23.03.2020

राजधानी दिल्ली से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों में विविध विषयों को संपादकीय के लिए चुना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर जनता कर्फ्यू अखबारों की बड़ी खबर है। जनसत्ता की सुर्खी है- देश में कोरोना बंदी। कई जिलों में पूर्ण बंदी का ऐलान किया। पूर्णबंदी वाले इलाकों में केवल जरूरी सेवाओं की अनुमति होगी। बिना वजह बाहर घूमने पर सरकार कर सकती है कार्रवाई। रेलवे ने देश भर में सभी ट्रेन सेवाएं रोकी, केवल मालगाड़ियां चलेंगी। दैनिक भास्कर की टिप्पिणी है-पहली बार थमेंगी 13 हजार पांच सौ 23 रेलगाड़ियां। दिल्ली में पूर्णबंदी का घरेलू उड़ानों पर नहीं पड़ेगा असर। कल शाम पांच बजे कोरोना संक्रमण से निपटने में कार्यरत लोगों के प्रति आभार प्रकट करने पर दैनिक जागरण के शब्द हैं- एक राष्ट्र, एक लय, एक ताल।

275 भारतीय नागरिकों को इटली से दिल्ली लाने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट के चालक दल के सदस्यों के बयान पर हिंदुस्तान ने कोरोना संघर्ष में लगी नेहा राणामान के शब्दों को सुर्खी दी है- देश के लिए कुछ करने का मौका मिले तो क्यों पीछे हटें। छत्तीसगढ़ के नक्सलग्रस्त सूकमा जिले में नक्सली हमले में 17 जवानों के शहीद होने पर देशबन्धु का कहना है- मुठभेड़ में 14 जवान घायल, पांच गंभीर।

राष्ट्रीय सहारा ‘सफल जनता कर्फ़्यू’ राष्ट्रीय सहारा अपने संपादकीय में लिखता है कि जनता कर्फ़्यू का सफल होना निश्चित रूप से राहतकारी है। कारोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए सबसे ज्यादा आवश्यकता संकल्प और संयम की है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यही समझाया था। पूरा देश इस संकल्प से भूमिका निभाए कि हमें हर हाल में कोरोना महामारी के हमले को परास्त करना है। इसके लिए संयम चाहिए। संयम यानी अपने को जब तक आवश्यकता हो स्वयं के द्वारा कैद कर देना तथा डॉक्टरों के निर्देश का पालन करना। समाज के कुछ लोग ऐसा करें और कुछ नहीं इससे हम कोरोना पर विजय नहीं पा सकते। जो नहीं करेंगे उन पर संक्रमण का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। पहले चीन‚ उसके बाद इटली‚ स्पेन‚ ईरान‚फ्राँस‚ ब्रिटेन आदि इसके डरावने उदाहरण हैं। हमारे यहां अभी मरीजों की संख्या ज्यादा नहीं है‚ लेकिन यह कभी भी विस्फोटित हो सकता है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों तक इसका फैलाव चिंताजनक है। इसमें हमारा साहस और धैर्य के साथ अपने को समाज के संसर्ग से दूर रखना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में यही अपील की। उनकी निजी लोकप्रियता और विश्वसनीयता है जिसका असर हम जनता कफर्यू में देख रहे हैं। इससे जागरूकता भी फैली है। सच कहा जाए तो प्रधानमंत्री के आह्वान पर यह कोरोना के खिलाफ भारत की पहली सामूहिक एकजुटता है। लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमने एक दिन अपने को बंद रखा और हमारी ज़िम्मेदारी खत्म। आगे भी हमें इसी तरह का संयम दिखाना है। 

जनसत्ता अपने संपादकीय में ‘संजीदगी का अभाव’ शीर्षक से लिखता है कि पिछले कुछ सालों में महिलाओं के प्रति हिंसा और बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। अब बलात्कार के बाद हत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। इसे लेकर सरकारें महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के संकल्प दोहराती रहती हैं। मगर हकीकत यह है कि इस मोर्चे पर वे प्राय: उदासीन ही दिखाई देती हैं। इसी का नतीजा है कि केंद्र द्वारा निर्भया कोष से जारी धन का उपयोग राज्य सरकारें नहीं कर पातीं। निर्भया बलात्कार और हत्या मामले में दोषियों को फांसी की सजा दे दी गई, इस पर स्वाभाविक ही संतोष जताया गया। पर ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए जिस तरह का वातावरण बनना चाहिए और सुरक्षा के जैसे इंतजाम होने चाहिए, वह जुटाने में सरकारें विफल दिखाई देती हैं। निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन सेवा शुरू की गई थी। इसके अलावा पुलिस वालंटियर योजना भी चलाई गई। इसके पीछे मकसद यह था कि अगर कोई महिला संकट में है और मदद की गुहार लगाती है, तो उसे तुरंत उसी स्थान पर सहायता उपलब्ध कराई जा सके। उसे संकट से उबारा और दोषियों पर शिकंजा कसा जा सके। तब उम्मीद की गई थी कि इस चौकसी से महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों में कुछ भय पैदा होगा और ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। मगर प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इन योजनाओं के लिए अबंटित धन का करीब चौबीस फीसद ही उपयोग हो पाया। यूँ तो सरकारें कोई योजना चलाने में धन की कमी का रोना रोती रहती हैं, पर विचित्र है कि जिन योजनाओं में उन्हें धन उपलब्ध होता है, उसे वे उपयोग नहीं कर पातीं। यह उनकी संजीदगी का अभाव नहीं तो और क्या है!