13.12.2019

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों ने विभिन्न विषयों पर संपादकीय लेख लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।
नागरिकता संशोधन विधेयक पास होने पर शरणार्थियों की खुशी लगभग सभी अखबारों ने प्रकाशित की है। पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों की बस्ती में उत्सव के माहौल पर हिन्दुस्तान लिखता है – पाक में जान का डर, यहां जीने के लिए जद्दोजहद। दैनिक जागरण के शब्द हैं – खास लोगों से बधाई मिली तो खुशी हुई दोगुनी। पंजाब केसरी लिखता है – पाकिस्तान से दिल्ली आए हिंदू शरणार्थियों ने कहा – अब हम भी है हिंदुस्तानी।
राम मंदिर निर्माण की एक और कानूनी बाधा पार होने पर सभी अखबारों ने पहले पन्ने पर खबर दी है। अमर उजाला लिखता है – अयोध्या फैसले पर पुनर्विचार नहीं, सभी 19 याचिकाएं खारिज।
राजधानी दिल्ली में कल रात हुई बारिश की खबर भी अखबारों ने सचित्र प्रकाशित की है। नवभारत टाइम्स के अनुसार – दिन भर बादल, रात भर बारिश, बढ़ेगी ठिठुरन।
मैड्रिड में चल रहे कॉप-25 सम्मेलन में मणिपुर की आठ साल की लिसिप्रिया की धरती बचाने को लेकर की गई अपील लगभग सभी अखबारों ने प्रकाशित की है। जलवायु परिवर्तन से लड़ रही आठ साल की भारतीय योद्धा हिंदुस्तान की सुर्खी है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट शीर्षक से जनसत्ता  लिखता है – एशिया प्रशांत में लगभग पचास करोड़ लोग अब भी कुपोषण के शिकार। 2030 तक भुखमरी मिटाने का है लक्ष्य।
‘आशंकाएं और टकराव’ इस शीर्षक से दैनिक हिंदुस्तान का अपने संपादकीय में लिखना है कि यह लगभग तय था कि भारत जैसे विशाल देश में नागरिकता संशोधन विधेयक अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग विमर्श को जन्म दे सकता है। खासकर, पूर्वोत्तर भारत की सामाजिक जटिलताएं जिस तरह की हैं, वहां इससे कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। देश की नागरिकता और उसकी सीमाओं को फिर से परिभाषित करने वाले इस विधेयक के बारे में यह भी कहा जा रहा था कि वह एक तरह से असम के सिटीजन रजिस्टर का ही राष्ट्रीय विस्तार है। एक विचार यह भी था कि असम का सिटीजन रजिस्टर प्रकाशित होने के बाद से जो समस्याएं सामने आई हैं, यह विधेयक उनका भी कुछ हद तक समाधान देगा। इन सारी जटिलताओं के बारे में केंद्र और इन राज्यों की सरकारों ने भी सोचा ही होगा। आशंकाओं के बावजूद इस तरह की चीजों को रोकने के लिए जो प्रशासनिक तैयारियां होनी चाहिए थीं, वे नहीं हुईं, जबकि विरोध करने वाले अपनी पूरी तैयारी में थे और इसके पहले कि विधेयक राज्यसभा के पटल पर रखा गया, सड़कों पर विरोध और प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया।
पूर्वोत्तर भारत में मामला जटिल इसलिए भी है कि एक तो वहां के समाजों में अपनी अलग जातीय पहचान को लेकर संवेदनशीलता कुछ ज्यादा ही है। दूसरे, यह देश का वह इलाका है, जहां पड़ोसी बांग्लादेश से घुसपैठ कुछ ज्यादा ही हुई है। इनर लाइन परमिट के तहत आने वाले इलाके इसके असर से भले ही कुछ हद तक बचे हों, लेकिन बाकी जगहों पर जनसंख्या का स्वरूप पिछले कुछ दशकों में काफी तेजी से बदला है। ऐसा भी कहा जाता है कि कुछ जगहों पर जनजातियों के लोग भाषाई अल्पसंख्यकों में बदल रहे हैं। इन स्थितियों में रहने वाले नागरिकता को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं, इसलिए नागरिकता संशोधन विधेयक वहां जनमानस को काफी खदबदा रहा है। वैसे यह उग्र आंदोलन इस विधेयक के लोकसभा में पास होने के बाद शुरू हुआ है, इसलिए यह पूरे देश की तात्कालिक परेशानी का कारण बन गया है, लेकिन यह भी सच है कि पूर्वोत्तर भारत में ऐसे आंदोलनों का एक इतिहास रहा है।
खासकर, विदेशी नागरिकों को निकाले जाने को लेकर लंबा आंदोलन चलाने वाले असम को इस विधेयक ने कुछ ज्यादा ही परेशान किया है। एक कारण वह असम समझौता भी है, जिसके आधार पर नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया है। वहां लोगों को लगता है कि इस समझौते ने उन्हें जो दिया था, नया विधेयक उसे कुछ हद तक छीन रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि वहां के लोगों के अधिकार इस विधेयक के चलते किसी भी तरह से नहीं छिनेंगे।
‘चिंता की दर’ नामक संपादकीय लेख में जनसत्ता का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार कमजोर होते जाने को लेकर चर्चा बहुत पहले से शुरू हो गई थी। जब चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर घट कर साढ़े चार फीसद पर आ गई, तब सरकार के माथे पर चिंता की लकीर कुछ गाढ़ी हुई। फिर भी वित्तमंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था की विकास दर कुछ सुस्त जरूर है, पर इसे मंदी कहना उचित नहीं। जल्दी ही विकास दर का रुख ऊपर की ओर मुड़ जाएगा। दूसरी तिमाही के नतीजों को देखते हुए भारतीय रिजर्व ने इस वर्ष की विकास दर पांच फीसद के आसपास रहने का अनुमान जताया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी भारत की विकास दर छह फीसद के आसपास रहने का अनुमान लगाया है। अब एशियाई बैंक ने भारत में वृद्धि दर 5.1 फीसद रहने का अनुमान लगाया है। यानी भारत के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। एशियाई विकास बैंक ने यह भी बताया है कि रोजगार सृजन की दर घटी है और फसलों के खराब होने और कर्ज की कमी के कारण खेती और ग्रामीण क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा है। रोजगार की कमी की वजह से उपभोग की दर भी घटी है, जिसके चलते औद्योगिक विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
जब छोटे कारोबार बंद होते हैं, तो रोजगार के बहुत सारे अवसर भी बंद हो जाते हैं। फिर बैंकों की बहुत बड़ी रकम बट्टे खाते में चली जाने और कर्ज वसूली न हो पाने के कारण भी न सिर्फ उनके, बल्कि दूसरे अन्य क्षेत्रों के कारोबार पर भी बुरा असर पड़ा। भवन निर्माण के क्षेत्र में कुछ तो नियमों की सख्ती की वजह से सुस्ती आई और कुछ लोगों की आय घटने या रोजगार जाते रहने से घट गई।
इन तमाम स्थितियों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त होती गई। अर्थव्यवस्था के खराब रहने का बड़ा असर निवेश पर पड़ता है। फिर जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए विश्वबैंक आदि से जो कर्ज लिए गए होते हैं, उनके ब्याज चुकाने भारी पड़ने लगते हैं। यही वजह है कि सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौतियां कई हैं। जब तक रोजगार नहीं बढ़ेगा, तब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी और जब तक अर्थव्यवस्था कमजोर रहेगी, तब तक रोजगार के मोर्चे पर सुस्ती से पार पाना मुश्किल बना रहेगा।