भारत-अमरीका की दूसरी 2+2 मुलाकात

भारत और अमरीका के रक्षा और विदेश मंत्रियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों की दो जमा दो बैठक इस सप्ताह वाशिंगटन, डी सी में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।

इस वार्तालाप के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद का सामना, अफ़्गानिस्तान स्थिरता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांतिपूर्ण और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में काम करने आदि के बारे में विचार साझे करना मुख्य विषय-वस्तु रही। इस बैठक का सबसे अहम परिणाम रहा औद्योगिक सुरक्षा सहयोग के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किया जाना। इस समझौते की वजह से अब रक्षा शोध और विकास में द्वीपक्षीय सहयोग की प्रक्रिया सुगमता से आगे बढ़ सकेगी।

पिछले साल नई दिल्ली में सितम्बर में दो जमा दो संवाद के पहले चक्र में सम्पर्क अनुकूलता और सुरक्षा समझौता किया जाना महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। दोनों देशों की सैन्य ताक़तों की परस्पर संचालनता बढ़ाने के लिए ये समझौता ज़रूरी था। इस प्रकार दो जमा दो के दूसरे चक्र ने दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा संबंध और गहरे किए हैं।

भारत और अमरीका के बीच इस गतिविधि की सफलता को लेकर कई संशय व्याप्त थे। वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा में सामंजस्य बनाए रखते हुए दोनों देशों के सैन्यकरण को ध्यान में रखते हुए सामरिक साझेदारी मज़बूत करना अहम लक्ष्य था।

अमरीका के प्रतिनिधि सदन में महाभियोग के चलते राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अपने प्रशासन में बड़ी चुनौति का सामना कर रहे थे। भारत अपने प्रमुख और नए विधायी उपाय लागू करने वाला है। भारत और अमरीका शुल्क और प्राथमिकता की सामान्य व्यवस्था, जीएसपी के मुद्दे पर व्यापार वार्ता में आपसी मतभेद भी दूर करने वाले हैं। भारत ने वाशिंगटन के दबाव के बावजूद रूस के साथ रक्षा समझौते में आगे बढ़ने का फैसला किया। दूसरी ओर ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के लिए प्रतिबंध नीति अपनाई जो भारत के द्वारा स्वीकार नहीं की जा सकती।

भारतीय कंपनियॉ अमरीका द्वारा जीएसपी व्यवस्था समाप्त किए जाने की वजह से नाखुश थी क्योंकि इस वजह से अरबों डॉलर का व्यवसाय प्रभावित हुआ। कुछ अमरीकी सांसदों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे और नागरिकता संशोधन विधेयक पर की गई टिप्पणियों की वजह से भी भारत में नाराज़गी थी। लेकिन अमरीका के विदेश विभाग और पेंटागन तथा भारतीय पक्ष के लिए इन चुनौतियों का सामना करके आगे बढ़ना रूकावट नहीं बना और दोनों पक्षों ने पिछले दो दशकों की कड़ी मेहनत से बनाई गई सामरिक साझेदारी को और मज़बूत किया।

दोनों राजधानियों में कई बार नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद ये सम्पन्न साझेदारी बताती है कि भारत रक्षा क्षेत्र में अमरीका का महत्वपूर्ण साझेदार बन चुका है। भारत में लगभग 2000 अमरीकी कंपनियॉ काम कर रही हैं और लगभग दो सौ भारतीय कंपनियों ने अमरीका में अरबों डॉलर्स का निवेश किया है। दो लाख से ज्य़ादा भारतीय छात्र अमरीका में पढ़ रहे हैं और अमरीकी अर्थव्यवस्था में सात अरब डॉलर सालाना के लगभग योगदान करते हैं।

भारत और अमरीका आतंकरोध, चीन की बैल्ट एंड रोड परियोजना का विरोध, दक्षिण चीन सागर विवादों का शांतिपूर्ण निपटान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री व्यवस्था बनाए रखने को लेकर एक जैसी विचारधारा रखते हैं।

कुछ अमरीकी नेताओं ने ऐसे मुद्दे उठाए हैं जो भारत की घरेलू राजनीति से जुड़े हैं। अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने इस बात की सराहना की कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर मुद्दे पर खुलकर बहस होती है और उन्होंने ये भी माना कि भारतीय लोकतंत्र का सम्मान होना चाहिए।

लेकिन अभी भी कुछ संशय है कि सुरक्षा, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर आपसी मतभेद को पीछे छोड़कर क्या भारत और अमरीका की मज़बूत साझेदारी इसी तरह आगे बढ़ती रहेगी।

भारत एक शक्तिशाली लोकतंत्र और परमाणु क्षमता के साथ 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है ऐसे में अमरीका, भारत को सामरिक साझेदार के रूप में देखता रहेगा। भारत के राजनीतिक धड़े में भी ये साफ़ अहसास मौजूद है कि अमरीका के साथ चलने पर वैश्विक मुद्दों में भारत की भूमिका बेहतर होगी।

इन हालातों में वाशिंगटन में सम्पन्न दो जमा दो वार्ता का दूसरा चक्र सही दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

आलेख – प्रो0 चिंतामणि महायात्रा, अमरीकी अध्ययन केन्द्र, जेएनयू

अनुवादक – नीलम मलकानिया