17.03.2020

देशभर से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों में विभिन्न विषयों पर संपादकीय लिखे गए हैं। अन्य प्रमुख समाचारों ने मुखपृष्ठ पर स्थान पाया है।

देश में कोरोना वायरस के संक्रमित मामलों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार के जरूरी कदम उठाने को आज के सभी समाचार पत्रों ने पहने पन्ने पर दिया है। अमर उजाला की सुर्खी है-स्कूल-कॉलेज, मॉल 31 तक बंद। केन्द्र सरकार ने जारी की नई एडवाइजरी- लोग आपस में एक मीटर की दूरी बनाए रखें। घर से काम करने को बढ़ावा दें कंपनियां।

हिन्दुस्तान ने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली में जिम-स्पा, नाइट क्लब और साप्ताहिक बाजार 31 मार्च तक बंद रखने के आदेश को प्रमुखता दी है।

हरिभूमि ने इसे बॉक्स में देते हुए लिखा है- दिल्ली में 50 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर सरकारी रोक।

कोरोना वायरस संक्रमण के शेयर बाजार पर असर को देते हुए इक्नॉमिक टाइम्स ने लिखा है – कोरोना से हिला बाजार। 30 महीने के निचले स्तर पर शेयर बाजार।

मध्य प्रदेश में राजनीतिक उठापटक पर राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है- मध्य प्रदेश में सियासी संकट बढ़ा। राज्यपाल के निर्देश के अनुरूप फ्लोर टेस्ट नहीं हुआ। सदन की कार्यवाही 26 तक स्थगति।

निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले में चार दोषियों में से तीन के अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाजा खटखटाने को नवभारत टाइम्स सहित कई अखबारों ने प्रमुखता से दिया है।

बिहार के एक युवा की सफलता की कहानी दैनिक जागरण ने दी है- पत्र के अनुसार युवा इंजीनियर अभिषेक कुमार रोड एक्सप्रेस स्टार्टअप से दे रहे हैं 500 लोगों को रोजगार। मुख्यमंत्री ने दिया सर्वश्रेष्ठ स्टार्टअप आइडिया पुरस्कार।

‘मध्यप्रदेश में संशय’ शीर्षक के अंतर्गत दैनिक हिंदुस्तान का कहना है कि सभी भविष्यवाणियां और विश्लेषण यही कह रहे हैं कि सत्ता अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के हाथ से फिसल रही है। जब भी किसी राज्य में ऐसी स्थितियां बनती हैं, मुख्यमंत्री सदन के विश्वास मत परीक्षण को किसी तरह टालने की कोशिश करते हैं। शायद इस उम्मीद में कि अगर समय मिले, तो वह किसी तरह हालात मैनेज करने की कोशिश करें। आमतौर पर उन्हें इसके लिए ज्यादा समय नहीं मिलता। लेकिन कमलनाथ इसमें कामयाब होते दिख रहे हैं। कोरोना वायरस संक्रमण के नाम पर उन्होंने विधानसभा का सत्र दस दिन के लिए टाल दिया है। कोरोना वायरस को हथियार बनाया जा रहा है यह रविवार को तभी स्पष्ट हो गया था, जब कांग्रेस की तरफ से यह मांग उठने लगी थी कि जो भी विधायक दूसरे प्रदेशों में रह रहे थे, सत्र से पहले सभी की कोरोना संक्रमण की जांच की जाए।
पिछले कुछ समय से राज्य के ज्यादातर विधायक बाहर ही थे। भाजपा के विधायक और कांग्रेस से पाला बदलने वाले विधायक हरियाणा में थे, जबकि कांग्रेस के बाकी विधायक जयपुर में। कोरोना संक्रमण के लिए इन सभी की जांच होगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है, पर संक्रमण के बहाने सत्र को दस दिन के लिए जरूर टाल दिया गया है। हालांकि भाजपा ने जल्द फ्लोर टेस्ट कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया और राज्यपाल के सामने अपने विधायकों की परेड भी करवाई। इन दोनों ही कोशिशों का क्या नतीजा होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट सदन में बहुमत परीक्षण का आदेश दे सकती है, पर भाजपा की कोशिश है कि उसे इसके लिए दस दिन का भी इंतजार नहीं करना पड़े। हालांकि दस दिन की यह मोहलत किसी भी तरह मुख्यमंत्री कमलनाथ के काम आएगी, इसके कोई भी संकेत फिलहाल तो नहीं नजर आ रहे हैं।

