01.01.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों में अलग अलग विषयों पर संपादकीय लिखे गए हैं। साथ ही अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।
पाकिस्तान आतंकी अड्डे बंद करे वरना हमारे पास कार्रवाई का अधिकार- सेना अध्यक्ष का पदभार संभालते ही जनरल मनोज मुकुंदनरवणे का दोटूक बयान राष्ट्रीय सहारा और नवभारत टाइम्स सहित अधिकांशअखबारों में प्रमुखता से है।

आर्थिक सुस्ती दूर करने की कवायद मेंवित्तमंत्री निर्मला सीतारामन के बड़े ऐलान पर दैनिक जागरण ने लिखा है- बुनियादीढांचागत क्षेत्र को 102 लाख करोड़ का तोहफा। नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन का ढांचातैयार।

बढ़ा रेल किराया आज से लागू जनसत्ताने लिखा है- यात्री रेलगाडि़यों के किराए में एक से चार पैसे प्रति किलोमीटर कीबढ़ोतरी। अमर उजाला ने बताया है कि रिजर्वेशन और सुपरफास्ट चार्ज में कोई बदलावनहीं। पहले से बुक हो चुके टिकट पर अतिरिक्त चार्ज नहीं।

दैनिक भास्कर की खास खबर है- दिल्ली से आगरा-जयपुर के बीच नए साल मेंदौड़ेंगे इलेक्ट्रिक वाहन। देश के पहले दो एंटीथेफ्ट की हाईवे में सौ इलेक्ट्रिक बसेंऔर दो हजार टैक्सी चलेंगी।

भारत समेत पूरी दुनिया में नववर्ष केउल्‍लास की खबरें देशबंधु सहित सभी अखबारों में सचित्र हैं। राजस्थान पत्रिकाकी सुर्खी है- तारीख बदली मौसम नहीं, कंपकंपी बरकरार, टस से मस नहीं हुई सर्दी।

‘नया साल, पुराने संकल्प’, इस शीर्षक से दैनिक हिंदुस्तान का अपने संपादकीय में कहना है कि समय का प्रवाह अनवरत है। दिन, सप्ताह, महीना या साल कोई हो, वह इन सबकी परवाह किए बिना अपनी गति से बहता-बढ़ता रहता है। वह न हमारी नाकामियों की चिंता करता है और न हमारी उपलब्धियों की। कंप्यूटर की दुनिया में एक चर्चित शब्द है रीबूट करना। एक क्षण के लिए कंप्यूटर को बंद कीजिए और फिर से चला दीजिए। बस इतने से कंप्यूटर अपनी पुरानी सुस्ती और बाधा बने पुराने कबाड़ को उतार फेंकता है और फिर नवजीवन के साथ सक्रिय हो जाता है। नया साल भी हमारे लिए अपने जीवन को रीबूट करने का मौका होता है। अगर हम तय कर लें, तो यह ऐसा मौका हो सकता है, जिसमें हम पुरानी बलाओं से पीछा छुड़ाकर नए संकल्पों से जुड़ सकते हैं, नई मंजिलों की ओर बढ़ना शुरू कर सकते हैं।
साल 2020 हमारे लिए इसी कारण से महत्वपूर्ण है कि इस समय हमारे पास पिंड छुड़ाने के लिए बलाएं भी बहुत सारी हैं और ऐसी मंजिलें भी बहुत सी हैं, जहां जाने का कोई विकल्प फिलहाल हमारे पास नहीं है, लेकिन उन राहों पर हमारे अभी कदम भी ठीक से नहीं बढ़े हैं।

नया साल उस समय आया है, जब देश के एक बड़े हिस्से में सर्दी अपने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रही है और दूसरी तरफ कई तरह के असंतोष न सिर्फ सतह पर आ रहे हैं, बल्कि उग्र होते हुए दिख रहे हैं। आगे बढ़ते हुए इस देश के ऐसे अंतर्विरोध बहुत सारे हैं, नए साल में हम ऐसे अंतर्विरोधों को शांति और सहानुभूति से अंतिम विदाई देने का संकल्प ले सकते हैं।
बेशक यह बहुत आसान नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ साल में ऐसी ताकतें काफी प्रबल हुई हैं, जो ऐसे दैहिक, दैविक और भौतिक ताप को न सिर्फ बढ़ाने में यकीन रखती हैं, बल्कि इन्हीं पर वे अपनी रोटी भी सेंकती हैं।
अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई पर ले जाने के संकल्प, बेरोजगारी को खत्म करने के संकल्प, देश को विकसित राष्ट्र और विश्व शक्ति बनाने के संकल्प, ये सभी ऐसे संकल्प हैं, जो हमारे पास एक-दो साल से नहीं, बल्कि कई दशकों से हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की नई चुनौतियों के बीच ये समस्याएं भी लगातार जटिल होती जा रही हैं। अच्छा होगा कि हम साल 2020 में उन अधूरे संकल्पों को पूरा करने में जान लगा दें। यह भी अपने आप में एक नई शुरुआत ही होगी।

