चीन के प्रति भारत की धैर्यपूर्ण एवम् शांत नीति

आलेख:- डॉ. ऐश नारायण रॉय

अनुवाद:- हर्ष वर्धन

भारत-चीन के बीच दोकलम क्षेत्र से सम्बन्धित जारी गतिरोध तथा इस मामले पर चीन का लड़ाकू स्वर न केवल साजिश  भरा लगता है बल्कि हैरान भी करता है. सामरिक विश्लेषकों का ध्यान चीनी मीडिया द्वारा प्रयोग की गयी अस्वाभाविक कठोर भाषा की ओर है. इस क्षेत्र की ओर भेजे जाने वाले सैनिकों की संख्या भी अप्रत्याशित है. वर्तमान गतिरोध 16 जून को आरम्भ हुआ जब निर्माण कार्य करने वाले वाहनों एवं सड़क निर्माण उपकरणों के साथ चीनी सेना की एक टुकड़ी ने भूटान की सीमा में दक्षिण की ओर बढ़ना आरम्भ किया. भूटान के भारत के साथ घनिष्ठ सैन्य और आर्थिक सम्बन्ध हैं और भारत ने भूटान के आग्रह पर ही चीनी हस्तक्षेप का विरोध करने के लिए सैनिक भेजे.

यह बात पूर्णतया स्पष्ट है कि इस घटना पर चीनी मीडिया ने शांति स्थापना में सहयोग देने के स्थान पर भारत के विरुद्ध भड़काऊ बयानबाज़ी का काम किया है क्योंकि इस विषय में अब तक भारत का रुख सख्त रहा है. इस मामले में चीन की हठधर्मिता का कारण बिलकुल साफ़ है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन अपने दर्जनों पड़ोसियों के साथ दुर्व्यवहार सहित अनेक मुद्दों पर उत्तेजनापूर्ण और दबंग रहा है. दक्षिण चीन सागर पर भी चीन की मंशा से उसके पड़ोसी परेशान हैं.

चीन का वह युग समाप्त हो गया है जिसमे वह आत्मनिरीक्षण और चुपचाप रहकर स्वविकास करने का सिद्धांत अपनाता था. पिछले कुछ अनुभवों को देखा जाये तो यह बात तो बिलकुल स्पष्ट है कि उसके उस कथन को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए जिसमे वह शांतिपूर्ण और सद्भाव के साथ विकास करने की बात करता है. यूरोपीय संसद के उपाध्यक्ष  रिसार्त जारनेतस्की ने भी बल देकर यह कहा है कि चीन एक ऐसी विदेश नीति अपनाता रहा है जिससे अंतर्राष्ट्रीय मानकों का खुलेआम उल्लंघन होता है. चीन द्वारा विश्व समुदाय के समक्ष किए गए उस दावे की हवा निकल गयी है जिसमे उसने अपने ‘शांतिपूर्ण उदय’ से अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को कोई चुनौति नहीं मिलेगी.

पूरा विश्व जानता है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब ‘चीन के वृहद् पुनरुद्धार के चीनी सपने’ की बात करते हैं तब उसके पीछे उनकी सैन्य शक्ति का बल होता है. कुछ विद्वान् प्राचीन चीनी साम्राज्य की उस विस्तारवादी नीति की याद दिलाते हैं जिसमे वह छोटे छोटे पड़ोसी देशों के भूभाग पर अपना अधिपत्य जमाता रहता था. चीनी राज्य कभी भी अपने सैन्य अभियानों के लिए खेद व्यक्त नहीं करते थे.

चीन के वर्तमान विवाद्कारी व्यवहार के लिए कुछ आन्तरिक कारण भी बताये जा रहे है. राष्ट्रपति शी ने अपने आप को एक प्रमुख नेता के रूप में स्थापित कर लिया है जो कि उनकी शक्ति और प्रभाव का भयानक संकेत है. वह 2012 में राष्ट्रपति बने और तब से ही उन्होंने चीन की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता को गतिमान बनाये रखा है. उनके ‘पट्टी और सड़क’ अभियानों ने उनको उच्च अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की है. कई विशेषज्ञ तो कम्युनिस्ट पार्टी के होने वाले 19वें राष्ट्रीय सम्मेलन जिसमे उन्हें एक और कार्यकाल दिए जाने की सम्भावना है तथा भारत-चीन-भूटान की संयुक्त सीमा पर उनके उत्तेजनापूर्ण व्यवहार को आपस में जोड़कर भी देख रहे हैं.

चीनी मीडिया के भड़काऊ व्यवहार के प्रति भारत ने अपना रवैया शांत, सधा हुआ एवं परिपक्व रखा है. इस गतिरोध में मीडिया की भूमिका सीमित रही है. भारत का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए राजनयिक रास्ते उपलब्ध हैं. विदेश सचिव एस. जयशंकर ने कहा है कि ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि दोनों देश इस मामले को न सुलझा पायें. श्री जयशंकर के इस सधे हुए वक्तव्य के बावजूद कि ‘भारत तथा चीन को चाहिए कि मतभेदों को विवाद न बनने दिया जाये’ चीनी सरकारी मीडिया इस मामले को तूल देने में लगा हुआ है. इस मामले पर चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ का यह कहना कि ‘हद में रहो’ और ‘जब तक भारतीय सैनिक वापस नहीं जाते तब तक वार्ता की कोई सम्भावना नहीं’ इस मामले को सुलझाने में सहायक नहीं  है.

यद्यपि इस समय दोनों देशों के आर्थिक सम्बन्धों के परिमाण को देखा जाये तो इस विवाद को शीघ्र सुलझाना ही बेहतर होगा. सूत्रों के अनुसार कुछ सरकार-समर्थित लोग इस तनाव को कम करने के लिए प्रयासरत हैं. आरोप प्रत्यारोप के इस वातावरण में कुछ वरिष्ठ भारतीय मंत्री ब्रिक्स मंच के सम्मेलन में भाग लेने के लिए पेइचिंग पहुँचे. प्रधानमन्त्री मोदी ने हैम्बर्ग में राष्ट्रपति जिनपिंग से भेंट की और ‘विविध विषयों’ पर चर्चा भी की. ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में भाग ले हेतु भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पेइचिंग जायेंगे.

भारत सरकार ने विपक्ष को यह आश्वासन देकर अच्छा काम किया है कि भारत ऐसी परिस्थिति से धैर्य और शांति से निपटेगा. सबका मानना है कि उसकी विदेश नीति में इस दबंग व्यवहार को समझना कोई मुश्किल बात नहीं है.