14.01.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचारपत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। नागरिकता संशोधन कानून-सीएए पर कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों की बैठक में कुछ पार्टियों के शामिल न होने को आज के अधिकांश समाचार पत्रों ने मुख पृष्‍ठ पर दिया है। दैनिक जागरण की सुर्खी है- सीएए पर विपक्ष का कुनबा बिखरा। राजस्‍थान पत्रिका के शब्‍द हैं- विपक्षी एकता पर भारी पड़ी क्षेत्रीय सियासत। सपा, बसपा, आप, डीएमके, टीएमसी, शिवसेना नदारद।

कश्‍मीर के कुलगाम में आतंकियों के साथ पकड़े गए डीएसपी देविंदर सिंह को गिरफ्तारी को भी अखबारों ने अहमियत दी है। नवभारत टाइम्‍स की सुर्खी है- आतंकियों संग अरेस्‍ट डीएसपी सस्‍पेंड, राष्‍ट्रपति पदक छीनने पर विचार।

खुदरा मंहगाई दर बढ़ने को भी अधिकतर समाचार पत्रों ने प्रमुखता दी है। हिन्‍दुस्‍तान की सुर्खी है – महंगाई दर साढ़े पांच साल में सबसे ज्‍यादा।

गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत अब राष्‍ट्रीय युद्ध स्‍मारक से- राष्‍ट्रीय सहारा में है। पिछले 56 सालों से गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत अमर जवान ज्‍योति पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने का सिलसिला इस बार से थम जाएगा।

दैनिक जागरण ‘बिखरा विपक्ष’ शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक से बसपा, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और आम आदमी पार्टी ने जिस तरह किनारा किया उससे यही पता चलता है कि ये दल कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं। हैरानी है कि ऐसे ही संकेत इस बैठक से बाहर रहकर उस शिवसेना ने भी दिए जो महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ सत्ता में है। विपक्ष के इस बिखराव से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के बहाने केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की जा रही है। क्या यह विचित्र नहीं कि जो ममता बनर्जी इस कानून का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरने में संकोच नहीं कर रही हैैं उन्होंने अपने किसी सांसद को भी विपक्षी दलों की इस बैठक में भेजना जरूरी नहीं समझा? विपक्षी दलों ने अपनी बैठक के बाद इस आशय का प्रस्ताव पारित किया कि नागरिकता संशोधन कानून को तुरंत वापस लिया जाए और जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर तैयार करने की पहल बंद की जाए। यह प्रस्ताव अपने आप यह बता देता है कि इस कानून के विरोध के बहाने लोगों को भ्रमित और भयभीत करने की सस्ती राजनीति की जा रही है। यह अंध विरोध की अतार्किक राजनीति की पराकाष्ठा ही है कि जो विपक्षी दल नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैैं उनमें से अनेक ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा रखा है। आखिर वे अपनी ही याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा करने को क्यों नहीं तैयार? आखिर संविधान की दुहाई दे रहे विपक्षी दल यह साधारण सी बात समझने से क्यों इन्कार कर रहे हैं कि कानून न तो सड़कों पर बनते हैं और न ही वे सड़क पर खारिज होते हैं?

‘नई राह’ शीर्षक से हिन्दुस्तान अपने संपादकीय में लिखता है कि मामला संवेदनशील है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने नया रास्ता अपनाया है। डेढ़ साल पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दी थी, तब से यह मसला लगातार उलझता जा रहा है। पांच जजों की पीठ का यह फैसला कई तरह से महत्वपूर्ण था। एक तो इस फैसले ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा देते हुए एक पुरानी परंपरा को खत्म करने का रास्ता तैयार किया था, दूसरे ऐसे ही अन्य धर्मस्थलों में प्रवेश की लड़ाई लड़ रही महिलाओं को एक उम्मीद दी थी। लेकिन पिछले डेढ़ साल में हमने यह भी देखा कि इस फैसले को सर्वस्वीकार्य बनाना और लागू करना कितना कठिन है। जो लोग इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे, उन्होंने अदालत में समीक्षा याचिका डाली। पिछले 14 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने इस मामले से जुड़े मुद्दों को ज्यादा बड़ी पीठ के हवाले करने को कहा। साथ ही यह भी आग्रह किया कि इसके साथ ही मस्जिदों, दरगाहों या अन्य धर्म-स्थलों में महिलाओं के प्रवेश के मसलों को भी जोड़ा जाए। आमतौर पर पांच सदस्यीय पीठ का फैसला समीक्षा के लिए सात सदस्यीय पीठ के हवाले किया जाता है, लेकिन इस मामले के व्यापक महत्व को देखते हुए प्रधान न्यायाधीश शरद अरविंद बोवडे ने नौ सदस्यीय पीठ के हवाले करने का निर्णय किया। ऐसे मामलों में कुछ एक फैसले परस्पर विरोधी हो सकते हैं, पर अदालत ने आमतौर पर नागरिकों के समता के अधिकार का ही साथ दिया है। समता की यह लड़ाई वैसे तो संविधान बनने से पहले देश के स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही चल रही है। हरिजनों का मंदिर प्रवेश ऐसी ही कोशिशों का एक नतीजा था, जिसने बहुत कुछ बदला भी। हालांकि सब कुछ अभी भी नहीं बदला है। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट को अब जो फैसला करना है, उसमें उसे सैद्धांतिक मसलों का हल तो ढूंढ़ना है ही, इस सामाजिक यथार्थ से टकराना भी है।