06.12.2019

आज के समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय टिप्पणियाँ की हैं, जबकि समाचार पत्रों की सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं |

यू.पी. के उन्नाव में सामुहिक दुष्कर्म पीड़िता को जलाने की घटना आज के सभी समाचार पत्रों की पहली ख़बर है। राष्‍ट्रीय सहारा की सुर्खी है हैदराबाद के बाद अब उन्नाव में हैवानियत। अमर उजाला के शब्द हैं फिर उन्नाव…छह दिन पहले ज़मानत पर छूटे दुष्कर्म के आरोपियों ने पीडि़ता को जलाया। पंजाब केसरी के अनुसार गंभीर हालत में दिल्ली लाया गया। रिज़र्व बैंक के चालू वित्त वर्ष के लिए देश की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान कम करने को भी सभी अख़बारों ने प्रमुखता से दिया है। प्याज़ की बढ़ती क़ीमतों पर सरकार को घेरने के विपक्ष के प्रयास को भी समाचार पत्रों ने अहमियत दी है। डीटीसी बसों में लगेंगा जीपीएस, सीसीटीवी कैमरा और पैनिक बटन, इसे अमरउजाला ने बॉक्स में देते हुए लिखा है कैबिनेट ने दी परिवहन विभाग के प्रस्ताव को मंज़ूरी ।

हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स “सरकार पर दारोमदार” शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखता है कि रिज़र्व बैंक ने साल की आख़िरी द्विमासिक मौद्रिक नीति में ब्याज दरें घटाने से तो मना कर ही दिया, इस वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ का अनुमान भी 6.1 फ़ीसदी से घटाकर 5 फ़ीसदी पर ला दिया। इससे पहले रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने लगातार पांच बार रीपो रेट में कटौती की थी। रीपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज़ देता है। जीडीपी ग्रोथ के ताज़ा आंकड़े बता रहे थे कि जुलाई-सितंबर तिमाही में यह 4.5 फ़ीसदी पर खिसक आई है, जो पिछले छह साल का सबसे निचला स्तर है। इसलिए उम्मीद जताई जा रही थी कि रिज़र्व बैंक रीपो रेट में थोड़ी और कमी लाकर आर्थिक गतिविधियां तेज़ करने में सरकार का हाथ बंटा सकता है। लेकिन एक तो पिछली पांच कटौतियां आर्थिक विकास के मोर्चे पर कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं दे सकीं, दूसरे, लगातार कटौतियों के बाद अब रिज़र्व बैंक के पास पीछे जाने की गुंजाइश भी नहीं रह गई थी। खुदरा महंगाई दर का अनुमान उसने 4.7 से 5.1 प्रतिशत के बीच रखा है। ऐसे में रीपो रेट को मौजूदा 5.15 प्रतिशत से नीचे लाना नकारात्मक ब्याज दरों के ख़तरनाक दायरे में प्रवेश करने जैसा था। हालांकि आगे महंगाई नीचे जाने की स्थिति में आरबीआई ने अपने विकल्प खुले रखे हैं। केंद्रीय बैंक ने उम्मीद जताई है कि सरकार द्वारा पहले ही उठाए जा चुके कुछ क़दमों के चलते अगली तिमाही में बेहतर नतीजे देखे जा सकते हैं, लेकिन उसके वक्तव्य में आए ब्यौरे अर्थव्यवस्था की नाज़ुक स्थिति की ओर ही इशारा करते हैं। ग्रोथ रेट बेशक, इससे पहले भी पांच फ़ीसदी से नीचे गई है। इस लिहाज़ से मौजूदा स्थितियों को अभूतपूर्व नहीं कहा जा सकता। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था आज कुछ उसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है जो 21वीं सदी के इन दो दशकों में सबसे कठिन मानी जाती रही हैं।

हिन्दी दैनिक हिंदुस्तान “अब बस” शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखता है कि अभी चंद रोज़ पहले ही जब हैदराबाद की एक बेटी से न सिर्फ़ दुष्कर्म किया गया, बल्कि उसके बाद पूरी पाशविकता दिखाते हुए उसे जला भी दिया गया था, तो समाज की मानसिकता, पुलिस और क़ानूनों के बारे में बहुत कुछ कहा गया था | तरह-तरह के बयान और संकल्प भी सुनाई पड़े थे | लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही जिस तरह से उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक बलात्कार पीड़िता को जला दिया गया, वह बताता है कि वास्तव में हो-हल्ले से आगे हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं | कम से कम ऐसा कुछ तो नहीं हो रहा, जिससे दुष्कर्मियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा करने वालों के मन में कोई डर पैदा हो | हैदराबाद की घटना में हम पीड़िता को समय रहते नहीं बचा सके थे, उनसे आगे जाकर उन्नाव की घटना ने कुछ दूसरे सवाल उठाए हैं | हैदराबाद की घटना में हम पीड़िता को समय रहते नहीं बचा सके थे, जबकि उन्नाव की पीड़िता बलात्कारियों के चंगुल से मुक्त होने में क़ामयाब रही थी और पाँच में से तीन दुष्कर्मी पकड़े भी गए थे | लेकिन वे ज़मानत लेकर बाहर आ गए और फिर उन्होंने पीड़िता को पकड़कर सरेआम आग के हवाले कर दिया | इस घटना ने यह बताया है कि दुष्कर्म पीड़िता की मदद के लिए सख़्त क़ानून बनाने और तमाम प्रावधान करने की बातें भले ही कितनी की जाएँ, अभी भी हम न तो उन्हें पूर्ण सुरक्षा देने की हालत में हैं और न ही अपराधियों को उन्हें आगे और नुकसान पहुंचाने से रोकने की स्थिति में हैं |