25.03.2020

देशभर से प्रकाशित आज के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लगाए गए 21 दिन के व्यापक लॉकडाउन पर अपने संपादकीय लिखे हैं। अन्य समाचार भी मुखपृष्ठ पर दिए गए हैं।
संकट और राहत नामक संपादकीय लेख में जनसत्ता का लिखना है कि देश में कोरोना महामारी के बीच मंगलवार को वित्तमंत्री ने जो कुछ घोषणाएं की, उनसे कारोबारियों और बैंक खाताधारकों को थोड़ी तो राहत मिलेगी। वित्त वर्ष समाप्ति की ओर है और कंपनियों को अपने कर समय से चुकाने हैं। लेकिन पूर्ण बंदी के कारण सारे काम ठप हैं। ऐसे में कारोबारी चिंतित हैं। अब कारोबारी मार्च-मई की जीएसटी रिटर्न 30 जून तक दाखिल कर सकेंगे। जिन कंपनियों का कारोबार पांच करोड़ रुपए तक है, उन्हें रिटर्न दाखिल करने में देरी हो जाने पर कोई विलंब शुल्क, जुर्माना या ब्याज नहीं देना पड़ेगा।
जिन कंपनियों का कारोबार पांच करोड़ रुपए से ज्यादा है, उन्हें पंद्रह दिन की छूट मिलेगी और इस अवधि में जीएसटी रिटर्न दाखिल करने पर कोई विलंब शुल्क या जुर्माना नहीं लिया जाएगा। उसके बाद अगर देरी हुई तो बारह के बजाय नौ फीसद की दर से ब्याज लिया जाएगा। इसी तरह टीडीएस जमा करने में देरी पर अठारह की जगह नौ फीसद ब्याज लिया जाएगा। कारोबारियों पर नियत अवधि में कर जमा करने का जो दबाव रहता है, उसमें यह थोड़ी राहत जरूर है। इसी तरह बैंक खाताधारकों के लिए न्यूनतम शेष राशि और डेबिट कार्ड तथा एटीएम पर लगने वाले शुल्क भी फिलहाल खत्म कर दिए गए हैं।
भारत में कोरोना महामारी जिस तेजी से फैल रही है, उसका अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ना स्वाभाविक है। इसे रोकने के लिए देशभर में पूर्ण बंदी लागू कर दी गई है। औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन बंद है। दवा और किराना दुकानों को छोड़ कर बाजार पूरी तरह से बंद हैं। जाहिर है, अर्थतंत्र के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है। अभी कारोबारियों की सबसे बड़ी चिंता यह बनी हुई है कि कब हालात सुधरेंगे और काम-धंधा शुरू होगा। किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि कोरोना वायरस फैलने से रोकने के लिए सरकार को पूर्ण बंदी जैसा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
सबसे ज्यादा असर उन छोटे और मझोले कारोबार पर पड़ा है, जो छोटी पूंजी से चलते हैं और अचानक काम बंद होने से उन्हें अगले महीने अपने कर्मचारियों को वेतन देने का संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने साफ कह दिया है कि इस बंदी के दौरान कोई भी संस्थान किसी भी कर्मचारी का वेतन और छुट्टी न काटे और उसे काम पर माना जाए। ऐसे में उद्योगों का संकट अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।
छोटे और बड़े उद्योगों के सामने संकट कर्मचारियों को बंदी के दौरान वेतन देने का तो है ही, इसके साथ ही बैंक कर्ज की मासिक किस्तें चुकाने का भी है। उद्योगों के समक्ष वैसे ही कई तरह के दबाव हैं, जिनसे वे जूझ रहे हैं। हालांकि कोरोना संकट के दौरान उद्योगों को राहत के मुद्दे पर प्रधानमंत्री उद्योगपतियों से बात कर चुके हैं।
इसलिए यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार जल्द ही प्रभावित क्षेत्रों के लिए घोषणाएं कर सकती है। रियल एस्टेट जैसे कुछ क्षेत्र, जो लंबे समय से मंदी की मार झेल रहे हैं, अब कोरोना संकट के कारण और ज्यादा प्रभावित होंगे। इसके अलावा कंपनियों में उत्पादन बंद होने से चौथी तिमाही के नतीजे भी निराशाजनक रहेंगे और इसका असर जीडीपी की वृद्धि पर पड़ेगा, जो पहले से ही काफी कम है। इस वक्त पहली प्राथमिकता कोरोना से निपटने की है, लेकिन अचानक बंदी से जो संकट खड़ा होगा, वह भी कम गंभीर नहीं है।
लॉकडाउन और किल्लतें नाम से नवभारत टाइम्स अपने संपादकीय में कहता है कि जानवरों की तरह ठुंसे हुए यात्रा कर रहे थे और अपने लिए मुसीबतें मोल रहे थे। दरअसल देश भर में फैक्ट्रियां, दफ्तर, स्कूल-कॉलेज और कोचिंग इंस्टीट्यूट बंद होने के बाद उनके सामने स्वाभाविक रास्ता यही था कि वे अपने गांवों-कस्बों की ओर लौट जाएं। यह यथार्थ अक्सर हमारी समझ से परे चला जाता है कि भारत अभी आंतरिक विस्थापितों का देश है, जहां लोग रोजी-रोटी और शिक्षा के लिए अपना घर छोड़कर दूर के शहरों में जाते हैं। किसी भी संकट की स्थिति में उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया अपने मूल स्थान लौटने की होती है। इस बात को समझे बगैर कई फैसले किए गए। जैसे छात्रावास बंद कर दिए गए, जबकि जरूरत ऐसी व्यवस्था करने की थी कि स्टूडेंट्स को बाहर न जाना पड़े। इसी तरह कारखाने और कई सेवाएं बंद कर दी गईं लेकिन यह नहीं सोचा गया कि कामगारों का क्या होगा। संभवतः यह फैसला बिना होमवर्क के किया गया। बहरहाल, इन फैसलों में कोई भी ऐसा नहीं है जिसे बदला न जा सके। किसी भी हाल में आवाजाही रोकने की जरूरत है। जो जहां है, उसे वहीं रोका जाए, जो तभी संभव है, जब लोगों के भरण-पोषण पर कोई आंच न आए। इसके लिए मजदूरों को आश्वस्त करना होगा कि बिना काम किए भी उनकी रोजी-रोटी चलती रहेगी। उन्हें राशन और अन्य जरूरी वस्तुएं उपलब्ध करानी होंगी। एक समस्या यह भी है कि रोजमर्रा की कई चीजों की कीमतें अचानक बढ़ गई हैं और कई वस्तुओं की किल्लत भी हो गई है। यह सप्लाई रुकने की वजह से हुआ है। दालें, खाद्य तेल, आटा, आलू, प्याज आदि की कीमतों में तेजी आई है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि खुदरा बाजार में आलू के दाम बढ़कर शनिवार, 21 मार्च को 30 रुपये और प्याज के 40 रुपये प्रति किलो हो गए थे, जबकि 17 मार्च को इनके भाव क्रमश: 25 और 30 रुपये प्रति किलो थे। महानगरों के कई इलाकों में लोग पीने के पानी के लिए बोतलों पर आश्रित हैं। सोमवार को दिल्ली-एनसीआर के कुछ क्षेत्रों में पानी की बोतलों की किल्लत रही। लॉकडाउन काफी लंबा भी खिंच सकता है। इसका तमाशा न बनने लगे, इसके लिए प्रशासन को ऐसी तैयारी करनी पड़ेगी कि समाज के किसी भी हिस्से को किसी तरह की दिक्कत न हो।