दस दिन का अर्थ है कि 26 मार्च के बाद ही सत्र शुरू हो सकेगा। मगर किसके पास विधानसभा में कितनी ताकत है, यह 26 मार्च को ही साफ हो जाएगा। इस दिन राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान होना है और यह चुनाव ही सदन में शक्ति परीक्षण का नतीजा साफ कर देगा। यह भी माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश की सत्ता में बदलाव का दांव जान-बूझकर इस समय खेला गया है, जब एक तीर से एक साथ दो शिकार हो सकते हैं। एक तो भाजपा को प्रदेश में सत्ता मिल जाएगी और दूसरे, राज्यसभा में उसे एक सीट का फायदा मिलेगा। इसके उलट, कांग्रेस दोनों ही मोर्चों पर नुकसान में रहेगी।
नतीजा जो भी हो, पर मध्य प्रदेश राजनीतिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर गया है। हालांकि इसकी भूमिका तभी तैयार हो गई थी, जब पिछले विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, मगर वह बहुमत से मामूली सी दूर ही थी। उसने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से सरकार बनाई जरूर, पर सरकार पर खतरा बना हुआ था। भाजपा तभी से उपयुक्त मौके की तलाश में थी, यह मौका भी अब उसे मिल गया है। आगे नतीजा जो भी हो, पर प्रदेश सरकार की स्थिति जल्द से जल्द स्पष्ट होनी चाहिए। किसी भी प्रदेश के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि वहां राजनीतिक अस्थिरता का दौर लंबा न खिंचे। सदन में बहुमत परीक्षण ही इसका एकमात्र रास्ता है।
‘संकट और मदद’ नामक जनसत्ता का संपादकीय लेख लिखता है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कोरोना संकट से निपटने के लिए रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ जिस तरह से संवाद किया और मदद के हाथ बढ़ाए, वह सिर्फ सार्क देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बड़ा संदेश है। भारत ने इस तरह की पहल करके यह दिखाया है कि जब दुनिया एक महामारी का सामना कर रही है तो ऐसे में वह सारे मतभेदों को भुलाते हुए सबके साथ मिल कर इस चुनौती से निपटने को तैयार है और जो भी मदद मांगेगा, उसे दी जाएगी।

कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के समक्ष एक आपात कोष बनाने का प्रस्ताव रखा और उसमें भारत की ओर से एक करोड़ डॉलर देने की घोषणा भी की गई। यह कदम इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि सार्क देशों में दुनिया की कुल आबादी का पांचवां हिस्सा रहता है और सार्क क्षेत्र में कोरोना के अब तक एक सौ चौहत्तर मामले सामने आए हैं, जिनमें एक सौ सात भारत में हैं। भारत का यह प्रयास जरूरी इसलिए भी है कि अभी सार्क देशों में कोरोना की स्थिति चीन या यूरोप की तरह बेकाबू नहीं हुई है।

चीन से फैली इस बीमारी ने जिस तरह से पूरी दुनिया को अपनी जद में ले लिया है, उसे देखते हुए यह डर बना हुआ है कि कहीं यह संक्रमण सार्क देशों में फैल जाए। हालांकि थोड़े-थोड़े मामले सभी देशों में देखने को मिले हैं। लेकिन अब सतर्कता जरूरी है। सतत निगरानी और बचाव के जरूरी उपायों से ही इसे फैलने से रोका जा सकता है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान और अफगानिस्तान भारत के सबसे करीबी पड़ोसी हैं। ऐसे में इन देशों को बचाना और जरूरत पड़ने पर मदद करना भारत का दायित्व है।
भारत ने सिर्फ पैसे के जरिए ही नहीं, बल्कि इलाज में इस्तेमाल होने वाले जरूरी सामान और उपकरणों की मदद भी देने की बात कही है। भारत ने कोरोना के मरीजों और संदिग्धों की पहचान और उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी देने वाला इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस पोर्टल तैयार किया है और सभी सार्क देशों को भी इसे उपलब्ध कराने की बात कही है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टरों की टीम भी भेजने का भरोसा दिया है। भारत इसी तरह की मदद के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जी-20 समूह के देशों की मदद का भी प्रस्ताव रख चुका है।
लेकिन दुख और हैरानी की बात यह है कि संकट के इन क्षणों में भी हमारा सबसे करीबी पड़ोसी देश पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। जब प्रधानमंत्री मोदी मदद के लिए हाथ बढ़ा रहे थे और दूसरे राष्ट्राध्यक्ष गंभीरता से उन्हें सुन रहे थे, तब पाकिस्तान ने सीधे कश्मीर की बात की। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तो इस बैठक में शरीक भी नहीं हुए और उन्होंने स्वास्थ्य मामलों के अपने एक विशेष सहायक जफर मिर्जा को बैठक में भेज दिया।
बेहतर होता इमरान खान खुद बैठक में पहुंचते और कोरोना से निपटने के लिए मदद का कोई ऐसा प्रस्ताव रखते या ऐसी बात करते जिसमें इंसानियत झलकती। इसके उलट जफर मिर्जा ने यह कह दिया कि हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत सबसे पहले जम्मू-कश्मीर से सारे प्रतिंबध हटाए। जब दुनिया में लोग महामारी से मर रहे हों और खुद पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं है, ऐसे में कश्मीर का मुद्दा उठा कर उसने अपना असली चेहरा ही दिखाया है।