24.01.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही अन्य अहम समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया   है। अमरि‍की राष्‍ट्रपति डॉनल्‍ड ट्रम्‍प के कश्‍मीर संबंधी बयान पर भारत की प्रतिक्रिया अखबारों की अहम खबर है। जनसत्‍ता की सुर्खी है- तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं, संबंध सामान्‍य बनाने की जिम्‍मेदारी पाकिस्‍तान की।  मौत की सजा पाये अपराधियों के मामलों पर उच्‍चतम न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े का बयान अखबारों की बड़ी सुर्खी है। अमर उजाला का शीर्षक है- गुनाहगार इस मुगालते में न रहें कि उनकी मौत की सजा अंजाम तक नहीं पहुंचेगी। अंतहीन मुकदमेबाज़ी की इजाज़त नहीं होगी। असम में 644 उग्रवादियों का आत्‍म समर्पण वीर अर्जुन की पहली खबर है। हिन्‍दुस्‍तान का कहना है- पूर्वोत्‍तर के उग्रवादियों को मुख्‍यधारा में जोड़ने की कोशिश रंग ला रही है।चीन में कोरोना वायरस का संक्रमण दैनिक ट्रिब्‍यून की पहली खबर है। शीर्षक है- चीन के पांच शहरों में आवाजाही बंद। नवभारत टाइम्‍स की सुर्खी है- फेक न्‍यूज रोकने को दुनिया भर के कानूनों का परख रही है सरकार। फर्जी खबरों पर नियंत्रण और सजा के लिए दिशा-निर्देश या कानून पर हो रहा है विचार।

दैनिक जागरण का सम्पादकीय है कश्मीर में नई पहल। पत्र लिखता है कि दावोस में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के समक्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से कश्मीर को लेकर दिया गया बयान कितना निर्थक है, इसका प्रमाण खुद अमेरिकी संसद को विदेश मामलों में सलाह देने वाली एजेंसी का यह आकलन है कि पाकिस्तान के विकल्प सीमित हैं। इस अमेरिकी एजेंसी का यह भी मानना है कि कश्मीर पर बेलगाम हो रहे पाकिस्तान को इसलिए कुछ नहीं हासिल होने वाला, क्योंकि उसके साथ-साथ चीन का दामन भी दागदार है। इसका आभास चीन को भी हो जाना चाहिए, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मसले पर चर्चा कराने की नाकाम कोशिश के बाद। ऐसी ही नाकामी का सामना मलेशिया और तुर्की भी कर चुके हैं जो इस्लामी जगत में अपनी अहमियत दर्शाने के लिए पाकिस्तान की हां में हां मिला रहे थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने में सफल रहने के बावजूद भारत को कूटनीति मोर्चे पर उसी तरह सक्रियता दिखानी होगी जैसी उसने गत दिवस अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान को महत्वहीन करार देकर दिखाई। कश्मीर पर अनावश्यक टीका-टिप्पणी कर रहे देश जितनी जल्दी यह समङों तो बेहतर कि भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर अपने उन्हीं अधिकारों का ही इस्तेमाल किया है जो एक संप्रभु देश के रूप में उसे हासिल हैं। यह बुनियादी बात अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी समझनी होगी, जो समस्या के मूल कारणों पर गौर किए बगैर यह दिखाने की कोशिश कर रहा जैसे भारत की केंद्रीय सत्ता ने कश्मीर के अधिकारों में बेजा कटौती कर दी है।

यह साफ है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक हिस्सा जानबूझकर यह समझने को तैयार नहीं कि कश्मीर समस्या वास्तव में जम्मू और लद्दाख की भी समस्या थी। इस सिलसिले में केंद्रीय मंत्रियों को जम्मू-कश्मीर भेजने की पहल उल्लेखनीय है। इससे एक ओर जहां राज्य के लोगों में यह भरोसा बढ़ेगा कि केंद्रीय सत्ता उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है वहीं दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री भी इससे अवगत होंगे कि उनके विभागों से संबंधित योजनाएं जमीन पर कितना असर कर रही हैं? अच्छा होगा कि केंद्रीय मंत्रियों के जम्मू-कश्मीर जाने का सिलसिला कायम रहे। अब जब घाटी में आतंकी तत्व पस्त पड़ रहे हैं तब वहां के लोगों को केवल यह प्रतीति ही नहीं होनी चाहिए कि उनकी समस्याओं का समाधान केंद्र सरकार की प्राथमिकता है, बल्कि उन्हें अपनी समस्याएं हल होती भी दिखनी चाहिए।

हिन्दुस्तान “  संक्रमण के खिलाफ   ”  शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखता है कि एक करोड़ से भी अधिक आबादी वाले चीन के वुहान शहर को फिलहाल पूरी दुनिया से अलग-थलग कर दिया गया है। वहां आने-जाने वाली उड़ानों को रोक दिया गया है, सड़कें बंद कर दी गई हैं और ट्रेनों को रोक दिया गया है। अब न तो वहां के लोग बाहर आ सकते हैं और न बाहर के लोग वहां जा सकते हैं। इस समय जिस नए कोरोना वायरस से दुनिया आतंकित है, वह इसी शहर से शुरू हुआ था, यहीं से आगे बढ़कर अमेरिका तक पहुंच गया। लेकिन अभी भी इसका सबसे घनीभूत संक्रमण इसी शहर में है और चीन को उम्मीद है कि इस शहर के दरवाजे बंद करके वह इस रोग को और फैलने से रोक लेगा। वुहान की गिनती चीन के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों में होती है। यह वह शहर है, जहां बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश हुआ है और बहुत बड़े औद्योगिक परिसर बनाए व बसाए गए हैं, जो चीन की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं। इतने महत्वपूर्ण शहर को इस तरह बंद करने का फैसला चीन सरकार के लिए आसान नहीं रहा होगा, पर चीन सरकार शायद साल 2002 की सार्स वाली घटना को दोहराना नहीं चाहती। सार्स भी एक तरह का कोरोना वायरस था, जिसकी शुरुआत भी चीन में ही हुई थी। जब यह शुरू हुआ, तो लंबे समय तक चीन की सरकार इसका खंडन करती रही। नतीजा यह हुआ कि देखते ही देखते यह वायरस 34 देशों में फैल गया था और उससे मरने वालों की संख्या भी बहुत जल्द 750 को पार कर गई थी। इसके मुकाबले वुहान में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या अभी तक 17 है।

कोरोना वायरस आमतौर पर पालतू पशुओं को संक्रमित करते हैं। कई बार उनमें म्यूटेशन होता है और वे मनुष्यों को भी अपनी चपेट में लेने लगते हैं। सार्स, मर्स, इबोला, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू वगैरह इसी श्रेणी के संक्रमण हैं। इन सभी ने दुनिया को आतंकित किया है।

अब चुनौती इस वायरस को वुहान में खत्म करते हुए बाकी हिस्सों में भी खत्म करने की होगी। लेकिन दुनिया के सामने इससे कहीं बड़ी चुनौती ऐसी नई रणनीति बनाने की है, जिससे ऐसे रोगों को फैलने से पहले ही पहचाना और रोका जा सके।

वुहान का संपर्क दुनिया से काटकर कोरोना वायरस के संक्रमण को पूरी तरह खत्म तो नहीं किया जा सकता, बस इसका प्रसार कुछ रोका जा सकता है।