14.02.2020

आज के समाचार पत्रों ने विभिन्न विषयों पर संपादकीय टिप्पणियाँ की हैं, वहीं समाचार पत्रों की सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं | 

राजनीति के अपराधीकरण से सम्‍बद्ध याचिका पर उच्चतम न्यायलय का निर्देश अख़बारों की बड़ी ख़बर है। दैनिक ट्रिब्यून की सुर्खी है–सुप्रीम कोर्ट का राजनीतिक दलों को सख़्त निर्देश, बताना होगा दाग़ी प्रत्याशी क्योंअमर उजाला लिखता है–उम्मीदवार के चयन के 48 घंटे में आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों का ब्यौरा। सिर्फ़ जीतने की क्षमता का आधार पर नहीं दे सकते दाग़ी को मौक़ा। जनसत्ता की सुर्खी है–वांछित क्रिकेट सटोरिया संजीव चावला ब्रिटेन से प्रत्यर्पित, पूछताछ के लिए अदालत ने बारह दिन पुलिस हिरासत में भेजा, कई पूर्व क्रिकेटरों के खुलेंगे राज़। नोवेल कोरोना वायरस संक्रमण के प्रकोप से जुड़ी ख़बरों पर राजस्थान पत्रिका लिखता है–चीन में कल 254 लोगों की मौत, पंद्रह हज़ार संदिग्ध बढ़े। उधर, जापान में भारतीय जहाज़ डायमंड प्रिंसेज़ पर सवार कोरोना से पीड़ित दो यात्रियों की गुहार पर जनसत्ता का शीर्षक है–सभी तरह की सहायता दे रहा भारतीय दूतावास। पुलवामा आतंकी हमले की बरसी पर राजस्थान पत्रिका का शीर्षक है–नाम और तस्वीरों के साथ शहीद स्मारक का उद्घाटन आज। दैनिक जागरण लिखता है–मारे जा चुके हैं साज़िश को अंजाम देने वाले सभी प्रमुख सूत्रधार। जनसत्ता की ख़बर है–सरकारी बैंकों को एक लाख सत्रह हज़ार करोड़ रुपये की चपत, पिछले वर्ष अप्रैल से दिसम्बर के दौरान हुई धोखाधड़ी। भारतीय स्टेट बैंक से क़रीब तीस हज़ार करोड़ रुपये और पंजाब नेशनल बैंक से लगभग पंद्रह हज़ार करोड़ रुपये की हुई धोखाधड़ी।

हिन्दी दैनिक जनसत्ता “सज़ा या दिखावा” शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखता है कि लाहौर की आतंकवाद निरोधी आदालत ने हाफ़िज़ सईद को जो सज़ा सुनाई है, उससे प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने इस मामले में आख़िरकार सख़्ती दिखाई है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि पर नज़र डालने पर फिलहाल यह सिर्फ़ औपचारिकता ही दिखाई देती है | अदालत ने हाफ़िज़ सईद को प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव और आतंकवाद के लिए ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से धन मुहैया कराने के दो मामलों में साढ़े पाँच साल जेल की अलग-अलग सज़ा सुनाई है | इसके अलावा, पंद्रह हज़ार रुपये जुर्माना भी लगाया है | अब तक जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद की कारगुज़ारियों के जगज़ाहिर होने के बावजूद पाकिस्तान में उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने को लेकर जिस तरह का टालमटोल देखा गया था, उससे यही लग रहा था कि उसे बचाने की कोशिश शीर्ष स्तर से की जा रही है | लेकिन यह तभी तक संभव था, जब तक कि पाकिस्तान के इस रुख़ का असर उसके ख़िलाफ़ बनने वाले वैश्विक माहौल और उसे होने वाले व्यापक नुक़सान के रूप में सामने नहीं आ रहा था | ज़ाहिर है, जब इसकी शुरुआत हो गई, तब जाकर पाकिस्तान को शायद इस मसले की गंभीरता का अंदाज़ा हुआ | 

दरअसल, चंद रोज़ बाद पेरिस में फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स यानि एफ़एटीएफ़ की बैठक होने वाली है और इसी के मद्देनज़र पाकिस्तान इस बात से आशंकित था कि कहीं उसे “काली सूची” में ना डाल दिया जाए | एफ़एटीएफ़ ने अपनी पिछली बैठक में साफ़ लहज़े में कहा था कि धनशोधन और आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के मामले में पाकिस्तान ने अगर समय रहते पर्याप्त क़दम नहीं उठाया तो उसे “काली सूची” में डाल दिया जाएगा | 

समाचार पत्र दैनिक भास्कर “टैक्स वसूलने के लिए अपील से ज़्यादा सख़्ती की ज़रूरत” शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखता है कि प्रधानमंत्री ने जनता, ख़ासकर सम्पन्न वर्ग से अपील की है कि वे पूरी ईमानदारी से अपने टैक्स दें | उन्होंने कहा कि 2022 में देश की आबादी की 75वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी, ऐसे में लोगों को अपने व्यक्तिगत हितों को उन लोगों की क़ुर्बानियों के साथ समाहित करना चाहिए, जिनकी वजह से देश आज़ाद हुआ | साथ ही ईमानदारी से टैक्स देने की प्रतिज्ञा करनी होगी, ताकि देश ख़ुशहाल हो सके | प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दुःख़ की बात है कि आज केवल 1॰50 करोड़ लोग ही टैक्स देते हैं और केवल 2200 प्रोफ़ेशनल लोग (जिनमें डॉक्टर, वकील और चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं) ही अपनी आय एक करोड़ से ज़्यादा घोषित करते हैं, जबकि पिछले पाँच साल में तीन करोड़ लोग व्यापार के सिलसिले में या घूमने विदेश गए हैं | ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार देश की आर्थिक स्थिति बदतर हो रही है | महंगाई वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट यानी बेरोज़गारी की मार और गहरी होती जा रही है | इससे पहले वित्त मंत्री ने दावा किया था कि देश आर्थिक मंदी के चंगुल से बाहर आ सकेगा, क्योंकि अर्थव्यवस्था में हरी कोंपले दिखने लगी हैं | दरअसल, जहां प्रधानमंत्री की अपील उचित और अनुपालन योग्य है, वहीं केवल अपील से ताक़तवर व्यक्तिगत स्वार्थ की दुर्भावना को बदलना असंभव है |