16.03.2020

देशभर से प्रकाशित आज के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में कोरोना वायरस से जुड़े संपादकीय लिखे गए हैं। अन्य प्रमुख समाचारों ने मुखपृष्ठ पर स्थान पाया है।
दक्षिण एशिया में कोरोनाविषाणु से निपटने की संयुक्‍त रणनीति पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी का सार्क देशोंके नेताओं से वार्ता अख़बारों की बड़ी खबर है। जनसत्‍ता लिखता है- पाकिस्‍तानका बेसुरा राग। पंजाब केसरी की सुर्खी है- भारत का करारा जवाब। भारत ने कहामानवीय मुद्दे का राजनीतिकरण। अमर उजाला की सुर्खी है- 7 सौ समुद्री जहाजों को नहीं दिया प्रवेश।
मध्‍य प्रदेश में राजनीतिकसंकट पर दैनिक भास्‍कर का कहना है- कोरोना संकट के बीच मध्‍य प्रदेश में शक्तिपरीक्षण टलने के आसार।
देशबंधुका शीर्षक है- आज से भारतीय रिजर्व बैंक ने बदले नियम। ए.टी.एम.या बिक्री केन्‍द्रों पर प्रयोग होंगे डेबिट और क्रेडिट कार्ड।
राजस्‍थानपत्रिका की खबर है- उत्‍तर प्रदेश में सम्‍पत्तियों के नुकसान की भरपाईवाला अध्‍यादेश मंजूर। राज्‍यपाल आनन्‍दीबेन पटेल ने कल इसे मंजूरी दी।
सावधानी का समय शीर्षक से दैनिक हिंदुस्तान का संपादकीय लिखता है कि यह सतर्कता को लगातार बढ़ाते जाने का समय है। अब जब देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर चुकी है, कोई भी लापरवाही महंगी पड़ सकती है। केंद्र सरकार ने इस महामारी को राष्ट्रीय आपदा घोषित करके साफ संदेश दे दिया है कि फिलहाल कोरोना वायरस के निपटना उसकी पहली प्राथमिकता है। जिस तरह से सार्क देशों में साझा प्रयास की पहल चल रही है वह भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। राज्य सरकारें भी अपनी-अपनी तरह प्रयास कर रही हैं। दिक्कत सिर्फ यह है कि इन प्रयासों में एकरूपता नहीं दिख रही। मसलन दिल्ली में सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए सिनेमा हॉल बंद कर दिए गए हैं जबकि उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हुआ। यानी दिल्ली के पड़ोसी जिलों गाजियाबाद और नोएडा में सिनेमाघर खुले हुए हैं। सिनेमाघर बंद करने से कोरोना वायरस को रोकने मेंं कितनी मदद मिलेगी इस पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन जब इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया तो बेहतर यही होता कि इसके लिए उठाए गए कदमों में एकरूपता होती। बेहतर तो यह होगा कि हम ऐसी आपदाओं के लिए एक प्रोटोकॉल विकसित करें जिन्हें लागू करने की अपेक्षा सामान रूप से सभी राज्यों से की जाए।
इस समय जब कोरोना वायरस हमारी परेशानी को लगातार बढ़ता जा रहा है, चीन से आने वाली खबरें यह बता रही हैं कि वहां इसके नए मरीजों की संख्या काफी तेजी से कम हो रही है। कहा जाता है कि इस तरह के विषाणुजन्य प्रकोप एक ऊंचाई तक पहंुच कर कम होने लगते हैं। पर माना यह भी जा रहा है कि चीन ने शुरुआत में भले ही कईं गड़बड़ियां की पर बाद में लोगों के बीच सामाजिक दूरी बनाने की जो कोशिशें की वे काफी काम आईं, और इससे नए मरीजों की संख्या काफी तेजी से कम हुई है। इतना ही चीन ने उस वुहान शहर को भी पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जहां से यह बीमारी शुरू हुई और जो इसका बड़ा केंद्र बन गया। इसके बाद चीन यहीं नहीं रुका, उसने बहुत जल्द ही उस पूरे हुबई प्रांत को ही अलग-थलग कर दिया, वुहान जिसका प्रमुख शहर है। चीन इन प्रयासों से हम काफी कुछ सीख सकते हैं।
