15.01.2021

प्रधानमंत्री द्वारा कल से कोरोना टीकाकरण अभियान शुरु करने की खबरें अलग-अलग शीर्षक से अख़बारों में हैं। हिन्‍दुस्‍तान की पहली खबर है- देश तैयार, कल से वायरस पर वार। राजस्‍थान पत्रिका की सुर्खी है-मंगल टीका कल से पहले दिन तीन लाख स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों को वैक्‍सीन। राष्‍ट्रीय सहारा लिखता है- टीकाकरण से पहले पस्‍त पड़ा कोरोना, तेजी से घट रहे हैं सक्रिय केस।

किसान संगठनों और सरकार के बीच आज फिर वार्ता होने पर अमर उजाला लिखता है- दोनों पक्ष बोले खुले मन से वार्ता को तैयार। व्‍हाट्सएप की नई उपयोक्‍ता नीति की समीक्षा कर रही है सरकार- जनसत्‍ता की खबर है। दैनिक ट्रिब्‍यून की सुर्खी है- निजता नीति में बदलाव की समीक्षा व्‍हाट्सएप से जल्‍द सफाई मांग सकती है सरकार।

प्‍ले स्‍टोर से हटे सैकड़ो एप, शीर्षक से नवभारत टाइम्‍स लिखता है- चुटकियों में लोन देने वाले कई एप्‍स को गुगल ने प्‍ले स्‍टोर से हटा दिया है। 

  केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो द्वारा अपने ही अफसरों पर छापे मारने की खबर दैनिक जागरण सहित सभी अख़बारों में हैं। हिन्‍दुस्‍तान लिखता है- कि बैंकों के साथ धोखाधड़ी करने वाली कम्‍पनियों से कथित तौर पर रिशवत लेने के आरोप में ये छापे मारे गए।

   अमरीकी प्रतिनिधि सभा में निवर्तमान राष्‍ट्रपति डॉनल्‍ड ट्रम्‍प के खिलाफ महाभियोग पारित होने पर अमर उजाला ने लिखा है- अमरीकी संसद में हिंसा के आरोपों पर निचले सदन में हुई कार्रवाई। राजस्‍थान पत्रिका ने लिखा है- अब सीनेट में लिखा जाएगा ट्रम्‍प का भविष्‍य।  

  दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता हुआ प्रौद्योगिकी शहर है बेंगलुरु, इस खबर को राष्‍ट्रीय सहारा ने प्रमुख से देते हुए लिखा है- वर्ष 2016 से इसका ये दर्जा बरकरार है। राजस्‍थान पत्रिका के अनुसार, लंदन की अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार और निवेश एजेंसी रिपोर्ट में बतया गया है कि बढ़ते निवेश की वजह से बेंगलुरु नम्‍बर वन पर है।

   जन-औषधि केन्‍द्रों पर इस वर्ष रिकॉर्ड बिक्री की खबर को राष्‍ट्रीय सहारा ने अर्थ जगत पृष्‍ठ पर देते हुए लिखा है- पिछले वर्ष की तुलना में दर्ज हुई 60 प्रतिशत वृद्धि। इसी अख़बार की खबर है- कौशल विकास योजना का तीसरा चरण आज से।

हमें जाना है तेजस से बहुत आगे, शीर्षक से हिन्‍दुस्‍तान लिखता है- आत्‍मनिर्भर भारत की दिशा में स्‍वदेशी विमानों की खरीद एक प्रसंशनीय कदम है। 

मकर संक्राति पर ठंड के तेवर तीखे शीर्षक से दैनिक भास्‍कर लिखता है- शिमला, मसूरी से ज्‍यादा ठंडी दिल्‍ली। नवभारत टाइम्‍स ने अंधेरी सर्द रातों जैसा दिन शीर्षक से लिखा है- दिल्‍ली, एन.सी.आर. में कल का पहला पहर घने कोहने में लिपटा रहा। पत्र लिखता है- दो डिग्री पर ठिठुरी दिल्‍ली, 22 साल में सबसे ठंडी मकर संक्राति।  

   नवभारत टाइम्स बड़े बेआबरू होकरशीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि अमेरिका को फिर से महान बनाने का नारा देकर सत्ता में आए डोनाल्ड ट्रंप एक ही कार्यकाल में दो बार महाभियोग का सामना करने वाले एकमात्र अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में इतिहास में दर्ज हो रहे हैं। 

  बुधवार को अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव 197 के मुकाबले 232 मतों से पारित कर दिया गया। खास बात यह कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भी दस सांसदों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया।

   इसी 20 जनवरी, यानी अगले बुधवार को ट्रंप का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन उससे पहले 19 जनवरी को ही संसद के ऊपरी सदन सीनेट में इस प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है। वहां डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत को देखते हुए प्रस्ताव का पास होना तय माना जा रहा है। पूछा जा सकता है कि सिर्फ एक दिन के लिए महाभियोग चलाने की इस कवायद का भला क्या मतलब है। 

   इस सांकेतिक कार्रवाई से क्या हासिल होने वाला है? असल में ऐसी कार्रवाइयों को कम महत्वपूर्ण मानने का ही नतीजा हमें पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार करने वाले आल्ट-राइट (अति-दक्षिणपंथ) के उभार के रूप में देखने को मिल रहा है।

  राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से ही ट्रंप खुद को अमेरिकी लोकतंत्र के नियमों और संस्थाओं से ऊपर की चीज दर्शाते रहे हैं। पेरिस जलवायु समझौते से वे यह कहते हुए बाहर आ गए कि यह समझौता बराक ओबामा ने किया था, जैसे ओबामा उन्हीं की तरह एक निर्वाचित राष्ट्रपति न होकर धोखे से इस पद पर काबिज हो गए हों। हाल में राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद तो उन्होंने मतदाताओं के फैसले को मानने से ही इनकार कर दिया। 

  हर उपलब्ध मंच पर उनका दावा खारिज हो गया, फिर भी वे चुनाव में धोखाधड़ी की बात पर अड़े रहे। और फिर जिस दिन चुनाव नतीजों पर संसद की मोहर लगनी थी, उसी दिन ट्रंप समर्थकों ने संसद में घुसकर जो उत्पात मचाया, वह अमेरिकी इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय बन गया है।

  सबसे अहम सवाल अब यही है कि इस प्रकरण को लेकर अमेरिकी लोकतंत्र कितनी सख्ती बरतता है। दुनिया भर में लिबरल राजनीतिक धाराओं का चलन ऐसी प्रवृत्तियों से निपटने के मामले में ढीलापोली बरतने का ही रहा है। धुर दक्षिणपंथी ताकतों को हराकर सत्ता में आने के बाद झगड़े-टंटे से बचकर राज करना ही उनकी एकमात्र प्राथमिकता हो जाती है। यही वजह है कि हुल्लड़बाज ताकतों द्वारा जनतांत्रिक संविधान के साथ खिलवाड़ की कोशिशें पूरी दुनिया में तेज हुई हैं।  

   अमेरिकी संसद ने महाभियोग का फैसला लेने के क्रम में दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर यह संदेश दिया है कि देश का संवैधानिक ढांचा कोई राजनीति करने की चीज नहीं है और अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका मुकाम एक ऐसी लक्ष्मण रेखा का है, जिसे अगर राष्ट्रपति भी पार करता है तो उसे इसका दंड भुगतना होगा।