19.03.2020

आज देश भर से प्रकाशित हिंदी समाचार पत्रों ने अलग अलग विषयों पर सम्पादकीय लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी मुखपृष्ठ पर स्थान पाया है। कोरोना संक्रमण से संबंधित खबरें आज भी अखबारों की सुर्खी बनी हैं। हिंदुस्तान की पहली खबर है-कोरोना ने देश के पैर थामे। गुरुग्राम, पटना, मुम्बई में बाजार बंद किए गए। मार्च में निवेशकों के 32 करोड़, 27 लाख रुपये डूबे। सीबीएसई की 31 मार्च तक की परीक्षाएं स्थगित। पत्र ने बताया है- महामारी से नहीं पैदा होंगे यूरोप जैसे हालात। 

जनसत्ता लिखता है- लेह में जवान के संक्रमित पाए जाने के बाद सभी युद्धाभ्यास और प्रशिक्षण रद्द। नवभारत टाइम्स ने बताया है- इटली, ईरान, मलेशिया, इंडोनेशिया में चार हजार से ज्यादा भारतीय नागरिक फंसे। पत्र ने बताया है – दिल्ली की सभी सब्जी मंडियां खुली रहेंगी। फल-सब्जियों के रेट घटेंगे।

निर्भया के दोषियों की फांसी की उल्टी गिनती पर देशबंधु ने लिखा है- अगर अंतिम वक्त में कोई कानूनी पेंच नहीं फंसा तो कल सुबह साढ़े पांच बजे चारों दोषियों को फंदे पर लटका दिया जाएगा। 

हिन्दुस्तान अपने संपादकीस में विडंबनाएँ और तैयारियाँ शीर्षक से लिखता है कि आशंकाएं जब बढ़ती हैं, तो कई विडंबनाएं और अंतर्विरोध भी सामने आते हैं। ये शायद जरूरी भी होते हैं, क्योंकि इनसे हमें अपनी तैयारियों को दुरुस्त करने का अवसर मिलता है। कोरोना वायरस के मामले में यही हो रहा है। बुधवार को जब हम यह मान रहे थे कि भारत में संक्रमित लोगों की संख्या अभी डेढ़ से थोड़ा ही आगे पहुंची है, तभी यह खबर आई कि कोरोना वायरस से संक्रमित 255 भारतीय इस समय ईरान में हैं और 12 संक्रमित भारतीय इस समय संयुक्त अरब अमीरात में हैं। इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं, जो तीर्थयात्रा के सिलसिले में वहां गए थे, उन सबके संक्रमित होने की पुष्टि हो चुकी है। इसका सीधा सा अर्थ हुआ कि इस समय जितने लोग भारत में संक्रमित हैं, उससे कहीं ज्यादा संक्रमित भारतीय विदेश में हैं। इनमें से ज्यादातर लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें शीघ्र भारत लाया जाए। इस समय जब यह कहा जा रहा है कि भारत पर कोरोना वायरस के तीसरे चरण का खतरा मंडरा रहा है, तब इन लोगों की यह मांग सरकार के लिए एक धर्मसंकट की तरह है। इस बीच कोरोना वायरस ने भारतीय सेना में भी दस्तक दे दी है। लेह में तैनात एक सैनिक में कोरोना के संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है। इसके बाद से उसकी पूरी टुकड़ी को ही अलगाव की स्थिति में रख दिया गया है। यह एक बुरी खबर तो है, लेकिन इसे लेकर आधिकारिक स्तर पर जिस तरह की सक्रियता दिखाई गई, वह उम्मीद भी बंधाती है कि कोरोना संक्रमण तीसरे चरण में न पहुंचे, इसके लिए कोशिशें तकरीबन हर जगह हो रही हैं। जब तक कोरोना वायरस का कोई पक्का इलाज सामने नहीं आता, तब तक बचाव ही इसका इलाज है।

बकाया और मनमानी शीर्षक से नवभारत टाइम्स अपने संपादकीय में लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने टेलिकॉम कंपनियों को उनके सरकारी बकाये में राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। 1 लाख 47 हजार करोड़ रुपये के एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) मामले में कोर्ट ने कहा है कि टेलिकॉम कंपनियों पर बकाया राशि का फिर से आकलन करना कोर्ट की अवमानना होगी। कंपनियों ने पिछले 18 वर्षों में जिस घोषित नीति के तहत कमाई की है, उसी के तहत उन्हें भुगतान भी करना होगा। अगर सरकार ने उन्हें एजीआर का हिसाब नए सिरे से करने की इजाजत दी तो यह धोखा होगा। एजीआर विवाद में कोर्ट ने 24 अक्टूबर 2019 को दूरसंचार विभाग के पक्ष में फैसला देते हुए टेलिकॉम कंपनियों को ब्याज और पेनल्टी समेत बकाया चुकाने का आदेश दिया था। दूरसंचार विभाग के मुताबिक टेलिकॉम कंपनियों पर उसके 1.47 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं, लेकिन वे सेल्फ-असेसमेंटकर पार्ट पेमेंट कर रही हैं। इतना ही नहीं, ऐसे हालात भी पैदा हो सकते हैं कि देश के दूरसंचार क्षेत्र में एक-दो कंपनियां ही रह जाएं। यह नौबत आई तो विशाल भारतीय बाजार पर उनका एकछत्र अधिकार हो जाएगा, जिसका इस्तेमाल वे मनमाना रेट बढ़ाने में कर सकती हैं। 5-जी और बाकी तकनीकी विकास का मामला इससे और लटक सकता है। सरकार और ट्राई को दूर की सोचकर ही कोई फैसला करना चाहिए।

आलेखः- हिन्दी एकांश, विदेश प्रसारण प्रभाग, आकाशवाणी