20-03-2017

उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की नई सरकार का शपथ ग्रहण अखबारों की प्रमुख खबर है। दैनिक जागरण की सुर्खी है- आई योगी सरकार। जनसत्‍ता की टिप्‍पणी है- योगी ने संभाला राजपाट, मंत्रियों से मांगा आय का ब्‍यौरा। नवभारत टाइम्‍स का कहना है- कमान संभालते ही साफ किया एजेंडा।

जाट आरक्षण आंदोलन स्‍थगित होने पर हिन्‍दुस्‍तान के शब्‍द हैं- राहत : जाटों ने दिल्‍ली कूच टाला। मेट्रो सेवाएं रहेंगी जारी।

जनसत्‍ता की अहम खबर है कमजोर प्रदर्शन वाले कॉलेजों पर गिरेगी गाज, हिन्‍दुस्‍तान का कहना है- विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के परामर्श कार्यक्रम के बावजूद प्रदर्शन नहीं सुधारने वाले संस्‍थानों पर केन्‍द्र का हो सकता है- कड़ा रूख। सभी शिक्षण संस्‍थानों और विश्‍वविद्यालयों का ऑडिट होगा, गुणवत्‍ता पर रहेगा जोर।

अमर उजाला ने विधिमंत्री रविशंकर प्रसाद के हवाले से लिखा है- सरकारी विवाद सुलह से निपटाये, कोर्ट न जाएं। आखिरी विकल्‍प में ही ले आदलत की शरण। मुकदमों का बोझ घटाने के लिए विशेष मुहिम चलाने का किया आग्रह, 44 प्रतिशत लम्बित मुकदमें सरकारों के।

दैनिक भास्‍कर ने दिल्‍ली हाईकोर्ट के फैसले का उल्‍लेख किया है – बदसलूकी पर वयस्‍क बच्‍चों को निकाल सकते हैं माता-पिता। अदालत ने दो भाईयों की अपील पर किया फैसला।

राजस्‍थान पत्रिका की खबर है- आधार सत्‍यापन के लिए जून से नये मानक लागू, आधार प्रमाणन उपकरण के साथ छेड़छाड़ करना अब और भी कठिन होगा। भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण ने पहली जून से नये एनक्रेप्‍शन मानक को लागू करने का फैसला किया है।

‘योगी की अगुआई’ शीर्षक से जनसत्ता अपने संपादकीय में लिखता है कि आखिर हफ्ते भर मंथन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की अगुआई योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। इस फैसले पर स्वाभाविक ही कई तरह की प्रतिक्रियाएं उभर रही हैं। हालांकि योगी को उनके समर्थक मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में करीब साल भर पहले से पेश कर रहे थे, पर उनकी छवि एक विवादित नेता की होने के चलते इस दावे को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी की अगुआई और विकास के मुद्दे पर लड़ा। वहां मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं था। मोदी पर भरोसा करके ही लोगों ने पार्टी को भारी बहुमत दिया। मगर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री चुनने से जाहिर हो गया कि भाजपा बेशक विकास की बात करती रही हो, पर हिंदुत्व उसके एजंडे में सबसे ऊपर है। लोकसभा चुनाव में भी उसे उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित कामयाबी मिली तो पार्टी ने माना था कि हिंदुत्व के एजंडे पर ही उसे व्यापक समर्थन मिला है। विधानसभा चुनाव के समय भी टिकट बांटते समय और फिर चुनाव प्रचार में वही भरोसा सबसे ऊपर नजर आ रहा था। अब पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यकीन हो गया है कि हिंदुत्व के एजंडे पर चलते हुए ही उन्हें स्थायी लाभ मिल सकता है। योगी का चुनाव भी इसी दबाव में हुआ है।

योगी आदित्यनाथ के दो उपमुख्यमंत्रियों और पैंतालीस सदस्यों वाले मंत्रिमंडल में छह महिलाओं और एक मुसलमान सहित अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को जोड़ कर संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। मगर अपने कामकाज से वे लोगों के बीच कितना भरोसा जगा पाते हैं, देखने की बात है। योगी आदित्यनाथ तेज-तर्रार हिंदुत्ववादी नेता माने जाते हैं। अक्सर उनके तल्ख बयानों के चलते विवाद पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी गठित की थी, जिसकी गतिविधियां हमेशा सामाजिक विद्वेष पैदा करने का सबब बनती रही हैं। यहां तक कि योगी खुद कई बार भाजपा की रीति-नीतियों के विरूद्ध बगावती तेवर अपनाते देखे गए हैं। ऐसे में वे किस प्रकार राज्य के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल बैठा कर काम कर पाते हैं, इंतजार करना होगा।

नभारत टाइम्स ‘देवभूमि को मौका’ शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में नई सरकार ने कार्यभार संभाल लिया है। लोगों की उम्मीदों का बड़ा बोझ इस सरकार के कंधों पर है। दरअसल इस छोटे से पहाड़ी राज्य की बहादुर जनता ने जितनी कुर्बानियां अपने एक अलग राज्य का सपना सच कराने में दी हैं, उस अनुपात में उसकी आकांक्षाएं पूरी करने का आधा-अधूरा प्रयास भी इस राज्य के नेतृत्व ने नहीं किया है। उम्मीद यह थी कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड का नेतृत्व यहां की भौगोलिक विशिष्टताओं के अनुरूप विकास का नया मॉडल खड़ा करेगा। मगर विकास के मोर्चे पर प्रयास तराई के क्षेत्रों में टैक्स छूट के आकर्षण में लगे कुछेक कारखानों तक ही सीमित रहे। यहां का नेतृत्व अपनी गद्दी की चिंता से ही नहीं उबर पाया। जैसा कि छोटे राज्यों के साथ आम तौर पर होता है, विधायकों का छोटा सा गुट भी सरकार को अस्थिर करने की क्षमता पाकर सौदेबाजी में लग जाता है। नतीजतन राजनीतिक स्थिरता दुर्लभ सी चीज बन जाती है। छत्तीसगढ़ भले इस मामले में अपवाद साबित हुआ हो, उत्तराखंड में एक नारायण दत्त तिवारी को छोड़ दिया जाए तो कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। कोई महीने दो महीने तो कोई साल दो साल का मेहमान साबित हुआ। ऐसे में यह सचमुच बड़ी बात है कि प्रदेश के मतदाताओं ने बीजेपी को इस बार 70 में से 57 विधायक जिता कर दे दिए।