वैज्ञानिक नहीं हैं। वह पूरे दिन चेन्नई की एक निजी कंपनी में काम करते हैं और रात को घर पर अंतरिक्ष की जानकारी लेने का काम शौकिया तौर पर करते हैं।

यह भी मुमकिन है कि ये सारे ब्योरे इसरो के पास पहले से ही मौजूद हों। हो सकता है कि इसरो के लिए इसका कोई बहुत बड़ा अर्थ न भी हो, लेकिन सुब्रमण्यम की सफलता ने यह तो बता दिया कि अंतरिक्ष का बहुत सारा डाटा अब आम लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध है। और जिन खोजा, तिन पाइयां की तर्ज पर यहां भी कामयाबी के कई दरवाजे खुल सकते हैं। ब्रह्मांड के बहुत सारे रहस्य अब सबकी पहुंच के भीतर हैं।