दो बीघा ज़मीन

आलेख/ प्रस्तुति- अनुराधा

1953 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ को प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक बिमल रॉय ने बनाया है। जिसमें मुख्य भूमिकाएं बलराज साहनी, निरूपा रॉय, मुराद और मीना कुमारी ने निभाई हैं। फिल्म के शीर्षक के ही मुताबिक नायक शंभू (बलराज साहनी) की उम्र अपनी दो बीघा ज़मीन बचाने के संघर्ष में बीत जाती है। गांव में लागातार सूखा पड़ने की वजह से शंभू और उसके पूरे परिवार, जिसमें उसकी पत्नी पार्वती (निरूपा राय) उसके बेटे, पिता और आने वाली संतान हैं, सभी की रोज़ी-रोजी का एक मात्र सहारा दो बीघा ज़मीन ही है, लेकिन गांव का ज़मीनदार हरनाम सिंह (मुराद) अपनी चालाकी से ये ज़मीन भी शंभू से छीनना चाहता है। अब ऐसे में शंभू किस तरीके से अपनी ज़मीन, जो उसके लिए मां तुल्य है, बचाने का जतन करता है कहानी इसी पृष्ठभूमि के साथ बड़े सटीक निर्देशन और जीवंत अभिनय से आगे बढ़ती है। फिल्म के ज़रिए निर्देशक ने उस दौर की ग़रीबी, बदहाली और सामाजिक अव्यवस्था पर करारा प्रहार किया है। फिल्म में गीतों के बोल शेलैन्द्र ने लिखे और गीतों को स्वरबद्ध सलिल चौधरी ने किया। ‘दो बीघा ज़मीन’ वह पहली फिल्म बनी जिसे बेस्ट फीचर फिल्म श्रेणी का फिल्म फेयर अवॉर्ड दिया गया। ‘नीचा नगर’ (1946) के बाद ‘दो बीघा ज़मीन’ कान्स फिल्म समारोह में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली पहली फिल्म बनी। फिल्म के क्लाइमेक्स में शंभू अपनी पत्नी को खो देता है लेकिन अपनी दो बीघा ज़मीन हासिल कर लेता है। लेकिन फिल्म का ऐसा अंत बिमल रॉय की पत्नी को अमानवीय लगा और इसीलिए बिमल रॉय ने फिल्म के क्लाईमेक्स को दोबारा शूट किया जिसमें शंभू की पत्नी तो बच जाती है लेकिन वह दो बीघा ज़मीन खो देता है।