रोकथाम के उपायों को पूरी कुशलता और जरूरत पड़ने पर सख्ती से अपनाना इसलिए भी जरूरी है कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र की खामियां किसी से छुपी नहीं हैं। देश के शहरों और कस्बों में तो स्वास्थ्य सुविधाएं फिर भी उपलब्ध हैं, जहां से अस्पतालों में विशेष तैयारियों की खबरें भी आ रही हैं। समस्या ग्रामीण क्षेत्र और खासकर दूर-दराज की गांवों की है, जहां कईं मामलों मे लोगों को प्राथमिक चिकित्सा की सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। संक्रमण अगर वहां तक पहुंचता है तो समस्या कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती है। ऐसे में बेहतर यही रहेगा कि सुरक्षा के प्रयासों को लगातार बढ़ाते हुए कोशिश यह की जाए कि शहरी क्षेत्रों में तो इस महामारी पर विराम लगे ही साथ ही यह ग्रामीण क्षेत्रों तक पहंुचे ही नहीं। कुछ ही दिनों में रबी की कटाई का सीजन शुरू हो जाएगा, इसके बाद अनाज मंडियोंं में सक्रियता और भीड़-भाड़ बढ़ जाती है। इस सक्रियता को रोकना संभव नहीं है लेकिन ये ऐसी जगहें हैं जहां सतर्कता को प्राथमिकता देनी होगी। इस दौरान होने वाले ग्रामीण मेलों को तो स्थगित करने में ही भलाई है।
इसी विषय पर जनसत्ता का संपादकीय संकट और बचाव का कहना है कि भारत में कोरोना संक्रमण से दो लोगों की मौत और कुछ नए मरीजों का सामने आना बता रहा है कि बचाव के तमाम उपायों के बावजूद देश में यह महामारी फैल रही है। रोजाना जिस तरह से नए मरीज सामने आ रहे हैं, वह चिंता का विषय है। ज्यादातर राज्यों में स्कूल-कॉलेज, सिनेमाघर, मॉल आदि बंद कर दिए गए हैं। ऐहतियात के तौर पर लोगों को दफ्तर के बजाय घर से काम करने को कहा गया है। सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए कोरोना संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। हालात बेकाबू न हों, इसके लिए हर स्तर पर हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं। अभी तक कोरोना संक्रमण के जितने मामले सामने आए हैं, उनसे यह साबित हो चुका है कि यह संक्रमण संपर्क के जरिए ही फैल रहा है। ज्यादातर कोरोना पीड़ित वही लोग हैं जो विदेश यात्रा से लौटे हैं और यहां जो उनके संपर्क में आया, उसे यह संक्रमण लगा।
लेकिन अब एक नई समस्या यह सामने आ रही है कि कुछ कोरोना संदिग्ध और संक्रमित अस्पतालों से चुपचाप निकल जा रहे हैं। नागपुर के अस्पताल से चार संदिग्ध भाग निकले। इसी तरह केरल में एक संक्रमित मरीज अस्पताल से खिसक लिया। हालांकि पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे खोज निकाला। अल्लपुझा के सरकारी मेडिकल कालेज में दाखिल एक अमेरिकी दंपति भी धोखा दे निकल गया, जिसे कोच्चि हवाई अड्डे पर पकड़ लिया गया। सवाल है कि क्या कोरोना संक्रमित मरीजों और संदिग्धों की कोई निगरानी नहीं हो रही? क्या अस्पतालों में इन्हें आम मरीजों की तरह ही लिया जा रहा है? इस वक्त जिस तरह के हालात हैं, उसमें तो ऐसे मरीजों की खासी निगरानी और सुरक्षा होनी चाहिए। बीमारी न फैले, इसके लिए अल्पतालों में विशेषतौर पर अलग से आइसोलेशन वार्ड बनाए गए हैं। यहां से किसी मरीज का निकल जाना गंभीर बात है।
सभी डॉक्टर हाथ धोने, भीड़ वाली जगहों पर मास्क लगाने और खांसी-जुकाम वाले मरीजों से एक मीटर की दूरी बनाए रखने जैसे उपायों पर जोर दे रहे हैं जो इस संक्रमण से बचाव के बुनियादी तरीके हैं। जब ऐसी महामारी फैलती है तो लोग घबरा जाते हैं और अपने स्तर पर ऐसे उपाय करने लगते हैं जो उन्हें संकट में डाल सकते हैं। कोरोना से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि डॉक्टर इससे बचाव के जो तरीके बता रहे हैं, उन्हें नजरअंदाज न किया जाए।