20.03.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों ने अलग-अलग विषयों को अपने सम्पादकीय में शामिल किया है। साथ ही अन्य अहम समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी का राष्‍ट्र के नाम संबोधन, अखबारों की बड़ी खबर है। हिन्‍दुस्‍तान की सुर्खी है – प्रधानमंत्री की अपील, रविवार को जनता कर्फ्यू, बच्‍चे और बुजुर्ग रहे सतर्क, अस्‍पतालों में भीड़ से बचे, दूध, खाने पीने के समान, दवाई और अन्‍य जरूरी चीजों की कमी नहीं। संग्रह की होड़ न करें अफवाहों पर ध्‍यान न दें। जनसत्‍ता लिखता है – इटली में कोरोना विषाणु से चीन से भी ज्‍यादा हुई मृतकों की संख्‍या, संयुक्‍त राष्ट्र ने चेताया अगर कोरोना विषाणु को फैलने से नहीं रोका गया तो लाखों लोग मर सकते हैं। दैनिक जागरण का कहना है – उत्‍तर प्रदेश में कुल 19 मरीजों में से नौ हुए स्‍वस्‍थ। मध्‍य प्रदेश में राजनीतिक संकट पर राजस्‍थान पत्रिका की सुर्खी है – आज होगी कमलनाथ की अग्नि परीक्षा। राष्‍ट्रीय सहारा का शीर्षक है – निर्भया के चारों दोषियों को आज फांसी। राजस्‍थान पत्रिका लिखता है – फांसी से पांच घंटे पहले तक चले बचने के नाकाम पैंतरे। एक दिन में छह याचिकाएं खारिज। दैनिक भास्‍कर की खबर है – डिजिटल पेमेंट में पिन नम्‍बर नहीं अब ओटीपी संख्‍या से होगा भुगतान।

हिन्दुस्तान का सम्पादकीय है “क्वारंटीन के दबाव ”। पत्र लिखता है कि अभी जब हमारे पास कोई पक्का इलाज नहीं है, तो क्वारंटीन यानी अलगाव या तनहाई को ही फिलहाल कोरोना वायरस से बचने का सबसे अच्छा विकल्प माना जा रहा है। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति अलगाव में रहता है, तो उसका संक्रमण दूसरों तक फैल नहीं सकेगा और सामान्य व्यक्ति अलगाव में रहता है, तो खुद को काफी कुछ संक्रमण से बचा सकता है। सिद्धांत में तो यह अलगाव अच्छी चीज है, लेकिन जब यह समाज और प्रशासन की हकीकतों और हमारी मानसिकता की गलियों से गुजरता है, तो कई अजीबो-गरीब दृश्य उपस्थित होते हैं, जो परेशान करने वाले भी होते हैं और डराने वाले भी। कोरोना वायरस से संक्रमित एक महिला क्वारंटीन की सरकारी व्यवस्था से भाग निकलती है और सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करते हुए देश के दूसरे हिस्से में पहुंच जाती है। स्वास्थ्य अधिकारी अब यह जानने में जुटे हुए हैं कि जहां-जहां वह गई, वहां कहीं कोई संक्रमण तो नहीं फैला! इस मामले में प्रशासन की तरफ से एफआईआर भी दर्ज हुई और इसी के बाद यह बहस भी शुरू हुई है कि इस तरह से भागने पर कठोर सजा और जुर्माने का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन क्वारंटीन में रहे कई लोगों ने इस पूरी व्यवस्था की तारीफ की है और इसे जरूरी, तो खैर सभी बता रहे हैं।

लेकिन क्वारंटीन की व्यवस्था को लेकर सब कुछ अच्छा नहीं है। इसे लेकर तमाम तरह की शिकायतें भी सामने आई हैं। यह अलगाव कुछ लोगों पर बड़ा मनोवैज्ञानिक असर भी डालता है। यही कारण है कि बुधवार को दिल्ली से सफदरजंग अस्पताल में एक युवक ने सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली, जहां उसे संक्रमण के शक में अलगाव में रखा गया था। दूसरी तरफ, यह सरकार को भी समझ में आने लगा है कि आने वाले समय में यह जरूरत बहुत बढ़ सकती है इसलिए घरों में ही अलगाव पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि देश की बहुत बड़ी आबादी ऐसी भी है, जहां एक ही कमरे में पूरा परिवार रहता है, वहां किसी के क्वारंटीन की बात सोची भी नहीं जा सकती।

