अफ़्रीका में चीन का बढ़ता निवेश: चिंता का पहलू

एशिया की दो उभरती शक्तियाँ, चीन तथा भारत अफ्रीकी महाद्वीप के लिए नई नहीं हैं| हाल के वर्षों में इनकी उपस्थिती के साथ दोनों ही देश के अफ़्रीकी देशों के साथ दीर्घ निर्मित ऐतिहासिक, राजनीतिक तथा आर्थिक संबंध बहुत अधिक बढ़ रहे हैं| अफ़्रीका के साथ नए सिरे से चीन तथा भारत का जुड़ाव ऐसे समय में हुआ है, जब समूचे अफ़्रीका में व्यावसायिक वातावरण में सुधार हुआ है तथा अफ़्रीका में बाज़ार बढ़ने के कारण यहाँ रुचि बढ़ी है|

बहरहाल, चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बी॰आर॰आई॰) के अंतर्गत अफ़्रीका की मूलभूत संरचनाओं की परियोजनाओं में इसके विशाल तथा अत्यधिक निवेश पर हाल के वर्षों के चीन-अफ़्रीका के संबंध पूरी तरह से केन्द्रित हैं| अलग-अलग अफ़्रीकी देशों पर इन निवेशों के निहितार्थ गंभीर हो सकते हैं| चीन प्राचीन सिल्क रोड को फिर से प्रारम्भ करना तथा ज़मीन और समुद्री मार्गों के माध्यम से अफ़्रीका तथा यूरोप के साथ ख़ुद को जोड़ना चाहता है| अमरीका के जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय में चीन-अफ़्रीका अनुसंधान संस्थान (सी॰ए॰आर॰आई॰) की ख़बरों के अनुसार, चीन की सरकार के एग्ज़िम बैंक तथा इसकी कंपनियों ने 2000 तथा 2017 के बीच एक साथ अफ़्रीका को लगभग 143 बिलियन डॉलर के ऋण दिये हैं| इनमें से अधिकतर ऋण बड़ी आकारवाली मूलभूत परियोजनाओं के लिए हैं| बी॰आर॰आई॰ के साथ जुड़ी अधिकतर गतिविधियों को चीन द्वारा अपने व्यापार तथा ऊर्जा मार्गों को भिन्न करके अपनी रणनीतिक संवेदनशीलताओं को कम करने के एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है| जबकि, इसे पूर्व अफ़्रीकी क्षेत्र के तटीय राज्यों में विस्तारित व्यापार तथा मूलभूत संरचना के निवेशों के माध्यम से अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के रूप में भी देखा जा सकता है| इन प्रयासों के केंद्र में संपर्क के नए समुद्री मार्गों को खोलने की चाल तथा विश्वभर में चीन के रणनीतिक बन्दरगाहों की पहुँच बनाना शामिल है|

इस परिदृश्य में, पूर्व अफ़्रीकी देशों ने समुद्री सिल्क रोड में एक संपर्क के एक केंद्रीय बिन्दु को विकसित किया है, जिनका संपर्क चीनी कंपनियों तथा ऋणदाताओं द्वारा वित्तपोषित तथा योजनाबद्ध और निर्मित बन्दरगाहों, पाइपलाइनों, रेलवे तथा बिजली संयंत्रों से है| अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बी॰आर॰आई॰) और समुद्री सिल्क मार्ग परियोजना (एम॰एस॰आर॰) के अंतर्गत चीन ने केन्या को एक मुख्य समुद्री केन्द्रबिन्दु के रूप में चिन्हित किया है| इसके लिए इसने रेलवे के आधुनिकीकरण, केन्या से दक्षिण सूडान तक पाइपलाइन का निर्माण, लामू बन्दरगाह तथा संबन्धित मूलभूत संरचनाओं के निर्माण के लिए अरबों अमरीकी डॉलर के निवेश किए हैं| इसके अतिरिक्त, पूर्व अफ़्रीका में दो मुख्य बी॰आर॰आई॰ परियोजनाओं की स्थापना करने में चीनी कंपनियों ने अरबों डॉलर ख़र्च किए हैं| यह निवेश मोमबासा को नैरोबी से जोड़नेवाले मानक गेज रेलवे तथा अदिस अबाबा से जिबूती तक इलेक्ट्रिक रेलवे की स्थापना करने के लिए किया गया है, जहां चीन गहरे जल के रणनीतिक बन्दरगाह में हिस्सेदारी के साथ अपने पहले समुद्री नौसैनिक ठिकाने की स्थापना कर चुका है|

