17.07.2017

अमरनाथ तीर्थ यात्री बस दुर्घटना और सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री का बयान अखबारों की अहम खबर है। नवभारत टाइम्स की सुर्खी है- गोरक्षा के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं। राज्यों से कड़ी कार्रवाई के लिए कहा। जनसत्ता लिखता है- दागी नेताओं पर हमलावर हुए प्रधानमंत्री। राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है- भ्रष्ट नेताओं को करें बाहर। जनता को भरोसा दिलाना होगा, हर नेता दागी नहीं और पैसे के पीछे नहीं भागता। गोमूत्र सहित गाय से जुड़े पदार्थों और उनके लाभ पर सरकारी अनुसंधान समिति के गठन की खबर अधिकतर अखबारों के मुख पृष्ठ पर है। हिन्दुस्तान का कहना है संसद के मॉनसून सत्र में शिक्षा से जुड़े सात विधेयक पारित कराए जाएंगे। दो विधेयक शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन को लेकर है। राजनीतिक नेताओं को बंद और प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने की जिम्मेदारी के दायरे से बाहर रखने के प्रयास को अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने मुख पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। मणिपुर में 95 कथित फर्जी  मुठभेड़  की सीबीआई जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नवभारत टाइम्स लिखता है कि इन मामलों को तार्किक परिणति तक पहुंचाने की यह कोशिश अगर सफल हो जाती है तो भारतीय लोकतंत्र एक कड़े इम्तिहान में कामयाब कहलायेगा। कश्मीर घाटी में हिंसा में चीन का हाथ होने की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के बयान पर अमर उजाला का कहना है- यह बेहद गंभीर और सजग होने की मांग करता है। अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हवाले से लिखा है- राज्य में अशांति के पीछे चीन का हाथ।

‘चेतने का वक्त’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में दैनिक जागरण लिखता है कि, संसद के मानसून सत्र के पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह एक बार फिर गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा रोकने की जरूरत जताई उस पर राज्य सरकारों को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। हालांकि प्रधानमंत्री ने पिछले माह ही गोरक्षा के नाम पर हो रही अराजकता पर अपनी सख्त नाराजगी जताई थी, लेकिन ऐसा लगता है कि राज्य सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी का पालन करना जरूरी नहीं समझा। कम से कम अब तो राज्य सरकारों को चेतना ही चाहिए। चूंकि राज्य सरकारें न तो गोरक्षा संबंधी कानूनों के पालन के प्रति सतर्क नजर आती हैं और न ही गाय के नाम पर हिंसा का सहारा लेने वाले तत्वों पर अंकुश लगाने को लेकर इसलिए बेहतर होगा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के जरिये खुद केंद्र सरकार ऐसी घटनाओं पर नजर रखे और संबंधित राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश दे। गाय के नाम पर हो रही हिंसा के मामले में राज्य सरकारों को जितना सचेत एवं सक्रिय होने की आवश्यकता है उतना ही गोरक्षा से जुड़े संगठनों और विभिन्न हिंदू समूहों को भी। उन्हें अपने बीच के ऐसे तत्वों पर निगाह रखनी चाहिए जो गाय के नाम पर कानून हाथ में लेने से बाज नहीं आ रहे हैं। यदि कोई गोरक्षा के नाम पर हिंसा का सहारा लेता है तो इसका सीधा मतलब है कि उसका उन संस्कारों और विचारों से कहीं कोई मतलब नहीं जो गोरक्षा की भावना का आधार माने जाते हैं।

जनसत्ता ने ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखा है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने को लेकर शुरू से गंभीर हैं। इसी मकसद से नोटबंदी का फैसला किया गया। कालेधन को सामने लाने के लिए दूसरे उपाय आजमाए जा रहे हैं। उसी कड़ी में संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले बुलाई सर्वदलीय बैठक में उन्होंने सभी दलों से भ्रष्टाचार रोकने में मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि देश को लूटने वालों के खिलाफ जब कानून अपना काम करता है तो वे सियासी साजिश की बात करके बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ सभी दलों के लोगों को एकजुट होने की जरूरत है। छिपी बात नहीं है कि राजनेताओं और उनके परिजनों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई निर्णायक कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती कि उन्हें लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। जांच एजेंसियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने के आरोप पुराने हैं। उनकी निष्पक्षता के अभाव में भी राजनेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले संतोषजनक निर्णय तक नहीं पहुंच पाते। एक आदर्श विचार के तौर पर यह अपील निस्संदेह बेहतरी की उम्मीद जगाती है, मगर व्यावहारिक रूप में यह कितना संभव हो पाएगा, कहना मुश्किल है। इसलिए मोदी सरकार को न सिर्फ दूसरे दलों के नेताओं, बल्कि सत्तापक्ष के लोगों पर भी नजर रखने और प्रशासनिक सुधार की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।