कोविड 19 का सामना करने की रणनीति में सार्क शामिल

रविवार, 15 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क के सभी सदस्य देशों से वीडियो कॉन्फ़्रेंस के माध्यम से घातक विषाणु कोविड 19 का सामना करने के लिए वार्ता की। वार्ता का उद्देश्य तेज़ी से फैल रहे इस विषाणु से बचाव की एक साझा मज़बूत रणनीति तैयार करना था। इस विषाणु की वजह से अभी तक दुनिया भर में दस हज़ार से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है और पूरी दुनिया में विषाणु से प्रभावित दो लाख से ज़्यादा लोग अस्पतालों में अलग-थलग रहते हुए स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।

सभी आठ सार्क देशों ने कोविड 19 से लड़ने के लिए संयुक्त रणनीति की प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और श्रीलंका, मालदीव और अफ़्ग़ानिस्तान के राष्ट्रपतियों तथा भारत, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान के प्रधानमंत्रियों ने वीडियो वार्ता में सक्रियता से भाग लिया। पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री के विशेष स्वास्थ्य सहयोगी जफ़र मिर्ज़ा ने इसमें हिस्सा लिया।

 सभी नेताओं ने इस महामारी से बचाव के लिए अपनी कोशिशें साझा करने की ज़रूरत पर बल दिया। वे सभी इस तथ्य को लेकर सचेत थे कि ये एक बड़ा मानवीय मुद्दा है और क्षेत्र इस महामारी का सामूहिक प्रयासों और एक साझी मज़बूत रणनीति के माध्यस से बेहतर तरीक़े से सामना कर सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान को गंभीरता से लेते हुए सार्क के सभी राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी लेकिन पाकिस्तान ने इस सुअवसर का इस्तेमाल कश्मीर मुद्दा उछालने के लिए किया।

हालांकि ये पाकिस्तान का पूर्ण अधिकार है कि ये किसी भी स्तर पर वीडियो वार्ता में भाग ले सकता था लेकिन विस्तृत पहुँच वाले पाकिस्तानी दैनिक डॉन के एक संपादकीय में ये खेद व्यक्त किया गया कि अगर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इसमें भाग लेते तो इस जानलेवा विषाणु से लड़ने के लिए पाकिस्तान के प्रयासों के प्रति और अधिक जागरूकता का पता चलता क्योंकि इसके पड़ौसी देशों, बांग्लादेश और भारत के प्रधानमंत्री स्वयं इसमें शामिल हुए। दैनिक में लिखा गया कि साझा दुश्मन अवसर मिलने पर सभी देशों को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इस समय अपने सभी मतभेदों को भुलाकर युद्धस्तर पर इस विषाणु का सामना करना चाहिए।

 दो प्रमुख राजनीतिक दलों पाकिस्तान मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने भी इस पर खेद व्यक्त किया कि सरकार इस महामारी को देश के लिए गंभीर ख़तरा नहीं मान रही है।

सार्क क्षेत्र सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है जिसमें पूरी वैश्विक आबादी का लगभग पाँचवा हिस्सा रहता है। ये महामारी दूसरे से तीसरे चरण में पहुँचने के लिए सार्क के सभी आठ देशों का दरवाज़ा खटखटा रही है जिसका अर्थ है व्यक्तिगत से व्यापक सामुदायिक स्तर का संक्रमण। लेकिन फिर भी भारत के अतिरिक्त इस क्षेत्र का कोई भी अन्य देश इस तरह के हालात का सामना करने के लिए तैयार नहीं है चाहे संसाधनों की बात हो या कर्मियों की, अवसंचरनात्मक ढांचे की बात हो या स्वास्थ्य क्षेत्र में शोध की क्योंकि भारत ने व्यापक स्तर पर जाँच और सुविधाओं से जुडे अन्य कार्य शुरू कर दिए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा क्षेत्र में कोविड 19 को फैलने से रोकने के लिए संसाधन, कर्मी और उपकरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर तुरंत पहुंचाने के लिए आपात कोष तैयार करने के प्रस्ताव की भी सभी नेताओं ने खुलकर सराहना की। भारत ने कोष में दस मिलियन अमरीकी डॉलर के आरम्भिक योगदान की भी घोषणा की और नई दिल्ली को सार्क के सदस्य देशों से मदद का अनुरोध भी मिला है। पिछले पाँच दिनों में भारत ने आपात कोष के लिए घोषित दस मिलियन डॉलर में से एक मिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य के जाँच उपकरण, सैनिटाइज़र और अन्य ज़रूरी सामान नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, अफ़्ग़ानिस्तान और बांग्लादेश को भेजे हैं।

ये महामारी तेज़ी से फैल रही है। सार्क क्षेत्र के किसी भी देश की तुलना में पाकिस्तान और भारत में इसके सबसे अधिक मरीज़ सामने आए हैं। डॉन समाचार पत्र में हाल ही में दो लोगों की मृत्यु और 450 मरीज़ों की पुष्टि होने के बारे में लिखा गया। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 240 से अधिक संक्रमित लोगों की ख़बर है जो कि सबसे अधिक संख्या है। भारत में अभी तक दो सौ से अधिक लोगों के संक्रमित होने और चार लोगों की मृत्यु होने की पुष्टि हो चुकी है।

 तेज़ी से फैल रहा कोविड 19 विषाणु पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है और जी-सात देशों जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी इससे निपटने के लिए साझी कार्यनीतियाँ तैयार कर रही हैं।

आलेख- रतन साल्दी, राजनीतिक समीक्षक

अनुवाद- नीलम मलकानिया