पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने पनामा मामले में जांच के आदेश दिए

आलेख- डॉ. स्मिता, अनुसंधान फेलो, आईसीडब्ल्यूए

पनामा पेपर्स मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को फौरी राहत मिल गई है। वह अयोग्य घोषित होने से बच गए हैं। पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा है कि नवाज़ शरीफ को अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा। फैसले में यह भी कहा गया है कि शरीफ के परिवार के सदस्यों द्वारा पैसों के लेन-देन के मामले की जांच के लिए, एक संयुक्त जांच दल का गठन किया जाना चाहिए। फैसला देने वाली पीठ में न्यायाधीश आसिफ सईद खोसा, न्यायाधीश गुलज़ार अहमद, न्यायाधीश एजाज फज़ल खान, न्यायाधीश अज़मत सईद और न्यायाधीश इजाज़ुल एहसान शामिल हैं। न्यायालय के फैसले में कहा गया है कि नवाज़ शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं है। न्यायालय ने शरीफ और उनके दो बेटे – हसन और हुसैन को जांच में सहयोग करने के लिए संयुक्त जांच दल के समक्ष पेश होने का आदेश दिया है। इस दल में फैडरल इंवेस्टिगेशन एजेंसी, नेशनल एकाउंटैबिलिटी ब्यूरो, सिक्युरिटी एंड एक्सचेंज कमिशन ऑफ पाकिस्तान और पाकिस्तान की मिलिटरी इंटेलिजेंस के विभिन्न अधिकारी शामिल हैं। संयुक्त जांच दल प्रत्येक दो सप्ताह बाद अपनी रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

मामले की शुरुआत पिछले वर्ष 02 नवंबर 2016 को हुई थी। 23 फरवरी 2017 को सुनवाई का दौर समाप्त करने से पूर्व पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में कुल 35 बार सुनवाई की जा चुकी थी। यह मामला वर्ष 1990 में नवाज़ शरीफ द्वारा कथित मनी लॉन्ड्रिंग किए जाने से संबंधित है। मामला लंदन में संपत्ति खरीदने से भी जुड़ा था। इन संपत्तियों का खुलासा पिछले वर्ष तब हुआ, जब पनामाई लॉ फर्म ‘मौसेक फोन्सेका’ ने ‘पनामा पेपर्स’ के नाम से कुछ दस्तावेज़ों का खुलासा किया। वैश्विक मीडिया ने इन दस्तावेज़ों के हवाले से शरीफ के बेटों के स्वामित्व वाली विदेशी कंपनियों द्वारा खरीदी गई संपत्तियों का बड़े पैमाने पर खुलासा किया। पनामा पेपर्स के अनुसार, शरीफ के चार बच्चों में से तीन – बेटी मरयम और दो बेटे हसन और हुसैन विदेशी कंपनियों के मालिक थे और इनके पास ही विभिन्न कंपनियों के लिए लेन-देन करने अथवा लेन-देन के लिए किसी को अधिकृत करने का अधिकार था। हालांकि शरीफ और उनके परिवार के सदस्य इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं और इस तरह के किसी भी गलत काम में संलिप्त होने से इन्कार किया है। यह मामला नवाज़ शरीफ की लंदन में गैर कानूनी संपत्तियों के बारे में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ प्रमुख इमरान खान और अन्य द्वारा, दायर की गई समान याचिकाओं पर आधारित था। न्यालायल ने निर्देश दिया, कि कतर में धन कैसे हस्तांतरित किया गया, इसकी जांच किया जाना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन न करने वाले नेशनल एकाउंटैबिलिटी ब्यूरो के अध्यक्ष को लताड़ भी लगाई। न्यायालय का फैसला आने से पूर्व पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया गया था। शहर में ‘रेड ज़ोन’ के भीतर और आसपास करीब 1500 सुरक्षा जवानों की तैनाती की गई थी। सुरक्षाकर्मियों ने इस क्षेत्र के सभी आने-जाने वाले मार्गों पर सख्त निगरानी रखी।

पनामा पेपर्स के जरिए दुनियाभर के नेताओं, व्यावसायियों और अमीर लोगों की कथित विदेशी वित्तीय गतिविधियों के विवरण का खुलासा हुआ था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ का नाम पनामा पेपर्स में आने से यह मामला सुर्खियों में आया था और यह कयास लगने लगे थे कि इस मामले में कोर्ट के फैसले से शरीफ का भविष्य तय होगा। नवाज़ शरीफ सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाली इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी को उम्मीद है कि अगले वर्ष होने वाले चुनावों के दौरान यह मामला बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा। इस मामले ने अगले वर्ष होने वाले चुनावों से पहले पाकिस्तान में उथल-पुथल की स्थिति पैदा कर दी है। इस पूरे मामले को नवाज़ शरीफ और इमरान खान के बीच शक्ति परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि न्यायालय के आदेश के बाद शरीफ को ख़ुद को विजेता नहीं मानना चाहिए, क्योंकि आगामी जेआईटी की जांच उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती है।

न्यायालय का फैसला और पनामा पेपर्स ने पाकिस्तान में चुनावों से काफी पहले ही, चुनावी जंग छेड़ दी है। पाकिस्तान पहले ही आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों से जूझ रहा है, और इस्लामाबाद भी आतंकवादी समूहों को समर्थन देने की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरफ से कड़ी आलोचनाओं का सामना कर रहा है, वहीं अब पनामा पेपर्स मामले की जांच में शरीफ का और व्यस्त होना तय है। पाकिस्तानी सेना भी इन सभी प्रगतिशील घटनाओं पर गंभीरता से नज़र रख रही है। पूर्व सेनाध्याक्ष जनरल रहील शरीफ काफी लोकप्रिय जनरल हैं और ऐसा अनुमान है कि वह भी इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर सकते हैं। कई अन्य पाकिस्तानी नेताओं की तुलना में जनरल शरीफ की साफ छवि है। पाकिस्तान में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा है, और आगामी चुनावों में मतदान को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। विपक्षी दल और पंडितों का दावा है कि विशेषरूप से पनामा पेपर्स का खुलासा सहित भ्रष्टाचार का मुद्दा पहले ही पीएमएल-एन की साख को बट्टा लगा चुका है, और इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस मुद्दे से पीएमएल-एन को राजनीतिक नुसकान भी पहुंचा है। विपक्षी दल इस मामले के जरिए अधिक से अधिक राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिशों में लगे हैं। इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के चुनावी नतीज़ों का भविष्य, नवाज़ शरीफ के पनामा पेपर्स मामले में आने वाले अंतिम फैसले पर टिका हुआ है। ऐसा लगता है कि वर्ष 2018 का चुनाव प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के लिए आसान नहीं होगा।