‘कुप्रबंधन का हासिल’ नाम से अपने संपादकीय में जनसत्ता का लिखना है कि भारत में विमानन कंपनियों का जिस तरह से भट्ठा बैठता जा रहा है, वह चिंता का विषय है। हालात बता रहे हैं कि अगर सरकार ने विमानन क्षेत्र के लिए जल्द ही सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो देश का विमानन उद्योग चौपट हो जाएगा। इस वक्त देश की सबसे बड़ी सरकारी विमानन कंपनी एअर इंडिया जिस दयनीय हालत से गुजर रही है, उससे तो लग रहा है कि भारत में विमानन कंपनियों का भविष्य अंधकारमय है। ताजा खबर यह है कि एअर इंडिया को जल्द ही कोई खरीदार नहीं मिला तो छह महीने के भीतर कंपनी बंद हो जाएगी। कंपनी पर इस वक्त साठ हजार करोड़ रुपए का कर्ज है और सरकार कोइससे निपटने का एकमात्र रास्ता इसके विनिवेश का दिख रहा है।

सिर्फ एअर इंडिया ही नहीं, दूसरी विमान कंपनियों ने भी पिछले कुछ सालों में जिस तरह से दम तोड़ा है, उससे यह तो साफ हो गया है कि इस क्षेत्र में कारोबार की प्रबल संभावनाओं के बाद भी भारत अभी तक विमानन क्षेत्र को संभालने और सुचारू रूप से चलाने के लायक नहीं बन पाया है।
एअर इंडिया के विनिवेश की चर्चा लंबे समय से चल रही है। लेकिन मामला सिर इसलिए नहीं चढ़ पा रहा, क्योंकि एक तो सरकार चौबीस फीसद शेयर और अधिकार अपने पास रखना चाहती है और दूसरी बड़ी समस्या यह है कि कंपनी पर इतना ज्यादा कर्ज है कि कोई भी इसे खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। लगातार कर्ज बढ़ने से यह संकट और गहराता जा रहा है। विनिवेश की चर्चाओं के बाद कंपनी में नियुक्तियां, पदोन्नति जैसे काम रोक दिए गए और पंद्रह जुलाई तक के खाते भी बंद कर दिए गए थे, ताकि बोली लगाने के लिए इन्हीं खातों को आधार बनाया जा सके। कंपनी में इस वक्त दस हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं।

कंपनी की माली हालत खराब होने की वजह कुप्रबंधन तो है ही, उससे भी बड़ा कारण यह है कि सरकार पर इसका लंबे समय से ग्यारह सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा का बकाया है। इसमें पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया तो सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय पर ही है। अतिविशिष्ट लोगों की चार्टर उड़ानों की इस बकाया रकम ने भी एअर इंडिया को खोखला करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

कभी देश की नबंर-एक कंपनी होने का दावा करने वाली जेट एअरवेज भी ऐसे ही खत्म हुई। यह विमानन कंपनियों के लिए खतरे की घंटी थी। लेकिन तब हमने कोई सबक नहीं सीखा और कोई ऐसे नीतिगत कदम नहीं उठाए जो और कंपनियों को इस हालत में पहुंचने से रोकते। माना जा रहा था कि जितनी ज्यादा कंपनियां बाजार में होंगी, उतनी ही प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और विमानन क्षेत्र मजबूत बनेगा। लेकिन होता उल्टा गया। कंपनियां भारी घाटे में जाती रहीं, प्रबंधन खतरे को भांप नहीं पाए। किंगफिशर, जेट जैसी कंपनियों पर बैंकों का भारी कर्ज चढ़ता गया। अब एअर इंडिया भी उसी रास्ते पर है।