भारत की तरह पश्चिम में भी इसे लेकर कई उलझनें सामने आ रही हैं। अमेरिकी अखबार लोगों को बता रहे हैं कि क्वारंटीन में रखे जाने वालों के कानूनी अधिकार क्या-क्या हैं? हालांकि यह भी सच है कि संचार और सोशल मीडिया के इस युग में कोई भी पूरी तरह तनहाई में नहीं रहता। कोरोना वायरस एक आपदा है और आपदा हमें अपनी सोच और व्यवहार बदलने के दबाव देती है, इस समय सबके लिए बेहतर यही है कि लोग वक्त की नजाकत को समझें।

नवभारत टाइम्स “संशय के बादल ”  शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखता है कि कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के कारण दुनिया के कई बड़े आयोजन स्थगित या रद्द कर दिए गए हैं, लेकिन साल के सबसे बड़े खेल आयोजन टोक्यो ओलिंपिक को लेकर दुविधा बरकरार है। इंटरनैशनल ओलिंपिक्स कमिटी (आईओसी) के अधिकारी ओलिंपिक्स को समय पर ही कराना चाहते हैं। जापान की भी यही मंशा है, लेकिन कई दिग्गज खिलाड़ियों ने इसका विरोध किया है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को यकीन है कि जापान संक्रमण से पार पाकर ओलिंपिक्स का आयोजन बिना किसी समस्या के कर लेगा। पिछली ओलिंपिक पोल वॉल्ट चैंपियन कैटरीना स्टेफेनिडी ने ट्वीट करके सवाल किया, ‘क्या आईओसी चाहता है कि हम हर दिन अभ्यास करके अपने स्वास्थ्य, परिवार के स्वास्थ्य और आम लोगों के स्वास्थ्य को जोखिम में डालें।’ कई लोगों का कहना है कि कोरोना के प्रकोप से अमेरिका, चीन, इटली और फ्रांस जैसे देश बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। अगर इनके अहम खिलाड़ी खेलने नहीं आए तो वैसे भी पूरा आयोजन फीका ही रहेगा। फिर रस्मअदायगी करने का क्या मतलब है/ यह भी कि टोक्यो में एक ही जगह दुनिया भर के खिलाड़ी और दर्शक जुटेंगे तो यह शहर कोरोना के लिए ‘हॉट जोन’ बन जाएगा। जापान भले ही ओलिंपिक्स को लेकर आशावादी हो लेकिन अभी टोक्यो में ही खेल की कई प्रतिस्पर्धाएं नहीं हो पा रही हैं। बुधवार को वहां जिम्नास्टिक की ओलिंपिक क्वालिफायर इवेंट रद्द करना पड़ा। इससे एक दिन पहले ही जापान की ओलिंपिक समिति के उप प्रमुख कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए। इसके बावजूद आईओसी ने कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है, अभी हालात ऐसे नहीं हैं कि कोई बड़ा फैसला लिया जाए। यह उसकी राय हो सकती है लेकिन ओलिंपिक को लेकर जल्दी किसी फैसले तक पहुंचना होगा। खेल के लिए खिलाड़ियों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती। इसके पहले भी असाधारण स्थितियों में ये खेल रद्द किए जा चुके हैं। वर्ष 1916, 1940 और 1944 में ओलिंपिक खेल वर्ल्ड वॉर के कारण रद्द हुए थे। उम्मीद है, आईओसी इस बारे में सभी पक्षों से विचार कर जल्द ही कोई फैसला करेगी।

आलेख:- हिन्दी एंकाश, ऑल इंडिया रेडियो

स्वर- वीरेन्द्र कौशिक