05.12.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर अपने संपादकीय लेख लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल के नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी देने का समाचार आज से सभी समाचार पत्रों की पहली खबर है। दैनिक जागरण की सुर्खी है-कैबिनेट का फैसला : पाक, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रावधान।
आम आदमी की निजता के लिए डेटा संरक्षण विधेयक को भी कैबिनेट की मंजूरी को दैनिक भास्कर ने प्रमुखता दी है।
आईएनएक्स मीडिया धन शोधन मामले में पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम को उच्चतम न्यायालय से जमानत मिलने को भी अखबारों ने प्रमुखता दी है। राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है- चिदंबरम को मिली जमानत, 106 दिन बाद जेल से रिहा।
दिल्ली में अनधिकृत कालोनियों को मान्यता देने संबंधी विधेयक को संसद की मंजूरी को हरिभूमि ने बॉक्स में दिया है। कच्ची कॉलोनियों को पक्की करने पर संसद राजी, राज्यसभा में भी बिल पास।
आदत से लाचार, इस शीर्षक से दैनिक जनसत्ता का लिखना है कि जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में मंगलवार को पाकिस्तानी सैनिकों ने जिस तरह अंधाधुंध गोलीबारी की, उससे स्पष्ट है कि वह इस समूचे इलाके में शांति और सद्भाव नहीं चाहता और लगातार भारत को उकसाने की कोशिश करता है। बिना किसी वजह के की गई इस गोलीबारी में दो भारतीय नागरिकों की जान चली गई, जबकि सात लोग बुरी तरह घायल हो गए। सवाल है कि क्या पाकिस्तान इस बात का जवाब दे सकता है कि ताजा गोलीबारी की वजह क्या थी और जो आम नागरिक उसमें मारे गए या घायल हुए, उनसे उसकी क्या दुश्मनी थी! इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने राजौरी जिले के नौशेरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पार से भारत में घुसपैठ कर रहे खतरनाक हथियारों सहित एक युवक को भी गिरफ्तार किया।
हालांकि पाकिस्तान की ओर से ऐसी कार्रवाइयां कोई नई नहीं हैं। बल्कि ऐसे भी मौके आते रहे हैं जब दोनों देशों के बीच शांति और सद्भाव बहाल करने की कोशिशें परवान चढ़ने लगती हैं, तब उसकी ओर से युद्धविराम का उल्लंघन करते हुए गोलीबारी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। इसके बाद स्वाभाविक रूप से शांति प्रक्रिया प्रभावित होती है और फिर कूटनीतिक संबंध भी पटरी से उतरते हैं। यह दोनों ही देशों के हित में है, क्योंकि जब तक कूटनीतिक और राजनीतिक माहौल सहज नहीं रहेगा, विकास जैसे सवाल हाशिये पर रहेंगे।
दरअसल, हाल में जब कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लेकर भारत ने बड़ा फैसला किया, तभी से पाकिस्तान के भीतर एक विचित्र छटपटाहट देखी जा रही है और गाहे-बगाहे वह खुद पर से नियंत्रण खोता हुआ लगता है। प्रमाण है कि इस साल अक्तूबर तक पाकिस्तान ने दो हजार तीन सौ सत्रह बार युद्धविराम का उल्लंघन किया।
आखिर उसकी ओर से ऐसी हरकतें क्यों सामने आती हैं कि भारत को इस समूचे मामले में सख्त रवैया अख्तियार करना पड़ता है। सही है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सहज नहीं हैं और दोनों ही ओर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तनाव और दबाव काम करता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय कायदों को ताक पर रख कर एक-दूसरे की संप्रभुता और गरिमा का खयाल न रखा जाए। पाकिस्तान कहने को तो भारत से जुड़े अमूमन हर मुद्दे पर दुनिया के देशों के सामने अपना रोना रोता है, लेकिन सच यह है कि अपनी सीमा में पाकिस्तान खुद ऐसी जटिलताओं में उलझा हुआ दिखता है, जो उसके लिए घातक साबित हो सकती हैं।
मुक़दमों की वापसी नाम से दैनिक हिंदुस्तान का अपने संपादकीय लेख में लिखना है कि वह इतिहास की किसी कंदरा में सोया हुआ एक मुद्दा था। 1818 में महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा में हुई एक छोटी सी जंग को लोग लगभग भूल चुके थे। फिर अचानक किसी ने याद दिलाया, तो कोरेगांव भीमा की उस भूली-बिसरी लड़ाई ने वर्तमान राजनीति में अपने लिए प्रासंगिकता खोजनी शुरू कर दी। वह जंग जितनी नहीं चली थी, अब कोरेगांव भीमा को लेकर चल रही राजनीति उससे कहीं लंबी हो चुकी है, और अब भी जारी है।
दो सौ साल पहले इस जगह ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक दलित फौज की मदद से अगड़ी जाति के एक राजा के खिलाफ लड़ाई जीती थी। बाद में अंग्रेजों ने वहां विजेता फौज के सम्मान में एक स्मारक भी बनाया। दो सौ साल बाद कुछ लोगों ने उस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाने का आयोजन किया, तो तनाव भी पैदा हुआ और हिंसा भी हुई। इस हिंसा में एक की मौत हो गई और तीन सौ से ज्यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद कई दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और देशद्रोह जैसे मामले बनाए गए, जो अभी तक चल रहे हैं। इन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया और कई गंभीर तरह के आरोप भी चर्चा में आए। बहुत से लोग तो रिहा हो गए, लेकिन कुछ अभी भी जेल में हैं।
लगभग डेढ़ साल पुराना यह मामला महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता धनंजय पंडितराव मुंडे ने एक पत्र लिखकर नए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मांग की है कि कोरेगांव भीमा मामले में लोगों के खिलाफ जो मुकदमे दर्ज किए गए थे, वे फर्जी हैं और उन्हें वापस लिया जाए। मुख्यमंत्री ने इसका आश्वासन भी दे दिया है। लेकिन उनके इस आश्वासन के बाद विरोधियों ने अपना मोर्चा खोल लिया है और वे कह रहे हैं कि नई सरकार मुकदमे वापस लेकर देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर रही है। जब ये मुकदमे दायर किए गए थे, तब अब सरकार का नेतृत्व कर रही शिव सेना उस समय की गठबंधन सरकार में भी भागीदार थी।
पिछले साल वहां जो हुआ, उसने एक पुराने वैमनस्य को फिर से जिंदा कर दिया था, फिर मुकदमों ने उन पूर्वाग्रहों को और भड़का दिया। अच्छा तरीका तो यही था कि सबक सिखाने की कोशिशों की बजाय मामले को तभी ठंडा करने की कोशिश की जाती।