17.01.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों में विविध विषयों पर संपादकीय लिखे गए हैं। अन्य प्रमुख समाचारों ने मुखपृष्ठ पर स्थान पाया है।

देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टॉफ जनरल बिपिन रावत के बयान को सभी अख़बारों ने सुर्खी बनाया है। दैनिक ट्रिब्‍यून ने सी.डी.एस. रावत के इन शब्‍दों को प्रकाशित किया है- आंतकवाद की जड़ पर वार करना होगा। हिन्‍दुस्‍तान लिखता है- राससीना संवाद में 9 / 11 हमले के बाद की गई सख्‍त कार्रवाई को मिसाल बताया।

संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने के फैसले को मिले समर्थन की खबर कई अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित की है। हरिभूमि के शब्‍द हैं- कश्‍मीर पर पाक ने फिर मुंह की खाई। चीन को छोड़ किसी ने नहीं दिया साथ।

पश्चिम विक्षोभ के प्रभाव के चलते पहाड़ों में बर्फबारी और दिल्‍ली एन.सी.आर. सहित कई इलाकों में बारिश व ओलावृष्टि की ख़बर सभी अखबारों में है।जनसत्‍ता, मौसम बेईमान शीर्षक से लिखता है- बारिश से बढ़ी ठिठुरन, फिलहाल राहत नहीं।

‘कश्मीर से संवाद’ शीर्षक से दैनिक हिंदुस्तान का अपने संपादकीय में लिखना है कि शायद इस काम को बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। पर अब जब केंद्र सरकार ने अपने 36 सबसे वरिष्ठ मंत्रियों को संपर्क और संवाद के लिए जम्मू-कश्मीर भेजने का फैसला किया है, तो यही कहा जा सकता है कि देर आयद, दुरुस्त आयद। पांच महीने पहले जब केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद से सच यही है कि सरकार और सुरक्षा बलों ने हालात को अच्छी तरह नियंत्रित किया। हालांकि उसी समय से जम्मू-कश्मीर से संवाद बनाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। इसकी एक शुरुआत तभी हो गई थी, जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल खुद वहां गए और लोगों से मिले।

लेकिन न जाने क्यों यह सिलसिला उसके बाद रुकता हुआ दिखाई दिया। हालांकि इस बीच विदेशी सांसदों व राजनयिकों को वहां ले जाने के कार्यक्रम केंद्र सरकार ने आयोजित किए, लेकिन सरकार सीधे वहां लोगों से संवाद बनाने की कोशिश करे, ऐसे आयोजन नहीं किए गए। लेकिन अब जब 36 वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को वहां भेजा जा रहा है, तो इससे यह तो स्पष्ट है कि सरकार इसे कितना महत्व दे रही है। ये मंत्री शनिवार को अपना दौरा शुरू करेंगे और एक सप्ताह तक वहां रहेंगे। इस दौरान वे जम्मू संभाग में 51 बैठकें करेंगे। 

मंत्रियों का कश्मीर जाना पूरे देश को एक उम्मीद बंधाता है कि यह सिलसिला सिर्फ कश्मीर में ही खत्म नहीं होगा। उम्मीद है कि सरकार नए नागरिकता कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बारे में समाज में लगातार बढ़ रही आशंकाओं को दूर करने का भी सक्रिय प्रयास करेगी। 
मंत्रियों का यह दौरा सरकार के इस दावे को पुख्ता करने का काम भी करेगा कि कश्मीर में हालात बिल्कुल सामान्य हैं। इसी के साथ मंत्रियों को भी जम्मू-कश्मीर के जमीनी हालात का सीधा अनुभव मिलेगा, जो कश्मीर नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि ब्रॉडबैंड और 2-जी सेवाओं की बहाली के बाद भी इस प्रदेश में बहुत कुछ किया जाना शेष है। हालात को पूरी तरह सामान्य बनाने में अभी शायद लंबा समय लगेगा। यह अभी भले न हो रहा हो, लेकिन वह दिन भी बहुत दूर नहीं है।

‘जनतंत्र जैसा कुछ’ नाम से अपने संपादकीय में नवभारत टाइम्स का कहना है कि रूस की चर्चा आमतौर पर वैश्विक कूटनीति के संदर्भ में ही होती है। वहां की आंतरिक राजनीति में क्या-कुछ घट रहा है, इसकी खबरें कम आती हैं। बहरहाल, हाल में वहां से आए एक समाचार ने सबको चौंका दिया। समाचार यह है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के देश में व्यापक संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव रखने के बाद प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव और उनकी पूरी कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया है। मेदवेदेव ने कहा कि राष्ट्रपति पूतिन के इन प्रस्तावों से देश के सत्ता ढांचे और शक्ति संतुलन में काफी अहम बदलाव आएंगे। पूतिन ने जो प्रस्ताव रखे हैं उन्हें लेकर देश भर में वोटिंग कराई जाएगी। इनके लागू होने की स्थिति में सत्ता की ताकत राष्ट्रपति से ज्यादा संसद के पास होगी।

ज्यादातर विशेषज्ञ मान रहे हैं कि पूतिन ने यह कदम खुद को 2024 के बाद भी सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखने के लिए उठाया है। प्रेजिडेंट के रूप में उनका चौथा कार्यकाल 2024 में खत्म होने जा रहा है और मौजूदा संविधान के तहत वह अगली बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते। व्लादिमीर पूतिन की स्थिति रूस के बेताज बादशाह जैसी है, हालांकि वह रूसियों को बड़ी कुशलता के साथ यह आभास दिलाते रहे हैं कि वे एक लोकतंत्र में रहते हैं और उनके पास भी वे तमाम अधिकार हैं जो बाकी लोकतांत्रिक देशों में हुआ करते हैं। आगे भी सत्ता में बने रहने के लिए वे एक नई प्रणाली लाने का नाटक कर रहे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। उनके ऊपर न तो जनता का कोई दबाव है, न ही विपक्ष का।

कह सकते हैं कि रूस में ‘पूतिन मार्का जनतंत्र’ चल रहा है। लेकिन यह रातोंरात नहीं हो गया। पूतिन ने बड़े सुनियोजित तरीके से अपनी ताकत बढ़ाई। पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अस्वस्थ होने की वजह से 31 दिसंबर 1999 को जब अचानक अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी, तब पूतिन ने अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता संभाली थी। फिर मार्च 2000 में जनता ने राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें चुन लिया। सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही पूतिन ने मीडिया पर नियंत्रण कायम करना शुरू कर दिया। मीडिया मुगल कहलाने वाले गुसिन्स्की के स्वतंत्र चैनल एनटीवी जैसे बड़े संस्थानों को विवश किया गया कि वे सारे कार्यक्रम सरकार के पक्ष में ही दिखाएं।