जबकि, इसके अलग-अलग देशों में अच्छी मूलभूत संरचनाओं के निर्माण संबंधी अफ़्रीकी देशों के लक्ष्य को बी॰आर॰आई॰ के अंतर्गत चीनी परियोजनाओं द्वारा आश्वस्त किया गया है| विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर अफ़्रीकी देश ऋण के बोझ से दबे जा रहे हैं|

इसके अलावा, 2020 में कोविड-19 महामारी ने सब-सहारन अफ़्रीका को 5॰1 प्रतिशत की नकारात्मक विकास दर में पहुंचा दिया है|

चीन के ऋण वितरण में पारदर्शिता की कमी तथा इसके नियम और शर्तें तेज़ी से एक अन्य चिंता का कारण बन रहे हैं| इसके साथ ही, “ऋण-जाल राजनय” की रणनीति से संबन्धित बहस शिक्षाविदों और अफ़्रीकानिस्टों में चल रही है| उदाहरणस्वरूप, श्रीलंका तथा पाकिस्तान चीन के ऋण जाल में फंस चुके हैं और दोनों पर हंबनटोटा तथा ग्वादर बन्दरगाह जैसे रणनीतिक सम्पत्तियों को इसके हवाले करने को लेकर दबाव बनाया जा रहा है| इससे स्वाभाविक रूप से अफ़्रीकी देशों में ख़तरे की घंटी बज चुकी है| अफ़्रीकी विश्लेषकों के अनुसार, चीन ऋण की अदायगी को लेकर चिंतित नहीं है, बल्कि यह केवल संवेदनशील अफ़्रीकी देशों को सस्ते और अरक्षणीय ऋण देकर ज़मानत के रूप में आकर्षक राष्ट्रीय संपत्तियों को इन ऋणों के बदले लेने में रुचि रखता है| मीडिया की हाल की ख़बरों में कहा गया है कि चीन ने ज़ाम्बिया को आर्थिक सहायता के बदले में ज़मानत के रूप में इसकी तांबे खनन की संपत्तियों को देने को कहा है| इस प्रकार, चीन-अफ़्रीका के सम्बन्धों की काँच की शांत सतह के नीचे अंतर्निहित अंतर्धाराएं सुदृढ़ हो रहीं हैं|

दूसरी ओर, भारत ने अपनी विदेश नीति के एजेंडे में अफ़्रीकी क्षेत्र को एक “शीर्ष वरीयता” का क्षेत्र घोषित किया है| यह सैन्य सहायता, क्षमता वर्धन तथा प्रशिक्षण सहायता की पेशकश के माध्यम से पूर्व अफ़्रीका में हिन्द महासागर के तटीय राज्यों तक पहुँच चुका है| 2014 के बाद भारत ने अफ़्रीकी देशों के साथ द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय सहयोग के कई रूपों को विकसित या पुनर्जीवित किया है| इसने सेशेल्स तथा मॉरीशस जैसे छोटे द्वीप राज्यों के साथ भी सहयोग को बढ़ाया है| भारत “मौसम” तथा “एशिया अफ़्रीका विकास गलियारा” जैसी दो परियोजनाओं की शुरुआत करने की योजना बना रहा है| इनमें से दोनों परियोनाओं का उद्देश्य अफ़्रीकी देशों के साथ नई दिल्ली के सम्बन्धों तथा व्यापारिक संपर्कों को सशक्त बनाना है|

अफ़्रीका में भारत के लिए अत्यधिक मित्रभाव है| सशक्त विदेश नीति के उपायों को आगे बढ़ाने तथा इस क्षेत्र में कूटनीतिक रूप से अधिक सक्रिय रहने का समय आ गया है| अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक मुख्य वैश्विक देश के रूप में भारत के उत्थान के लिए अफ़्रीका महत्वपूर्ण है|

आलेख – प्रोफ़ेसर अपराजिता बिस्वास, अफ़्रीकी अध्ययन केंद्र, मुंबई विश्वविद्यालय

अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी