ट्रम्प ने इजरायल की बस्तियों को वैध किया

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ की इजरायल की बस्तियों के कब्जे वाले क्षेत्रों बारे में अचानक और अप्रत्याशित घोषणा न केवल अंतरराष्ट्रीय सहमति के विपरीत है बल्कि यह 1967 के जून युद्ध के बाद से चली आ रही द्वी-पक्षीय अमरीकी नीति को भी पलट देती है। अमरीकी नीति के ‘असंगत’ होने का तर्क देते हुए श्री पोम्पिओ ने यह घोषणा की है कि वेस्ट बैंक में इजरायली नागरिक बस्तियों की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से असंगत नहीं है और “इजरायल और फिलिस्तीनियों के लिए” इन बस्तियों और वेस्ट बैंक दोनों की स्थिति को लेकर समझौता वार्ता होनी चाहिए।

बस्तियों में बनाई गयी आवास इकाइयों का पता चलता है कि इज़राइल ने 1967 में जून में हुई लडाई के दौरान सिनाई प्रायद्वीप, गोलान हाइट्स, गाजा पट्टी, और पश्चिमी यरुशलम सहित वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया था। लडाई समाप्त होने के तुरंत बाद ये गतिविधियाँ शुरू हुईं। सबसे पहले, इजरायल ने यरूशलेम के पूर्वी हिस्से पर अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का विस्तार किया, इस हिस्से पर युद्ध से पहले जॉर्डन का नियंत्रण था। फिर गोलन हाइट्स पर पहली बस्ती का निर्माण शुरू किया, इसके बाद कब्जे वाले क्षेत्रों के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के कदम उठाए।

आज वेस्ट बैंक में लगभग 130 कानूनी बस्तियाँ हैं और अन्य 100 अनाधिकृत चौकी हैं और इनमें 400,000 इज़राइली लोगों के रहने का अनुमान हैं। इसके अलावा, जून 1967 में बनी सीमा से बाहर पूर्वी येरुशलम में बसे 12 यहूदी पड़ोस में लगभग 200,000 इज़राइली नागरिक रहते हैं। गोलन हाइट्स पर 32 बस्तियों में लगभग 22,000 लोग रहते हैं।

इजरायल की यह बस्तियां उनके अरब पड़ोसियों के साथ शांति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिस्र के साथ कैंप डेविड समझौत ने सिनाई प्रायद्वीप से इजरायल को बाहर निकालने और 1982 में यमित की बस्ती को ध्वस्त करने का काम किया। एक तरफा छुटकारे पाने की कार्रवाई में अगस्त 2005 में दौरान भी यही हुआ था जब गाजा पट्टी से इज़राइल ने 21 बस्तियों में रहने वालें लगभग 8,000 वासियों को वापस बुला लिया था। 1990 के दशक के आखिर में इजरायल-सीरियाई वार्ता मुख्य रूप से बस्ती मुद्दे को लेकर  लड़खड़ा गई क्योंकि इज़राइल सीरिया की राजधानी को देखते हुए माउंट हरमन पर अपनी रणनीतिक रूप में महत्वपूर्ण संपत्ति छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ।

अधिकांश इजरायली राजनीतिक दलों ने कब्जे वाले क्षेत्रों में बस्तियों के विस्तार में योगदान दिया है। वर्षों का समय बीतने के साथ, इन बस्तियों की आबादी इजरायल में दक्षिणपंथी दलों का मुख्य आधार बन गई है। यह बस्तियाँ इजरायल-फिलिस्तीनी वार्ता में एक बड़ी बाधा हैं। इसका मतलब है कि फिलिस्तीनी भूमि का अतिक्रमण और इजरायल के निवासियों के लिए स्कूलों, अस्पतालों, रोजगार के अवसरों, मॉल, और सबसे ऊपर, सुरक्षा व्यवस्था और बाईपास सड़कों का निर्माण। शुरूआत में, बस्तियों को फिलिस्तीनी आबादी केंद्रों से दूर बनाया गया था लेकिन धीरे-धीरे वो फलीस्तीनी शहरों और गांवों के करीब बसते चले गये।

फलिस्तीनी अपेक्षाओं के विपरीत, ओस्लो प्रक्रिया ने बसावट के क्रम को धीमा नहीं किया और व्हाइट हाउस लॉन में ऐतिहासिक हाथ मिलाने के बाद एक सदी की तिमाही के बाद भी बस्तियों में बसने वालों की आबादी बढती रही। जबकि इजरायल फिलिस्तीनी शहरों से बाहर निकला है पर  अधिक भूमि इजरायल के नियंत्रण में है। फिलिस्तीनी आबादी केंद्रों के करीब बस्तियों ने  फलीस्तीनी की क्षेत्रीयता को खंडित कर दिया है।

लंबे समय से, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इन बस्तियों को चौथी जिनेवा संधि का उल्लंघन मानता है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 2004 में अपने एक फैसले में इन बस्तियों को अवैध घोषित किया था।

बस्तियों को लेकर ट्रम्प प्रशासन की नीति उसके विवादास्पद फैसले की पृष्ठभूमि के खिलाफ है क्योंकि यह यरूशलम को इजरायल की राजधानी और गोलान हाइट्स को इजरायल के संप्रभु क्षेत्र के रूप में स्वीकार करती है। और वो प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन में हैं। इजरायल में अप्रैल और सितंबर में केसेट चुनाव के दो दौर के बाद भी, सरकार का गठन नही हो पाया है। भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद, नेतन्याहू अब यह तर्क दे रहे हैं कि वह केवल जॉर्डन घाटी को अपने अधिकार में करने के लिए अगली सरकार बनाना चाहते हैं।

ट्रम्प प्रशासन के निर्णय के कुछ दिनों के अंदर ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फलिस्तीनी को आत्मनिर्णय के अधिकार को दोहराते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। भारत के साथ इसके पक्ष में 165 देशों  ने मतदान किया जबकि इज़राइल को केवल अमेरिका, नाउरू, माइक्रोनेशिया और मार्शल द्वीप का समर्थन प्राप्त हुआ।

भारत एक स्वतंत्र और व्यवहारिक फलिस्तीनी देश का मज़बूती से समर्थन करत है जो शांति और सुरक्षा के श्रेत्र में इज़राइल के साथ सह-अस्तित्व रखता है। बस्तियों पर राष्ट्रपति ट्रम्प के नए कदम ने फलिस्तीनी राज्य की व्यवहारिकता को और कम कर दिया है और इससे तनाव बढ सकता है

आलेख:- प्रो. पी. आर. कुमारस्वामी, पश्चिम एशियाई अध्ययन केंद्र, जेएनयू

अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक